काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिल्स्थानम् ५२९
शिग्रुर्गोधापदी भार्गी तर्कारी शुष्कमूलकम्। एतैः सिद्धं यथालाभं तैलमभ्यञ्नैस्त्रिभिः ।।९३।। निहन्युदीर्णंश्वयथुं जन्तोर्वातकफोत्तरम् ।
पञ्चमूल (बृहत् पञ्चमूल-बिल्व, श्योनाक, गंभारी, पाटला, गणिकारिका), वरुण, सरल (चीड़), देवदारु, हस्तिकर्ण पलाश (गजकर्णाकार पत्र वाला पलाश भेद-भूपलाश), निचुल (जलवेतस्) के फल, पलाश, काकला (षष्टि धान्य जाति भेद), काला (त्रिवृत्-काली निशोथ), गिलोय, लौंग, अहिंस्रा (कण्टकपाली), श्रेयसी (हरड़), हिंस्रा (जटामांसी अथवा कण्टकारी), कृष्णगन्धा (शोभाञ्जन-सहिजना), पुनर्नवा, कायस्था (आंवला), वयस्था (हरड़), चोरक (गन्धद्रव्य विशेष-ग्रन्थिपर्णकभेद-डल्हण, भटेउर), जटिला (जटामांसी), जटा (भूम्यामलकी), अलम्बुष (भूकदम्ब), उरुबूक (एरण्ड), प्रपुन्नाट (चक्रमर्द-पवाड), सोंठ, सहिजना, गोधापदी (हंसपदी), भार्गी, तर्कारी (अग्निमन्थ), सूखीमूली- इनमें से जो २ औषध मिल सके उनसे सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग करने से तीनों प्रकार के विशेषकर वात एवं कफ की प्रधानता वाले शोथ नष्ट हो जाते हैं ।।९०-९३।।
उभे हरिद्रे मञ्जिष्ठा यष्टीमधुकचन्दनम् ।।९४।। पिप्पल्यो बालकं चैव पीतद्रुः पद्मकं तथा । मांम्युशीरं सतगरमेलाऽगरु कुटन्नटम् ।।९५।। श्रीवेष्टकं सर्जरसं मूर्वाकुष्ठप्रियङ्गवः । एतैस्तैलं विपक्तव्यमभ्यङ्गाच्छोथनाशनम् ।।९६।।
हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, मुलहठी, रक्तचन्दन, पिप्पली, बालक (हीबेर), पीतद्रु (सरल-चीड़), पद्माख, जटामांसी, खस, तगर, छोटी इलायची, अगर, कुटन्नट (भद्रमुस्ता), श्रीवेष्टक, (सरल निर्यास-गन्धाबिरोजा), सर्जरस (राल-Resin), मूर्वा (मोरबेल), कुष्ठ तथा प्रियङ्गु-इन ओषधियों से तैल सिद्ध करके पकाना चाहिये । यह शोथ को नष्ट करता है ।।९४-९६।।
क्रियैषा दोषजस्योक्ताऽऽगन्तोर्वैसर्पवत् क्रिया । अग्निसादो ज्वरस्तृष्णा कार्श्यारुचितमोभ्रमाः ।।९७।। श्वासव्रणातिसाराश्च स्वैश्चिकित्स्या उपद्रवाः ।।९८।।
यह दोषज (निज) शोथ की चिकित्सा कही गई है । आगन्तु शोथ की विसर्प के समान चिकित्सा करनी चाहिये । शोथ के उपद्रव-अग्निमान्द्य, ज्वर, तृष्णा, कृशता, अरुचि, तमोगुण की प्रधानता, भ्रम (शिरोभ्रम), श्वास, व्रण, अतिसार, ये शोथ के उपद्रव होते हैं। इन उपद्रवों की अपनी २ चिकित्सा करनी चाहिये ।।९७-९८।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्साध्यायः सप्तदशः ।।१७।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्सिताध्यायः सप्तदशः ।।१७।।
५३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शूलचिकित्साध्यायः १८]
