भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 884

५२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]

त्रिव्योषत्रिफलामुस्ताविडङ्गचित्रकाः समाः ।।४२।। नवैते सुधृता भागा नवायोरजसस्तथा । तच्चूर्णं मधुना लीढ्वा भुञ्जीत यवषष्टिकम् ।।४३।। शुष्कमूलकयूषेण मुस्ताक्तपयसाऽपि वा ।

त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), नागरमोथा, बिडङ्ग तथा चित्रक—ये ९ द्रव्य तथा लोहचूर्ण—इन सबको समभाग में लेकर बनाये हुए चूर्ण को मधु से चाटकर ऊपर से सूखी मूली के यूष अथवा नागरमोथे से युक्त दूध के साथ जौ और सांठी के चावलों का भोजन करना चाहिये ।।४२-४३।।

भल्लातकं त्रिवृद्दन्ती त्रिव्योषं त्रिफलाऽग्निकः ।।४४।। तिला गुडा विडङ्गं च मधु सर्पिरयोरजः । नाम्ना कटुकबिन्दुहि लेहः शोथप्रमर्दनः ।।४५।।

कटुकबिन्दु अवलेह—भिलावा, त्रिवृत्, दन्ती, त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, तिल, गुड, विडङ्ग, मधु, घृत तथा लोहचूर्ण-इन सबको मिलाकर अवलेह बनाया जाता है। इसका नाम कटुकबिन्दु है। यह शोथ को नष्ट करता है ।।४४-४५।।

सामान्यैतदाख्यातं पृथक्त्वेन निबोध मे । तत्रादितः प्रवक्ष्यामि वातिकस्य भिषग्जितम् ।।४६।।

यह सब शोथों की सामान्य चिकित्सा कही गई है। अब मेरे से इनकी पृथक् २ चिकित्सा सुनो। सबसे पहले मैं वातिक शोथ की चिकित्सा कहूंगा ।।४६।।

कुलत्थयवकोलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । निर्यूहे साधितं तैलं कल्कैरेतैः समांशिकैः ।।४७।। शतावरीकृष्णगन्ध्यायष्टीमधुकजीवनैः । सक्षीरैस्तत् पिबेत् काले कुर्यादभ्यञ्जनं च तत् ।।४८।।

वातिक शोथ की चिकित्सा—कुलत्थ, यव, कोल तथा दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) के क्वाथ में समान मात्रा में शतावरी, कृष्णगन्धा (सहिजना), मुलहठी तथा जीवनीय गण की ओषधियों का कल्क डालकर तैल सिद्ध करे। उचित काल में दूध के साथ इस तैल का पान तथा अभ्यंग द्वारा सेवन करे ।।४७-४८।।

शताह्वां मधुकं दारु सश्वेतां च गवाडनीम् । वत्साडनीं च पिष्ट्वा तैः सुखोष्णैः शोथमादिहेत् ।।४९।।

शतपुष्पा (सौंफ), मुलहठी, दारुहल्दी, श्वेता (सफेद वच), गवाडनी (इन्द्रवारुणी) तथा वत्साडनी (गिलोय) इन्हें पीस ले । शोथ पर इसका सुखोष्ण लेप करे ।।४९।।

वर्चीवं बिल्वमेरण्डं तर्कारीं सपुनर्नवाम् । निष्क्वाथ्य वारिणोष्णेन श्वयथुं परिषेचयेत् ।।५०।।

वर्चीव (श्वेत पुनर्नवा), बिल्व, एरण्ड, तर्कारी (अग्निमन्थ अथवा जयन्ती) तथा रक्त पुनर्नवा-इनका क्वाथ बनाये । इस उष्ण क्वाथ से शोथ का परिषेचन करना चाहिये ।।५०।।

तिलानां सर्षपाणां च गोधूमस्य यवस्य च । चूर्णानां तैलमिश्राणामुपनाहं विधापयेत् ।।५१।। तथैवैरण्डबीजानां भृष्टानां वोपनाहनम् ।

तिल, सरसों, गेहूं तथा जौ के चूर्ण को तिल तैल में मिलाकर (उपनाह) (पुलटिस) लगानी चाहिये। अथवा एरण्ड के बीजों को भूनकर अवलेह बनाये ।।५१।।

एरण्डो बिल्वमूलं च बृहती कण्टकारिका ।।५२।।