काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 880, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें५२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शोथचिकित्साध्यायः १७]
भी हो जाती है। इस प्रकार आगन्तु एवं विषंज मिला कर कुल ६ प्रकार की शोथ होती है। माधवनिदान में द्वन्द्वज शोथों के तीन पृथक् भेद देकर ९ भेद कर दिये गये हैं। यथा—दोषैः पृथक् द्वयैः सर्वैरभिघाताद्विषादपि। अर्थात् तीनों दोषों से पृथक् २ तीन, द्वन्द्वज से तीन, सन्निपात से एक, अभिघात से एक और विष से एक-इस प्रकार कुल ९ होते हैं। द्वन्द्वज शोथों में दोष प्रकृतिसमसमवायावस्था में विद्यमान होने से उन्हें पृथक् नहीं गिना गया है। इस प्रकार जो यहां ६ ही शोथों का वर्णन किया गया है वह समुचित ही है ॥८॥
प्रकोपेहेतुः सर्वेषां सामान्येनैव कीर्तितः । पूर्वं ज्वरनिदाने तु प्रोक्तः प्रत्येकशो मया ।।९।।
इन सब प्रकार की शोथों के प्रकोप के कारण सामान्य रूप से ही कहे गये हैं क्योंकि पहले ज्वर निदान में मैंने प्रत्येक का पृथक् २ प्रकोप कारण कहा है ॥९॥
यथावदेषां रूपाणि संप्रवक्ष्याम्यतः परम् । अपराह्ने ध्रु वा वृद्धिः श्वयथो रनिलात्मनः ।।१०।। पूर्वाह्ने श्लैष्मिकस्य स्यान्मध्याह्ने पैत्तिकस्य तु ।
अब मैं इन सबके स्वरूप का यथावत् वर्णन करूंगा। शोथों का वृद्धि काल-वातिक शोथ की अपराह्न (सायंकाल-दिन के पिछले प्रहर), श्लैष्मिक की पूर्वाह्न (दिन के पहले प्रहर में) तथा पैत्तिक की मध्याह्न काल में वृद्धि होती है ॥१०॥
पूर्वमध्यापरे यामे ह्रासश्चैषां यथाक्रमम् ।।११।।
शोथों का ह्रास—इनका ह्रास क्रमशः पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्न में होता है। अर्थात् वातिक शोथ का पूर्वाह्न में, श्लैष्मिक का मध्याह्न तथा पैत्तिक का अपराह्न में ह्रास होता है।
श्याववर्णः सवर्णो^१ वा क्षिप्रोत्थाननिवर्तनः । पिपीलिकाकीर्ण इव ताम्यते परितुद्यते ।।१२।। विषमज्वरजुष्टस्य चिराच्चैव विदह्यते । भिन्नरोमा चलोऽङ्गुल्या निम्नो भवति पीडितः ।।१३।। सिरास्नायुत्वगायामैरधःकाये च वर्धते । स्निग्धोष्णोपशयी रूक्षः श्वयथुर्वातसंभवः ।।१४।।
वातिक शोथ के लक्षण—वातिक शोथ का रंग काला अथवा सवर्ण (अविकृत) होता है। यह शीघ्र ही उत्पन्न होती है तथा शीघ्र ही शान्त भी हो जाती है, वह स्थान चीटियों से घिरे हुए के समान होता है। तथा उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि मानों चींटियां काट रही हों तथा पीडा होती है। यदि रोगी को विषम ज्वर हो तो वह शोथ शीघ्र ही विदग्ध हो जाती है-पक जाती है। उसमें रोम (बाल) टूट जाते हैं, वह शोथ अस्थिर होती है तथा उंगली से दबाने पर वह शोथयुक्त स्थान नीचे दब जाता है (Pits on pressure) शरीर के निचले भाग में सिरा, स्नायु एवं त्वचा के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता है, स्निग्ध एवं उष्ण वस्तुएं उसके अनुकूल-सात्म्य होती हैं तथा वह रूक्ष होती है ॥१२-१४॥
नीललोहितपीताभः पीड्यते धूप्यते मुहुः । क्षिप्रपाकी सविद्भेदस्तृष्णादाहज्वरान्वितः ।।१५।। नाभ्यां च बस्तिमूले च वृद्धिश्चास्य विशेषतः । नित्यं च (रोच)ते शीतं श्वयथुः पित्तसंभवः ।।१६।।
पैत्तिक शोथ के लक्षण—जो शोथ नीले, लाल तथा पीले रंग की हो, जिसमें बहुत पीडा तथा धूप लगे, जो शीघ्र ही पक जाये, जिसमें साथ में अतिसार, तृष्णा, दाह एवं ज्वर हो, जिसकी नाभि एवं बस्तिमूल में विशेष वृद्धि हो तथा जिसमें शीत (ठण्डी वस्तुएं) अच्छी लगती हों-वह पैत्तिक शोथ होती है ॥१५-१६॥
स्थिरः शीतोऽतिबहलः श्लक्ष्णः पाण्डुरवेदनः । सोत्क्लेशा रोचकस्वापकण्डूकाठिन्यगौरवः ।।१७।।
१. अविकृतवर्ण इत्यर्थः ।