काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२७
चित्रक, अमलतास, मूर्वा (मोरबेल), विडङ्ग, आंवला, हरड़, पिप्पली, सारिवा तथा पाठा-इनका कषाय मधु के साथ पीना चाहिये ॥६९॥
देवदारु च पाठां च शृङ्गबेरं च भागशः ।।७०।।
तथा पुष्करमूलं च गोमूत्रक्वथितं पिबेत्।
देवदारु, पाठा, अदरक तथा पुष्करमूल की गोमूत्र में क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥७०॥
पाठा मुस्ताऽभया दारु चित्रको विश्वभेषजम् ।।७१।।
पिप्पल्यातिविषा मूर्वा तथा ताडकपत्रिका। बाधासु तत् पिबेत् पूतं कफश्वयथुनाशनम् ।।७२।।
श्लैष्मिक शोथ के कष्ट को दूर करने के लिये पाठा, नागरमोथा, हरड़, देवदारु, चित्रक, सोंठ, पिप्पली, अतीस, मूर्वा तथा ताडपत्र के क्वाथ को छानकर पीना चाहिये ॥७१-७२॥
तगरागरुमुस्तानि सरलं देवदारु च। कुष्ठं त्वचा च लेपोऽयं कफश्वयथुवारणः ।।७३।।
तगर, अगरु, नागरमोथा, सरल (चीड़), देवदारु तथा कुष्ठ की छाल का लेप श्लैष्मिक शोथ को नष्ट करता है ॥७३॥
कालां गोधापदीं हिंस्रां सुषवीं तालपत्रिकाम्। पिष्ट्वा शीतकमूलं च शोथमस्य प्रलेपयेत् ।।७४।।
काला (त्रिवृत्), गोधापदी (हंसपदी), हिंस्रा (जटामांसी), सुषवी (काला जीरा), तालपत्रिका (मुशली-मूसली) तथा शीतक (अशनपर्णी)-की जड़ों को पीसकर शोथ पर लेप करना चाहिये ॥७४॥
कुष्ठच्छत्राकवल्कं च यातुमूलं त्रिकण्टकम्। भद्रदारुं सुगन्धां च पिष्ट्वोष्णैः शोफमादिहेत् ।।७५।।
कुष्ठ तथा छत्राक (आंवला) की छाल, यातुक्रमूल (पत्र शाक विशेष), गोखुरू, देवदारु तथा सुगन्धा (सर्पलोचना अथवा स्पृक्का) को पीसकर गरम करके शोथ पर लेप करे ॥
मूलकानि च शुष्काणि भद्रमुस्तं सशारिवम्। गोमूत्रपिष्टो लेपोऽयं श्वयथोविनिवारणः ।।७६।।
सूखी मूली, नागरमोथा तथा सारिवा को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से शोथ नष्ट हो जाता है ॥७६॥
पलाशभस्म चैकाङ्गलेपो गोमूत्रसंयुतः। श्लैष्मिके श्वयथावेष परिषॆको विधीयते ।।७७।।
पञ्चमूलशृतं तोयं गोमूत्रं वाऽपि केवलम्।
पलाश (ढाक) की भस्म को गोमूत्र में मिलाकर अङ्ग पर लेप करना चाहिये। श्लैष्मिक श्वयथु में पञ्चमूल से सिद्ध किये हुए जल अथवा अकेले गोमूत्र के द्वारा परिषेचन करना चाहिये ॥७७॥
निम्बाङ्कोठोरुपूगानां तर्कार्याः कुटजस्य च ।।७८।।
नक्तमालस्य वंशस्य पत्रक्वाथोऽवगाहनः।
नीम, अङ्कोठ (Alangium Decapetalum-निकोचक), एरण्ड, तर्कारी (अग्निमन्थ-अरणी), कुटज, नक्तमाल (करञ्ज) तथा बांस के पत्तों के क्वाथ से अवगाहन करना चाहिये ॥७८॥
त्रिफला चित्रकवचे द्वे हरिद्रे कुठेरकः ।।७९।।
५६ का.सं.