अथ शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः।
अथातः शूलचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शूल चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
क्षोभात्रासाध्ययनातिप्रसङ्गात् क्षुत्काले चात्यम्भसः पानदोषात्।
वेगानां वा निग्रहाद्यानयानादामाद्भ्रंशाद्रूक्षधान्याशनाद्वा ॥३॥
क्रुद्धो वायुः कर्तनायामतौदैः कम्पाध्मानैराविशन् कुक्षिदेशे।
शूलं पित्तेनान्वितः श्लेष्मणा वा द्वाभ्यां वाऽपि प्रेर्यमाणः करोति ॥४॥
शूल का निदान तथा संप्राप्ति—क्षोभ, त्रास (डर) तथा अध्ययन के अतिप्रसङ्ग (अत्यन्त प्रयोग करने) से, भूख के समय अत्यधिक पानी पीने से, वेगों के निग्रह से, सवारियों में बैठकर चलने से, आमदोष से, भ्रंश (गिरने) से अथवा रूक्ष धान्य के सेवन आदि के प्रकुपित हुआ वायु कर्तन (काटने के समान पीड़ा), आयाम (थकावट), तोद (वेदना), कम्पन तथा आध्मान सहित कुक्षिप्रदेश में प्रविष्ट होकर पित्त, कफ अथवा दोनों से युक्त एवं प्रेरित होता हुआ शूल को उत्पन्न कर देता है ॥३-४॥
वाताच्छूलं क्षुधितस्योग्ररूपं घोरैर्वेगैर्यन्निरुच्छ्वासकर्तृ।
विद्याद्भुक्ते जीर्यति स्वेददाहतृष्णार्तस्य प्रततं पित्तशूलम् ॥५॥
मन्दाबाधं स्तिमितं भुक्तमात्रे कफोद्रेकात् स्तम्भहृल्लासकर्तृ।
विद्याच्छूलं सन्निपाताच्चतुर्थं सर्वैर्लिङ्गैर्दुःसहं तत्त्वसाध्यम् ॥६॥
वातिकशूल—यह भूखे अथवा खाली पेट बढ़ जाती है तथा शूल के तीव्र वेग के समय श्वास रुक जाता है। पैत्तिक शूल—यह शूल भोजन के जीर्ण होने के बाद होती है। इसमें रोगी अत्यधिक स्वेद, दाह तथा तृष्णा से पीड़ित रहता है। श्लैष्मिक शूल—इस शूल में रोगी को कष्ट अधिक नहीं होता है, रोगी स्तिमित सा रहता है, भोजन करने के तुरन्त बाद यह शूल प्रारम्भ होती है तथा इसमें स्तम्भ एवं हृल्लास (जी मचलाना) आदि लक्षण होते हैं। सान्निपातिकशूल—चौथी सान्निपातिक शूल होती है जिसमें उपर्युक्त सब दोषों के लक्षण विद्यमान होते हैं। यह दुःसह एवं असाध्य होती है ॥५-६॥
वायुः प्रोक्तो बलवानुग्रवेगः (सोऽयं)क्रुद्धो देहमाश्रेव हन्ति।
तस्मादादावर्द्दितं वातशूलेनऽभ्यक्ताङ्गं स्वेदयेदाशु वैद्यः ॥७॥
वातघ्नोश्चावगाहोपनाहैः पिण्डस्वेदैरुष्णकैः पायसैर्वा।
वायु अत्यन्त बलवान् तथा उग्रवेग वाला होता है। यह क्रुद्ध (प्रकुपित) होने पर शरीर को शीघ्र ही नष्ट कर देता है। इसलिये वातशूल से पीडित रोगी का सर्वप्रथम स्नेहन कराकर वैद्य को वातनाशक तथा उष्ण अवगाह, उपनाह, पिण्डस्वेद तथा उष्ण पायस (पायसोदन-खीर) आदि के द्वारा स्वेदन करना चाहिये ॥७॥
एणादीनां जाङ्गलानां रसांश्च लावादीनां चान्वितान् सैन्धवेन ॥८॥
