भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 888

५२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]

श्यामाखुकर्णीकटुकाकाकमाचीसुवर्चलाः । वार्तार्की निचुलं निम्बो विडङ्गं विश्वभेषजम् ।।८०।। रास्ना पुनर्नवा मूर्वा कुष्ठं व्याघ्रनखं वृषम् । शिग्रुमूलमथार्कं च यथालाभं समाहृतैः ।।८१।। गोमूत्रपिष्टैर्लेपः स्यात् कथितैः परिषेचनम् । एतैरेव द्रवैः पकैरभ्यङ्गः शोथनाशनः ।।८२।।

त्रिफला, चित्रक, बच, हल्दी, दारुहल्दी, कुठेरक (श्वेत तुलसी भेद-हाराणचन्द्र), श्यामा (त्रिवृत्-काली निशोथ), आखुकर्णी, कुटकी, मकोय, हुलहुल, वार्तार्की (बैंगन), निचुल (हिज्जल-समुद्रफल), नीम, विडङ्ग, सोंठ, रास्ना, पुनर्नवा, मूर्वा (मोरबेल), कुष्ठ, व्याघ्रनख (नखी-व्याघ्रनख नामक गन्धद्रव्य), वृष (बांसा), सहिजने की जड़ तथा आक इनमें से जो २ द्रव्य मिल सकें उन्हें लेकर गोमूत्र में पीसकर लेप करें तथा इन्हीं के क्वाथ से परिषेक और इन्हीं द्रव्यों को पकाकर अभ्यङ्ग करने से शोथ नष्ट होता है ।।७९-८२।।

पटोलमूलं त्रिफला विडङ्गं रजनीति षट् । कार्षिकाः स्युस्तथैकस्माद् द्विगुणं रोचनीफलम् ।।८३।। नीलिका त्रिगुणा देया त्रिवृता तु चतुर्गुणा । चूर्णमेतद्गवां मूत्रसंयुक्तं मात्रया पिबेत् ।।८४।। काले विरिक्तो भुञ्जीत जाङ्गलानां रसेन तु ।

पटोल की जड़, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), विडङ्ग तथा हल्दी-ये छहों द्रव्य प्रत्येक १ कर्ष, जमाल गोटा इससे दुगुना (अर्थात् २ कर्ष), नीलिका (विद्रुमलता अथवा रुक्मलौह) तिगुना (अर्थात् ३ कर्ष) तथा त्रिवृत् चौगुना (अर्थात् ४ कर्ष)-इनका चूर्ण योग्यमात्रा में गोमूत्र में मिलाकर पीये। इससे उचित समय में विरेचन हो जाने के बाद जांगल मांस रस का भोजन करना चाहिये ।।८३-८४।।

त्रिफला सरलं दारु रजन्यो रोहिणी वचा ।।८५।। पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरातिविषे घनम् । क्षारद्वयं विडङ्गं च पाठाऽगरु सचित्रकम् ।।८६।। अयोरजश्च चूर्णानि गोमूत्रेण विपाचयेत् । (इति ताडपत्रपुस्तके २४३ तमं पत्रम् ।) द्रा(क्षाव)लयमाहृत्य गुटिका बदरोपमाः ।।८७।। कृत्वाऽथैकां ततो द्वे वा पिबेदुष्णेन वारिणा । मुच्यते कफजाच्छोफाद्देवं श्वयथुपीडितः ।।८८।। एषा हि ग्रहणीदोषं पाण्डुरोगं कफात्मकम् । कफार्शांसि च वृद्धिं च प्रमेहं च शमं नयेत् ।।८९।।

त्रिफला, सरल (चीड़), देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, रोहिणी, बच, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोंठ, अतीस, घन (नागरमोथा), दोनों क्षार (सर्जक्षार तथा यवक्षार), विडङ्ग, पाठा, अगरु, चित्रक तथा लोहचूर्ण-इन सबका चूर्ण करके गोमूत्र से पकाये। फिर मुनक्के के साथ पीसकर बेर के समान गोलियां बनाये। ये एक या दो गोलियां उष्ण जल के साथ सेवन करनी चाहिये। इस प्रकार कफज शोथ से पीडित रोगी शोथ से मुक्त हो जाता है। यही प्रयोग ग्रहणी दोष, श्लैष्मिक पाण्डु, श्लैष्मिक अर्शरोग, वृद्धि तथा प्रमेह रोग को शान्त करता है ।।८५-८९।।

पञ्चमूलं वरुणाकं सरलं देवदारु च । हस्तिकर्णपलाशश्च फलानि निचुलस्य च ।।९०।। पलाशः काकला काला गुडूची देवपुष्पकम् । अहिंस्रा श्रेयसी हिंस्रा कृष्णागन्धा पुनर्नवा ।।९१।। कायस्था च वयःस्था च चोरको जटिला जटा । अलम्बुषं सोरुपूगं प्रपुन्नाडं सनागरम् ।।९२।।