भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 879

शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५१९

धातुएं क्षीण हो जायें तो वह सिद्ध नहीं होता अर्थात् उपर्युक्त उपद्रव हो जाने पर अम्लपित्त रोग असाध्य हो जाता है ॥४९॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। पृह (४६)
इति खिलेष्वम्लपित्तचिकित्साध्यायः षोडशः ।। ड ट (१६)


(इति ताडपत्रपुस्तके २४० तमं पत्रम् ।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । पृह (४६)
इति खिलेष्वम्लपित्तचिकित्साध्यायः षोडशः ।। ड ट (१६)


अथ शोथचिकित्साध्यायः सप्तदशः ।

अथातः शोथचिकित्सितं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम शोथ चिकित्सित् नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

वान्तस्याथ विरिक्तस्य कर्शितस्य ज्वरादिभिः । महोपवासक्लिष्टस्य विरुद्धार्जीर्णभोजिनः ।।३।।
सद्यश्चात्यर्थलवणक्षारोष्णाम्लकटून् रसान् । शूकरोरभ्रमांसादि दधिमृद्भक्षणादि च ।।४।।
शीतप्रवातव्यायामव्यवायांश्चातिसेवतः । तथैव दुष्प्रजाताया नार्याः कृच्छ्रेण वा पुनः ।।५।।
सूताया निःस्रुतायाश्च द्विषन्त्याः स्वमुपक्रमम् । एतदेव निदानं च शीलयन्त्यास्ततस्तयोः ।।६।।
शोथः संजायते शीघ्रं दारुणः, स चतुर्विधः ।

निदान तथा सम्प्राप्ति— वमन तथा विरेचन के बाद, ज्वर आदि के द्वारा कृश हो जाने से, लम्बे उपवास के बाद, विरुद्ध भोजन से तथा अजीर्ण पर भोजन करने से, अत्यधिक लवण, क्षार, उष्ण पदार्थ, अम्ल एवं कटु रसों के सेवन से, सूअर तथा मेंढे के मांस और दही एवं मिट्टी के खाने से, तेज ठण्डी हवा, व्यायाम, तथा व्यवाय (मैथुन) के अधिक प्रयोग से, जिसे प्रसव ठीक प्रकार से न हुआ हो अथवा कष्ट से हुआ हो, जिसका गर्भस्राव हो गया हो, जो चिकित्सा से द्वेष करती हो अर्थात् चिकित्सा न करवाती हो—इत्यादि उपर्युक्त कारणों तथा अन्य निदानों का सेवन करने से शीघ्र ही दारुण शोथ हो जाता है ॥३-६॥

वातिकः पैत्तिकश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातिकः ।।७।।

शोथ के भेद— यह शोथ चार प्रकार का होता है १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक तथा ४. सान्निपातिक ॥७॥

आगन्तुः क्षतनिष्पिष्टच्युतभग्नादिसंभवः । दष्टावमूत्रिताघ्रातसंस्पर्शगरयोगजः ।।८।।

आगन्तु शोथ— इसके अतिरिक्त आगन्तु शोथ क्षत (चोट लग जाने) से, पिसजाने से, गिर पड़ने से अथवा हड्डी आदि के टूट जाने से तथा सर्प आदि विषैले प्राणियों के द्वारा काटने, मूत्र करने, सूंघने, स्पर्श करने अथवा विष के कारण