स्निग्धोष्णाम्लान् शीलयेद्वातशूली वातघ्नैर्वा साधितं क्षीरमुष्णम् ॥९॥
शूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३१
तैलं शुक्तं मस्तु सौवीरकं च पिबेच्छूली सह सौवर्चलेन ।
वातिकशूल से पीडित रोगी को चाहिये कि वह हरिण, जांगल पशु-पक्षी तथा लाव का लवणयुक्त मांंसरस, स्निग्ध, उष्ण एवं अम्ल पदार्थ, वातघ्न ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध तथा सौवर्चल लवणयुक्त तैल, शुक्त (सिरका), मस्तु तथा सौवीरक (जौ तथा गेहूँ से बनी हुई कांजी) का सेवन करे ॥
श्यामां शुण्ठीं सैन्धवं तुम्बुरूणि हिङ्गु क्षारं यावशूकं विडं च ।।१०।। श्लक्ष्णं पिष्ट्वा प्रवराह्नं शटि च पेयं कोष्णं चाम्भसा वातशूले ।
वातिक शूल में श्यामा (त्रिवृत्), सोंठ, सैन्धव, तुम्बुरु (नेपाली धनिया अथवा तेजबल), हींग, क्षार (सर्जक्षार), यवक्षार, विडलवण, प्रवर (अगरु) तथा शटी (कचूर-कपूर-कचरी)—इन्हें बारीक पीसकर गर्म करके जल के साथ सेवन करना चाहिये ॥१०॥
क्षीरं पीत्वा शीतलं पित्तशूली वमेत् कामं शर्करावारिणा वा ।।११।। शूलार्तं वा शङ्खकुन्देन्दुगौरैर्मुक्ताहारैः संस्पृशेत् पङ्कजैर्वा । रौप्यैः कांस्यैः स्फाटिकैः काञ्चनैर्वा (तोया) सिक्तैर्भाजनैश्चन्द्रशीतैः ।।१२।। यस्मिञ्छूलं संस्पृशेत्तं प्रदेशं भूयो भूयः कदलीनां दलैर्वा । मृद्धीं शय्यां विसिनीपत्रभक्तिन्यासोपेतां चन्दनाम्बुप्रसिक्ताम् ।।१३।। शीते वेश्मन्यहतां सोपधानां सेवेतान्तःप्रस्फुरत्पद्मपत्राम् ।
पैत्तिक शूल के रोगी को शीतल दूध पीकर अथवा पानी में खाण्ड मिलाकर उसका सेवन करके यथेच्छ वमन कर देना चाहिये । उस शूल से पीडित व्यक्ति के शरीर का शंख, कुन्द तथा चन्द्रमा के समान श्वेत कमल की मालाओं के द्वारा तथा चन्द्रमा के द्वारा अथवा चन्द्रमा के समान शीतल (अथवा चन्द्र-कर्पूर डालकर शीतल किये हुए), चांदी, कांसी, स्फटिक तथा सोने के जलपूर्ण पात्रों का स्पर्श कराना चाहिये । अथवा जिस स्थान पर शूल हो उसे बार २ कदलीदलों (केले के पत्तों) के द्वारा स्पर्श कराना चाहिये । उस रोगी को शीतल घर में मृदु, विसिनी (मृणाल) पत्र से युक्त, चन्दन के अर्क से सींची हुई, उपधान (तकिये) से युक्त बिना टूटी हुई तथा जिसमें पद्मपत्र विकसित हों ऐसी शय्या का प्रयोग करना चाहिये ॥११-१३॥
हृद्याः शीता मधुरा भेदनीयाः पेयाः सिद्धाः शीतला वा कषायाः ।।१४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४४ तमं पत्रम् ।)
क्षौद्रोन्मिश्राः स्वादवः पित्तशूलस्योच्छेदार्थं शर्कराचूर्णयुक्ताः ।
