भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 886

५२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]

जीवकर्षभकावैन्द्री मधुपर्णी शतावरी ।। ६१ ।।
मुदिता वेतसं चैव प्रलेपः सरसाञ्जनः ।

जीवक, ऋषभक, ऐन्द्री (इन्द्रवारुणी), मधुपर्णी (गिलोय), सतावरी, मुदिता तथा वेतस् में रसाञ्जन मिलाकर शोथ पर लेप करना चाहिये ।।६१।।

तालीशोशीरमुदिताचन्दनं सरसाञ्जनम् ।। ६२ ।।
मधुकं पद्मकं चेति लेपः श्वयथुनाशनः ।

तालीशपत्र, खस, मुदिता, चन्दन, रसौंत, मुलहठी तथा पद्माख—यह लेप शोथ को नष्ट करता है ।।६२।।

शतावरीं हंसपदीं मधुपर्णीं च चित्रकम् ।। ६३ ।।
बन्दां तालीसपत्रं च पिष्ट्वा श्वयथुमादिहेत् ।

शतावर, हंसपदी, गिलोय, चित्रक, बन्दा तथा तालीशपत्र को पीसकर शोथ पर लेप करना चाहिये ।।६३।।

क्षीरद्रुमाणां त्वङ्‌मूलक्वाथस्तु परिषेचने ।। ६४ ।।
सदाहरागपाके च हितः सक्षीरशर्करः ।

शोथ में दाह, राग (लालिमा) तथा पाक होने पर क्षीरी वृक्षों की त्वचा तथा मूल के क्वाथ में दूध तथा शर्करा मिलाकर परिषेचन करना चाहिये ।।६४।।

त्रिवृन्मधुकमृद्वीकाकाश्मर्याभिः शृतं पयः ।। ६५ ।।
विरेचनीयमन्यद्वा यथावस्थं प्रयोजयेत् ।

विरेचन के लिये त्रिवृत्, मुलहठी, मुनक्का तथा गंभारी के द्वारा सिद्ध किया हुआ दूध अथवा अवस्था के अनुसार अन्य द्रव्य प्रयुक्त करना चाहिये ।।६५।।

नात्यच्छस्निग्धशीतानि स्वादूनि च लघूनि च ।। ६६ ।।
पयो द्रवाणि भुञ्जीत यथोक्तानि च मात्रया ।

पैत्तिक शोथ में पथ्य—जो बहुत अधिक सान्द्र, स्निग्ध तथा शीतल नहीं है ऐसे तथा स्वादु एवं लघु द्रव्य, दूध तथा अन्य यथोक्त द्रव पदार्थों का मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ।।

श्वयथोः कफजस्यापि चिकित्सां शृण्वतः परम् ।। ६७ ।।

अब कफज श्वयथु (शोथ) की भी चिकित्सा सुनो ।।६७।।

ह्रीबेरागरुदारूणि चव्यचित्रकनागरम् । अभया पिप्पलीमूलं रजन्यौ हिङ्गु मात्रया ।। ६८ ।।
क्वाथं गोमूत्रपिष्टं वा पिबेच्छोफनिबर्हणम् ।

कफज शोथ की चिकित्सा—शोथ को नष्ट करने के लिये ह्रीबेर (बालक), अगरु, देवदारु, चव्य, चित्रक, सोंठ, हरड़, पिप्पलीमूल, हल्दी, दारुहल्दी तथा हींग आदि का क्वाथ बनाकर अथवा गोमूत्र में पीसकर पीना चाहिये ।।६८।।

चित्रकारग्वधौ मूर्वाविडङ्गामलकाभयाः ।। ६९ ।।
पिप्पलीशारिवापाठाकषायं मधुना पिबेत् ।