काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशोथचिकित्साध्यायः १७] खिल्स्थानम् ५२९
शिग्रुर्गोधापदी भार्गी तर्कारी शुष्कमूलकम्। एतैः सिद्धं यथालाभं तैलमभ्यञ्नैस्त्रिभिः ।।९३।। निहन्युदीर्णंश्वयथुं जन्तोर्वातकफोत्तरम् ।
पञ्चमूल (बृहत् पञ्चमूल-बिल्व, श्योनाक, गंभारी, पाटला, गणिकारिका), वरुण, सरल (चीड़), देवदारु, हस्तिकर्ण पलाश (गजकर्णाकार पत्र वाला पलाश भेद-भूपलाश), निचुल (जलवेतस्) के फल, पलाश, काकला (षष्टि धान्य जाति भेद), काला (त्रिवृत्-काली निशोथ), गिलोय, लौंग, अहिंस्रा (कण्टकपाली), श्रेयसी (हरड़), हिंस्रा (जटामांसी अथवा कण्टकारी), कृष्णगन्धा (शोभाञ्जन-सहिजना), पुनर्नवा, कायस्था (आंवला), वयस्था (हरड़), चोरक (गन्धद्रव्य विशेष-ग्रन्थिपर्णकभेद-डल्हण, भटेउर), जटिला (जटामांसी), जटा (भूम्यामलकी), अलम्बुष (भूकदम्ब), उरुबूक (एरण्ड), प्रपुन्नाट (चक्रमर्द-पवाड), सोंठ, सहिजना, गोधापदी (हंसपदी), भार्गी, तर्कारी (अग्निमन्थ), सूखीमूली- इनमें से जो २ औषध मिल सके उनसे सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग करने से तीनों प्रकार के विशेषकर वात एवं कफ की प्रधानता वाले शोथ नष्ट हो जाते हैं ।।९०-९३।।
उभे हरिद्रे मञ्जिष्ठा यष्टीमधुकचन्दनम् ।।९४।। पिप्पल्यो बालकं चैव पीतद्रुः पद्मकं तथा । मांम्युशीरं सतगरमेलाऽगरु कुटन्नटम् ।।९५।। श्रीवेष्टकं सर्जरसं मूर्वाकुष्ठप्रियङ्गवः । एतैस्तैलं विपक्तव्यमभ्यङ्गाच्छोथनाशनम् ।।९६।।
हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, मुलहठी, रक्तचन्दन, पिप्पली, बालक (हीबेर), पीतद्रु (सरल-चीड़), पद्माख, जटामांसी, खस, तगर, छोटी इलायची, अगर, कुटन्नट (भद्रमुस्ता), श्रीवेष्टक, (सरल निर्यास-गन्धाबिरोजा), सर्जरस (राल-Resin), मूर्वा (मोरबेल), कुष्ठ तथा प्रियङ्गु-इन ओषधियों से तैल सिद्ध करके पकाना चाहिये । यह शोथ को नष्ट करता है ।।९४-९६।।
क्रियैषा दोषजस्योक्ताऽऽगन्तोर्वैसर्पवत् क्रिया । अग्निसादो ज्वरस्तृष्णा कार्श्यारुचितमोभ्रमाः ।।९७।। श्वासव्रणातिसाराश्च स्वैश्चिकित्स्या उपद्रवाः ।।९८।।
यह दोषज (निज) शोथ की चिकित्सा कही गई है । आगन्तु शोथ की विसर्प के समान चिकित्सा करनी चाहिये । शोथ के उपद्रव-अग्निमान्द्य, ज्वर, तृष्णा, कृशता, अरुचि, तमोगुण की प्रधानता, भ्रम (शिरोभ्रम), श्वास, व्रण, अतिसार, ये शोथ के उपद्रव होते हैं। इन उपद्रवों की अपनी २ चिकित्सा करनी चाहिये ।।९७-९८।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्साध्यायः सप्तदशः ।।१७।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्सिताध्यायः सप्तदशः ।।१७।।