तथा पित्त शूल को नष्ट करने के लिये रोगी को मधु एवं शर्करा चूर्ण मिश्रित स्वादु, हृद्य, शीतल, मधु तथा विरेचन गुणयुक्त सिद्ध की हुई पेया अथवा शीतल कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥१४॥
सामे सोत्क्लेशे भोजने वा विदग्धे संशुद्ध्यर्थं सैन्धवोष्णोदकेन ।।१५।। कुर्यात् कामं वमनं श्लेष्मशूले वान्तं चैनं लङ्घितं सुप्रतान्तम् । क्षारोपेतं पाययेत् पाचनीयं पिप्पल्यादिक्राथमुष्णं सहिङ्गु ।।१६।। तत्सिद्धां वा भोजयेत्तं यवागूं संसृष्टान्नः क्रमश्रो वा निषेवेत् । चूर्णं सपिर्वटकक्षारबस्तीन् कल्कक्वाथान् भागशः कल्पशश्च ।।१७।।
५३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शूलचिकित्साध्यायः १८]
श्लैष्मिक शूल में आम रस का उत्क्लेश होने पर अथवा भोजन के विदग्ध होने पर संशोधन के लिये लवणयुक्त गरम पानी से यथेच्छ वमन कराये। वमन के बाद उसे लङ्घन कराकर क्षार मिलाकर कोई पाचन योग पिलाये, गरम २ पिप्पल्यादि क्वाथ में हींग मिलाकर देवे अथवा इसी क्वाथ से सिद्ध की हुई यवागू खिलाये या संसर्जन क्रम से भोजन कराये। इसके अतिरिक्त चूर्ण, सर्पि, वटक, क्षार, बस्ति, कल्क तथा क्वाथ का योग्य परिमाण एवं कल्प के अनुसार प्रयोग करना चाहिये ॥१५-१७॥
शूलाटोपानाहगुल्मामयघ्नं सिद्धं प्रोक्तमृषिभिर्ध्यानयोगात् ॥१८।।
हिङ्गुपाठात्रिकटुकक्षारसैन्धवचित्रकान् । हपुषामभयां चव्यमजाजीधान्यपुष्करान् ।।१९।।
अम्लवेतसवृक्षाम्लयवानीदाडिमानि च । शटिं सौवर्चलं चैव सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।।२०।।
एतद्धि चूर्णमुष्णाम्बुदधिमस्तुसुरासवैः । पीतमानाहहृद्वस्तिशूलगुल्मार्तिनाशनम् ।।२१।।
ऋषियों ने ध्यान (समाधि) के बल से शूल, आटोप, आनाह तथा गुल्म रोगों को नष्ट करने वाला निम्न सिद्ध योग कहा है—हींग, पाठा, त्रिकटु, सर्जक्षार, सैन्धव, चित्रक, हाऊबेर, हरड़, चव्य, अजाजी (अजवायन), धनिया, पुष्करमूल, अम्लवेत, वृक्षाम्ल (तिन्तिडीक–विषांविल), यवानी, अनारदाना, कपूर कचरी, सौवर्चल, इन सबका सूक्ष्म चूर्ण कर ले। यह चूर्ण उष्णजल, दधिमस्तु, सुरा एवं आसव से सेवन करने पर आनाह, हृच्छूल, बस्तिशूल तथा गुल्म रोग को नष्ट करता है ॥१८-२१॥
प्लीहाशोग्रहणीदोषकासश्वासानुरोग्रहम् । मातुलुङ्गरसैर्युक्तं हन्ति मूत्रग्रहं तथा ।।२२।।
उपर्युक्त चूर्ण को ही यदि बिजौरे नीम्बू के रस से सेवन किया जाय तो वह प्लीहावृद्धि, अर्श, ग्रहणी विकार, कास, श्वास, उरोग्रह तथा मूत्रग्रह को नष्ट करता है ॥२२॥
अम्लवेतसवृक्षाम्लयवानीक्षारचित्रकम् । हिङ्गुचव्योषकशटीजीवन्तीत्रिकंटूनि च ।।२३।।
पिप्पलीं पिप्पलीमूलं बदरं शिरिवारिकम् । नागदन्तीं च बिल्वं च तथा लवणपञ्चकम् ।।२४।।
समभागानि मतिमान् सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् । रसेन मातुलुङ्गस्य वटकान् कारयेत्ततः ।।२५।।
