काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२५
करञ्जश्चिरिबिल्वश्च श्वदंष्ट्रा च समांशिका । लेपोऽयं सर्पिषा युक्तो वातश्वयथुनाशनः ।।५३।। एष एव यथालाभं परिषेकः सुखावहः ।
वातशोथ को नष्ट करने के लिये एरण्ड, बिल्वमूल, बृहती, कटेरी, करञ्ज, चिरबिल्व (नाटाकरञ्ज अथवा पूतिकरञ्ज) तथा गोखरू समभाग लेकर चूर्ण करके घी में मिलाकर लेप करना चाहिये तथा इन्हीं वस्तुओं में से जो २ मिल जायें उनका परिषेक करना चाहिये । यह सुखकारी होता है ।।
शारिवा मूलकं शुष्कं शुकनासा महौषधम् ।।५४।। कुष्ठं मुस्ता जलं लम्बा प्रलेपः शोफनाशनः ।
सारिवा, सूखीमूली, शुकनासा (श्योनाक-अरलु), साठ, कुष्ठ, नागरमोथा, हीबेर (सुगन्धवाला) तथा लम्बा (कटुकालाबु) का लेप शोथ को नष्ट करता है ।।५४।।
श्वदंष्ट्रैरण्डमूलं च बिल्वमूलं महौषधम् ।।५५।। पुराणमूलकं चैषां क्वाथे क्षीरं विपाचयेत् । क्षीरावशेषमाहृत्य काले सघृतशर्करम् ।।५६।। यथाग्नि पाचयेदेनं वातश्वयथुनाशनम् ।
गोखरू, एरण्डमूल, बिल्वमूल, सोंठ—इन सबकी पुरानी जड़ों का क्वाथ बनाकर उसमें दूध डालकर पाक करें । दुग्धमात्र शेष रहने पर उतार ले । फिर इसमें घी और शर्करा मिलाकर क्रमशः मन्द, मध्य एवं तीक्ष्ण अग्नि पर उसे पकाये । यह घृत वातशोथ को नष्ट करता है ।।५५-५६।।
एरण्डतैलं पयसा गवां मूत्रेण वा पिबेत् ।।५७।। तेनास्य दोषशेषश्च श्वयथुश्च निवर्तते ।
दूध अथवा गोमूत्र के साथ रोगी को एरण्डतैल पिलाये । इससे उसके अवशिष्ट दोष तथा शोथ नष्ट हो जाता है ।।५७।।
लघून्यन्नानि भुञ्जीत स्निग्धोष्णसहितानि च ।।५८।। (इति ताडपत्रपुस्तके २४२ तमं पत्रम्)
तथा इस वातशोथ में, लघु, स्निग्ध एवं उष्ण अन्न का भोजन करना चाहिये ।।५८।।
अथ पित्तसमुत्थस्य प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् । अभयाऽऽमलकीदन्तीत्रिकर्ममधुचन्दनैः ।।५९।। संजीवनीयमञ्जिष्ठैर्मधूककुसुमैः समैः । सक्षीरैः पाचितं सर्पिः शोफस्याभ्यञ्जनं परम् ।।६०।। पानं चैतत् प्रदातव्यं शोफरोगनिवारणम् ।
अब मैं पैत्तिक शोथ की चिकित्सा कहूँगा । पैत्तिक शोथ की चिकित्सा—हरड़, आंवला, दन्ती, त्रिकर्म, मधु, चन्दन, जीवनीयगण की ओषधियां, मंजीठ तथा महुए के फूल समभाग तथा दूध के द्वारा पकाये हुए घृत का शोथ में अभ्यङ्ग करना चाहिये । तथा शोथरोग को नष्ट करने के लिये इस घृत को पीना भी चाहिये ।।५९-६०।।
वक्तव्य—त्रिकर्म-त्रिकर्म के स्थान पर यदि त्रिकर्ष पाठ हो तो अर्थ ठीक प्रतीत होता है । त्रिकर्ष शब्द-सोंठ, अतीस तथा नागरमोथे के लिये सम्मिलित रूप में व्यवहृत होता है । राजनिघण्टु में कहा है—नागरातिविषामुस्ता त्रयमेतत्त्रिकर्षिकम् ।।