भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 942 में से

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पृष्ठ 883

शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२३

पिप्पलीवर्धमानं वा, पिप्पल्यो मधुकेन वा । देवदार्वाभयाशुण्ठीचूर्णकल्कमथापि वा ।।३३।।
पिबेत्त्रयाणामेतेषां क्वाथं च सपुनर्नवम् ।

अथवा वर्धमान पिप्पली का प्रयोग करना चाहिये या पिप्पली और मुलहठी का प्रयोग करे। अथवा पुनर्नवा के साथ देवदारु, हरड़ तथा सोंठ—इन तीनों के चूर्ण के कल्क का क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥३३॥

महौषधं चित्रकं वा पिप्पल्यो देवदारु वा ।।३४।।
तक्रेण पयसा वाऽथ सेवमानः सुखी भवेत् ।

अथवा सोंठ, चित्रक, पिप्पली और देवदारु के चूर्ण को तक्र या दूध से पीने से रोगी सुखी (स्वस्थ) होता है ॥३४॥

चित्रामूलाग्निकश्यामात्रिव्योषैर्वा शृतं पयः ।।३५।।
महौषधं देवदारुकल्कं वा पयसा पिबेत् ।

चित्रा (द्रवन्ती अथवा इन्द्रवारुणी) की जड़, चित्रक, त्रिवृत् तथा त्रिकुट से सिद्ध किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये अथवा दूध के साथ सोंठ और देवदारु के कल्क का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥

गन्धर्वहस्तं त्रिव्योषं श्यामामूलं च पञ्चमम् ।।३६।।
क्षीरसिद्धं पिबेदेतद्यस्य स्याच्छ्वयथुर्महान् ।

जिसके शरीर में महान् शोथ हो उसे एरण्ड, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) और त्रिवृन्मूल—इन पांचों द्रव्यों को दूध में सिद्ध करके पीना चाहिये ॥३६॥

गोमूत्रं महिषीमूत्रमुष्ट्रमूत्रमथो पिबेत् ।।३७।।
यथास्वं क्षीरमिश्रं वा शीलयेच्छोफशान्तये ।

शोफ (शोथ) की शान्ति के लिये गौ, भैंस तथा ऊंटनी का मूत्र पीना चाहिये। अथवा उपर्युक्त मूत्रों में योग्य परिमाण में दूध मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥३७॥

सर्पिः पुनर्नवाक्वाथे कल्कैरेभिविपाचयेत् ।।३८।।
व्योषमुस्ता .......... दिने दिने । सर्वेषामेव शोथानां प्रयोगोऽयं विधीयते ।।३९।।

पुनर्नवा के क्वाथ में त्रिकटु, नागरमोथा आदि ओषधियों का कल्क डालकर घृत सिद्ध करना चाहिये। सम्पूर्ण शोथों में प्रतिदिन इसका प्रयोग करना चाहिये ॥३८-३९॥

अयोरजस्त्रिकटुकं त्रिवृता कटुरोहिणी । त्रिफलाया रसेनैतत् पीत्वा चूर्णं सुखी भवेत् ।।४०।।

त्रिफला के रस के साथ लोहचूर्ण, त्रिकटु, त्रिवृत् तथा कुटकी के चूर्ण का सेवन करके रोगी सुखी होता है ॥४०॥

त्रिफला त्रिवृता दन्ती विडङ्गं गजपिप्पली । त्रिव्योषं रोहिणी दारु चित्रकं चेति चूर्णयेत् ।।४१।।
अयोरजस्तद् द्विगुणं क्षीरेणाभ्यस्य मुच्यते ।

त्रिफला, त्रिवृत्, दन्ती, विडङ्ग, गजपिप्पली, त्रिकटु, रोहिणी, दारुहल्दी तथा चित्रक का चूर्ण बनाये । इसमें इन सबसे दुगुना लोहचूर्ण मिलाये । इसे दूध के साथ सेवन करने से रोगी रोगमुक्त हो जाता है ॥४१॥

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