गुल्मोदावर्त्तशूलेषु पिबेदेतान्महागुणान् । सुखोष्णवारिमद्याम्लैर्मूत्रकृच्छ्रे तथैव च ।।२६।।
हृद्रोगेषु गुदभ्रंशमेढ्रबस्तिरुजासु च।
अम्लवेतस, वृक्षाम्ल (तिन्तिडीक-विषांबिल), अजवायन, सर्जक्षार, चित्रक, हींग, चव्य, ऊषक (मृत्तिका क्षार अथवा टंकण क्षार-सुहागा), कपूर कचरी, जीवन्ती, त्रिकटु, पिप्पली, पिप्पलीमूल, बेर, शिरिवारिका (चांगेरी), नागदन्ती (स्थूलमूल दन्ती), बिल्व, पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड, उद्भिद्, सामुद्र) ये सब समभाग लेकर सूक्ष्म चूर्ण करे। मातुलुङ्ग के रस से इनकी गोलियां बनाये। ईषदुष्ण जल, मद्य तथा अम्ल (कांजी) के अनुपान से इनका गुल्म, उदावर्त्त, शूल, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग, गुदभ्रंश, मेढ्रशूल तथा बस्तिशूल में प्रयोग करना चाहिये ॥२३-२६॥
विडदाडिमहिङ्गूनि सैन्धवं मरिचं तथा ।।२७।।
मातुलुङ्गरसैर्युक्तं शूलाटोपहरं पिबेत्।
विड नमक, अनारदाना, हींग, सैन्धव तथा मरिच को मातुलुङ्ग के रसमें मिलाकर पीने से शूल तथा आटोप (पेट में वायु के कारण होने वाली गड़गड़ाहट) शान्त होते हैं ॥२७॥
एतानि व्योषपृथ्वीकाचव्यचित्रकसैन्धवैः ।।२८।।
साजाजिपिप्पलीमूलयुतैर्वा पथ्यमुत्तमम् ।
शूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३३
उपर्युक्त योग, त्रिकटु, पृथ्वीका (जीरा या बड़ी इलायची), चव्य, चित्रक, सैन्धव, अजाजी (कालाजीरा) तथा पिप्पलीमूल के साथ सेवन करने से उत्तम पथ्य है ॥२८॥
सौवर्चलवचाहिङ्गुत्र्यूषणं सहरीत कम् ॥२९॥ सुरेशयवसंयुक्तं हन्ति शूलबलं क्षणात्।
सौवर्चल, बच, हींग, त्रिकटु, हरड़ तथा इन्द्रजौ का चूर्ण क्षण भर में ही शूल के वेग को नष्ट कर देता है ॥२९॥
पलिकान् घृतसंयुक्तान् सक्तुसैन्धवचित्रकान् ॥३०॥ वचां चैवैकतः कृत्वा कटाह प्रदहेद्भिषक् । प्रदीप्तमवतार्याथ तं क्षारं मात्रया पिबेत् ॥३१॥ तण्डुलोदकसंयुक्तं शूलगुल्मरुजापहम् ।
वैद्य सत्तू, सैन्धव, चित्रक तथा बच-प्रत्येक १ पल का सूक्ष्म चूर्ण करके कढाई में डालकर जलाये। अत्यन्त प्रदीप्त होने पर उसे उतार ले। इस क्षार का उचित मात्रा में तण्डुलोदक के साथ सेवन करने से शूल तथा गुल्म रोग नष्ट होते हैं ॥३०-३१॥
पञ्चमूलयवक्वाथयुक्तमेरण्डजं पिबेत् ॥३२॥
उपर्युक्त प्रयोजन के लिये ही पञ्चमूल तथा जौ के क्वाथ के साथ एरण्ड के क्षार का प्रयोग करना चाहिये ॥३२॥
तैलं वात्वात्मके शूले द्राक्षाक्वाथयुतं तथा। सशर्करं पित्तशूले पित्तगुल्मे प्लीहेषु च ॥३३॥
वातिक शूल में द्राक्षा के क्वाथ के साथ तथा पैत्तिक शूल, पैत्तिक गुल्म तथा प्लीहारोग में शर्करा के साथ तिलतैल का प्रयोग करना चाहिये ॥३३॥
