काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]
त्वग्रक्तमांसमेदांसि शोथोऽधिष्ठाय वर्धते । तदस्याशु क्रियां कुर्याद्दारुणस्य यथोत्तरम् ।। २५ ।।
शोथ त्वचा, रक्त, मांस और मेदा का आश्रय करके बढ़ता है। यह यथोत्तर दारुण होता जाता है। इस लिये इसकी शीघ्र ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् शोथ क्रमशः त्वचा से रक्त, रक्त से मांस और मांस से मेदा में आश्रय करता हुआ बढ़ता जाता है। तथा यह क्रमशः कष्टसाध्य होता जाता है अर्थात् त्वचा की अपेक्षा रक्त में पहुंचने पर अधिक कष्टसाध्य हो जाता है। रक्त की अपेक्षा मांस में तथा मांस की अपेक्षा मेदा में पहुंचने पर कष्टसाध्य हो जाता है। इस लिये इसकी प्रारंभ से ही चिकित्सा करनी चाहिये जिससे यह पहली से अगली धातु में न पहुंचने पाये ।। २५ ।।
कफपित्तोत्तरे शोफे क्षामदेहस्य देहिनः । वमनाद्यां क्रियां कुर्यात्तद्युक्तमनिलोत्तरे ।। २६ ।।
शाल्यन्नमुद्गमण्डेन शोथी भुञ्जीत मात्रया । सबालमूलकव्योषपिप्पलीकेन वाऽऽदितः ।। २७ ।।
जिस शोथ में कफ एवं पित्त की प्रधानता हो तथा रोगी का शरीर क्षीण हो उसमें प्रारंभ में वमन कराना चाहिये। तथा वातप्रधान शोथ में रोगी को युक्तिपूर्वक मात्रा में शालि चावल तथा मुद्गमण्ड के साथ अथवा कच्ची मूली, त्रिकटु तथा पिप्पली के साथ भोजन करे ।। २६-२७ ।।
लध्वामाशयकोष्ठस्य पञ्चगव्येन सर्पिषा । कल्याणकेन तिक्तेन दशमूलादिकेन वा ।। २८ ।।
स्निग्धस्विन्नस्य वमनं विदध्याच्च विरेचनम् । ततो दशाहान् सोऽश्रीयात् पयसा वाऽप्पभोजनम् ।।
रोगी का आमाशय एवं कोष्ठ लघु हो जाने पर उसे स्नेहन तथा स्वेदन कराकर पञ्चगव्य घृत, कल्याण घृत, तिक्त घृत अथवा दशमूल घृत के द्वारा वमन एवं विरेचन कराये। उसके बाद दस दिन तक उसे दूध के साथ भोजन कराना चाहिये ।। २८-२९ ।।
ततो यवान्नं तक्रेण शीलयेच्च यथाबलम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४१ तमं पत्रम्)
पञ्चमुष्टिकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा ।। ३० ।।
तदनन्तर रोगी को बल के अनुसार तक्र, पञ्चमुष्टिक यूष, अथवा जाङ्गल मांसरस के साथ यवान्न (यवों का बना हुआ भात) का सेवन करना चाहिये ।। ३० ।।
दधिमद्यसुरास्नेहशाकपिष्टाम्लसेवनम् । असात्म्यानि निदानं च वर्जयेत् पथ्यमाचरेत् ।। ३१ ।।
शोथ में अपथ्य—दही, मद्य, सुरा, स्नेह (घृत तैल आदि स्निग्ध द्रव्य), शाक, उड़द की पिठ्ठी आदि तथा अम्ल (खट्टे द्रव्य-अचार चटनी आदि) का सेवन और अन्य असात्म्य एवं निदानोक्त भावों का त्याग करना चाहिये। तथा पथ्य का सेवन करना चाहिये ।। ३१ ।।
सगुडं शृङ्गबेरं च भक्षयेत् प्रातरुत्थितः । हरीतकीं गुडयुतां त्रिस्र¹मां वाऽभ्यसेत् सदा ।। ३२ ।।
प्रातःकाल उठ कर रोगी को अदरक अथवा हरीतकी में गुड मिलाकर सेवन करना चाहिये। अथवा समान भाग हरीतकी, गिलोय और सोंठ के चूर्ण का प्रयोग करना चाहिये ।।
१. समभागा हरीतकी गुडूची शुण्ठी=त्रिसमा।