भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 881

शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२१

चिराद् वृद्धिमवाप्नोति चिराच्च विनिवर्तते । उरोगण्डाक्षिकूटेषु वृद्धिश्चास्य विशेषतः ॥१९८॥
शीतज्वरकरः शीतद्वेषी शोफः कफात्मकः ।

श्लैष्मिक शोथ के लक्षण—जो शोथ स्थिर, शीतल, अत्यन्त घनी, चिकनी, पाण्डुवर्ण का तथा वेदना रहित हो, जिसमें उत्क्लेश (जी मचलाना) तथा अरुचि हो, जिसमें स्पर्शज्ञान न हो (सोई हुई सी-सुन्न हो), जिसमें कण्डू हो, जो कठिन तथा गुरु हो, जो शोथ बहुत देर में बढ़ती हो तथा बहुत देर में हटती हो, छाती, कपोल एवं अक्षिकूटों में जिसकी विशेष वृद्धि होती हो, जिसमें ठण्ड लग कर ज्वर आता हो तथा जिसमें शीत अच्छी न लगे-वह श्लैष्मिक शोथ होती है।

नीलपीतारुणाभासः सिराजालोपसन्ततः ॥१९९॥
अनेकोपद्रवस्त्रावः सर्वरूपसमन्वितः । सुतीव्रवेदनोऽसाध्यः श्वयथुः सान्निपातिकः ॥२००॥

सान्निपातिक शोथ के लक्षण—जो नीली, पीली एवं अरुण वर्ण की हो, जो सिराजाल से युक्त हो, जिसमें अनेक उपद्रव तथा स्त्राव होते हों, जिसमें वात, पित्त एवं कफ तीनों के लक्षण विद्यमान हों, जिसमें अत्यन्त तीव्र वेदना होती हो वह सान्निपातिक शोथ होती है। यह असाध्य है ॥१९-२०॥

रक्तश्यावारुणोऽत्युष्णस्तोदभेदरुजान्वितः । आगन्तुः, सविषस्ताम्रः कृष्णो वाऽऽशु विसर्पतिः ॥२१॥
हल्लासारुचितृण्मूर्च्छाज्वरारुचिकरो भृशम् ।

आगन्तु शोथ के लक्षण—आगन्तु शोथ लाल, काली तथा अरुण वर्ण की होती है, अत्यन्त उष्ण होती है तथा इसमें तोद (सुई चुभने के समान) तथा भेद (शस्त्र के काटे जाने के समान) से युक्त पीडा होती है। विषज शोथ के लक्षण—विषज शोथ ताम्र एवं कृष्ण वर्ण की होती है, सारे शरीर में शीघ्र फैल जाती है, इसमें अत्यधिक हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर एवं अरोचकता होती है ॥२१॥

इति षड्विधमुद्दिष्टं श्वयथोर्लक्षणं मया ॥२२॥
इस प्रकार मैंने ६ प्रकार की शोथों के लक्षण कह दिये हैं॥

नृणां तु पादप्रभवः स्त्रीणां च मुखसंभवः । उभयोर्यश्च गुह्यस्थः सर्वगश्च न सिद्ध्यति ॥२३॥

असाध्य शोथ—जो शोथ मनुष्य में पैरों से उत्पन्न हो कर मुख की ओर आता है तथा स्त्रियों में मुख से उत्पन्न हो कर पैरों की ओर आता है वह असाध्य होता है। अथवा स्त्री एवं पुरुष दोनों के ही गुह्यस्थानों पर तथा सम्पूर्ण शरीर पर होने वाली शोथ असाध्य होती है। पुरुष का ऊर्ध्वकाय प्रधान एवं भारी माना गया है अतः पैरों से प्रारम्भ हो कर मुख (प्रधान स्थान) की ओर आने वाली शोथ असाध्य हो जाती है। इसी प्रकार स्त्री का अधः काय प्रधान एवं भारी होता है अतः मुख से प्रारम्भ हो कर पैरों (प्रधान स्थान) की ओर आने वाली शोथ असाध्य होती है ॥२३॥

मारुतः सर्वशोफानां मूलहेतुरुदाहृतः । यथा च पित्तं दाहस्य, शैत्यस्य च यथा कफः ॥२४॥

जिस प्रकार दाह का मूल हेतु पित्त होता है तथा शीतलता का कफ होता है उसी प्रकार सब शोफों का मूल हेतु वायु माना गया है। इसी लिये चरक चि. अ. १२ में शोथ की सम्प्राप्ति बताते हुए कहा है कि जब दूषित हुआ वायु बाह्य शिराओं में पहुंच कर कफ, रक्त और पित्त को दूषित करता है तब उनके द्वारा मार्ग के रुक जाने से अन्य स्थानों पर न जा सकने के कारण वहीं उभर कर शोथ हो जाती है। अर्थात् शोथ में सर्व प्रथम वायु ही दूषित होता है तथा वही कफ, पित्त आदियों को दूषित करके शोथ का कारण बनता है ॥२४॥