दाडिमव्योषहपुषापृथ्वीकाक्षारचित्रकैः । साजाजिपिप्पलीमूलचव्यदीप्यकसैन्धवैः ॥३४॥ समांशैर्विपचेत् सर्पिः सक्षीरं मृदुनाऽग्निना । कोलमूलकयूषेण संयुक्तं वातगुल्मनुत् ॥३५॥ शूलानाहश्वासकासविषमज्वरहद्ग्रहान् । अरुचिग्रहणीदोषशूलपाण्ड्वामयांस्तथा ॥३६॥ योनिदोषांश्च हन्येतदमृतप्रतिमं घृतम् ।
अनार दाना, त्रिकटु, हाऊबेर, पृथ्वीका (बड़ी इलायची), सर्जक्षार, चित्रक, अजाजी (कालाजीरा), पिप्पलीमूल, चव्य, दीप्यक (यमानी-अजमोद), सैन्धव-समभाग लेकर थोड़े दूध के साथ मृदु अग्नि पर घृत पाक करे। यह घृत बेर तथा मूली के यूष के साथ मिलाकर सेवन करने से वातगुल्म को नष्ट करता है। तथा अमृत के समान यह घृत शूल, आनाह, श्वास, कास, विषमज्वर, हृद्ग्रह, अरुचि, ग्रहणी विकार, शूल, पाण्डुरोग तथा योनिदोषों को नष्ट करता है ॥३४-३६॥
बिल्वकुष्ठयवक्षारवचाचित्रकसैन्धवैः । ॥३७॥ एणीयकविडव्योषतिन्तिडीकाम्लवेतसैः । हिङ्गुसौवर्चलाजाजि(शि)दाडिमेन्द्रयवैस्तथा ॥३८॥ पुनर्नवाकारवीभ्यां हंसपद्या च साधितम् । घृतं चतुर्गुणे क्षीरे शुक्तकाञ्जि(जि)कसंयुतम् ॥३९॥ द्विप्रस्थमूलकीलानां कुलत्थानां रसेन च । शूलगुल्मानिलोन्मादहृत्प्लीहार्तिहृद्ग्रहान् ॥४०॥ वातकुण्डलिकाशूलघ्नं सर्पिरपोहति ।
बिल्व, कुष्ठ, यवक्षार, बच, चित्रक, सैन्धव, एणीयक (?), विड लवण, त्रिकटु, तिन्तिडीक (चिञ्चाम्ल), अम्लवेतस, हींग, सौवर्चल, अजाजी, अनारदाना, इन्द्रजौ, पुनर्नवा, कारवी (कालाजीरा) तथा हंसपदी के चूर्ण से घृत
५३४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शूलचिकित्साध्यायः १८]
डालकर उसमें घृत से चतुर्गुण दही, शुक्त (सिरका), कांजी और दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल), कोल तथा कुलत्थ का रस डालकर घृतपाक विधि से घृत सिद्ध करें। इस घृत के सेवन से शूल, गुल्म, वातकम्प, ग्रन्थिरोग, अर्दित, हृद्ग्रह, वातकुण्डलिका (मूत्राघात रोग) तथा आवर्त (भ्रम) रोग नष्ट होते हैं ॥
सौवर्चलयवक्षारवचात्र्यूषणचित्रकैः ।।४१।।
हरीतकीविडङ्गाभ्यां पयसा चैव साधितम्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४५ तमं पत्रम्।)
संयुक्तं भद्ररोहिण्या दशाङ्गं शूलनुद् घृतम् ।।४२।।
प्लीहगुल्मकृमिश्वासकासहिक्काविनाशनम् ।
सौवर्चल, यवक्षार, बच, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), चित्रक, हरड़, विडङ्ग तथा भद्ररोहिणी इन दस द्रव्यों से दूध डालकर घृतपाक विधि से घृत सिद्ध करें। यह घृत शूल, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास, कास तथा हिक्का को नष्ट करता है ॥
शतपुष्पावचाकुष्ठपिप्पलीफलसैन्धवैः ।।४३।।
सर्षपद्वयसंयुक्तां फलवति प्रयोजयेत् । एषाऽऽध्मानमुदावर्तं शूलं चाशु व्यपोहति ।।४४।।
उष्णोदकस्नेहयुक्तं मूत्रक्षौद्राम्लकाञ्जिकैः । संयोज्यैकत्र मतिमानेभिश्चूर्णैः समावपेत् ।।४५।।
सौंफ, बच, कुष्ठ, पिप्पली, मैनफल, सैन्धव तथा सफेद और पीली सरसों के चूर्ण को एकत्र पीसकर उष्णजल, स्नेह (तैल), गोमूत्र, मधु, खटाई तथा कांजी के साथ मिलाकर फलवर्ति¹ (गुदवर्ती–Suppository) बनाये। इसके प्रयोग से आध्मान, उदावर्त तथा शूल आदि शीघ्र नष्ट होते हैं ॥४३-४५॥
शताह्वापिप्पलीकुष्ठवचानां देवदारुणः । पूतीकस्य हरेणूनां बिल्वानां मदनस्य च ।।४६।।
शूलानाहविबन्धघ्नमिमं बस्तिं प्रदापयेत् । आस्थापनप्रमाणेने स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः ।।४७।।
संरुद्धे वायुना मूत्रे प्रतिस्तब्धे तथोदरे । पुरीषे च विमार्गस्थे चूर्णबस्तिरयं हितः ।।४८।।
स्नेहन एवं स्वेदन करने के बाद रोगी को आस्थापन बस्ति के प्रमाण के अनुसार शताह्वा (सोया), पिप्पली, कुष्ठ, बच, देवदारु, पूतीक (करञ्ज), हरेणु, बिल्व तथा मैनफल के चूर्ण की बनाई हुई बस्ति देनी चाहिये। यह शूल, आनाह तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। यह चूर्ण बस्ति (उपर्युक्त चूर्णों के द्वारा बनाई हुई बस्ति) वायु के द्वारा मूत्र के रुक जाने, पेट के स्तब्ध होने तथा पुरीष (मल) के विपरीत मार्ग में चले जाने पर हितकारी होती है ॥४६-४८॥
वारिद्रोणे पलान्यष्टौ पचेद्गन्धपलाशकात् । ततः कषायं तु वचापिप्पलीफलसैन्धवैः ।।४९।।
संयुक्तं क्षौद्रतैलाभ्यां शताह्वाकुडवेन च । दद्यान्निरूहमानाहपार्श्वहृद्बस्तिशूलिनाम् ।।५०।।
एक द्रोण जल में ८ पल गन्धपलाश (गन्धशटी–कपूरकचरी) को पकाकर कषाय बनाये। उस कषाय में बच, पिप्पली, मैनफल, सैन्धव, मधु, तैल तथा सोया एक कुडव डाले। आनाह, पार्श्वशूल, हृच्छूल तथा बस्तिशूल के रोगियों को यह निरूह (आस्थापन) बस्ति देवे ॥४९-५०॥
१. घृताभ्यक्ते गुदे क्षिप्ता श्लक्ष्णा स्वाङ्गुष्ठसन्निभा। मलप्रवर्तिनी वर्तिः फलवर्त्तिश्च सा स्मृता ॥
शूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३५
बलवर्णाग्निजननं श्रोणिगुल्मरुजापहम्। कुलत्थयवकोलानि पञ्चमूलद्वयं तथा ।। ५१ ।।
क्वाथयेत्तं जलद्रोणे ततस्तं तैलसंयुतम्।
कुलत्थ, यव, कोल तथा दोनों पञ्चमूल को एक द्रोण जल में पकाकर क्वाथ बनाये। इस क्वाथ में तैल मिलाकर बस्ति के रूप में प्रयोग करने से बल, वर्ण तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है तथा श्रोणि और गुल्म रोग नष्ट होते हैं ॥५१॥
कषायं पिप्पलीकुष्ठवचेन्द्रयवसर्षपैः ।। ५२ ।।
हरेणुकासैन्धवाभ्यां तगरेण घृतेन वा। तन्निरूहमुदावर्तकुष्ठगुल्मोपशान्तये ।। ५३ ।।
दद्याच्चैवेदममाश्वेव बलवर्णाग्निवर्धनम्। तैलपक्वाशनं धीरः कल्कपेष्यैर्विपाचितम् ।। ५४ ।।
पिप्पली, कुष्ठ, बच, इन्द्रजौ, सरसों, हरेणु, सैन्धव, तगर तथा घृत की निरूह (आस्थापन) बस्ति देने से उदावर्त, कुष्ठ तथा गुल्मरोग शान्त होते हैं। उपर्युक्त द्रव्यों के कल्क को पीसकर तथा तैल में पकाकर प्रयोग करने से शीघ्र ही बल, वर्ण तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है ॥५२-५४॥
पिप्पलीबिल्वमधुकशताह्वाफलचित्रकैः। देवदारुवचाकुष्ठपुष्कराख्यैश्च संयुतम् ।। ५५ ।।
समांशैर्द्विगुणक्षीरं तदुदावर्तिनां हितम्। शूलानाहगुदभ्रंशवर्चोमूत्रविनिग्रहान् ।। ५६ ।।
कट्यूरुपृष्ठशूलार्शोमूढवातांश्च नाशयेत्। गुदशूलं तथोत्थानं बहुशः सप्रवाहिकम् ।। ५७ ।।
पिप्पली, बिल्व, मुलहठी, शताह्वा, मैनफल, चित्रक, देवदारु, बच, कुष्ठ तथा पुष्करमूल-सब समभाग लेकर इसमें द्विगुण दूध मिलाकर क्षीरपाक करें। यह योग उदावर्त के रोगियों को हितकर है। इसके प्रयोग से शूल, आनाह, गुदभ्रंश, वर्चोग्रह (मलबन्ध), मूत्रग्रह (मूत्र का रुक जाना), कटिशूल, ऊरुशूल, पृष्ठशूल, अर्श, मूढवात (वायु का न सरना), गुदशूल, उत्थान (मलरोग) तथा प्रवाहिका (Dysentry) रोग नष्ट होते हैं ॥५५-५७॥
कुष्ठं विडङ्गातिविषादारुदार्वाहरेणुकाः। एलाऽजमोदा हीबेरं नागरं पुष्करं शटी ।। ५८ ।।
स्थिरा सकट्फला रास्ना पिप्पल्यश्चव्यचित्रकम्।
श्यामा शताह्वा यष्ट्याह्वा सैन्धवं मदनं वचा ।। ५९ ।।
निचुलं नीलिनी दन्ती बिल्वं चाक्षार्धसंन्नि(मि)तैः। गन्धवतैलं तैलं वा पचेत्तदनुवासनम् ।। ६० ।।
गुल्माढ्यवातशूलार्शःप्लीहोदावर्तवृद्धिनुत्। सकुण्डलं मूत्रकृच्छ्रमानाहं च व्यपोहति ।। ६१ ।।
कुष्ठ, विडङ्ग, अतीस, देवदारु, दारुहल्दी, हरेणु, एला, अजमोद, हीबेर (बालक), सोंठ, पुष्करमूल, कपूरकचरी, स्थिरा (सालपर्णी), कायफल, रास्ना, पिप्पली, चव्य, चित्रक, श्यामा (त्रिवृत्), शताह्वा, मुलहठी, सैन्धव, मैनफल, बच, निचुल (जलवेतस), नील, दन्ती, बिल्व-सब आधा २ अक्ष (१/२ तोला) लेवें। इनके कल्क के द्वारा एरण्ड अथवा तिल का तेल पकायें। इस तैल का अनुवासन (स्नेहबस्ति) करने से गुल्म, आढ्यवात¹ (वातरक्त), शूल, अर्श, प्लीहा, उदावर्त, वृद्धि, कुण्डल, मूत्रकृच्छ्र तथा आनाहरोग नष्ट होते हैं॥
शतार्धं दशमूलस्य मदनानां तथाऽऽढकम्। पूतीकदन्तीसुरभीश्वदंष्ट्राणां च बुद्धिमान् ।। ६२ ।।
पलानि विंशतिं दद्यादेकैकस्य तमेकतः। यवकोलकुलत्थानां प्रस्थयुक्तं जलोन्मने ।। ६३ ।।
क्वाथयेत् पादशेषं तु तस्मिंस्तैलाढकं पचेत्। गोमूत्रार्धाढकं यवपिप्पलीसैन्धवत्रिकम् ।। ६४ ।।
१. चलः स्निग्धे मृदुः शीते शोफोऽङ्गेषु मृदुस्तथा। आढ्यवात इति ज्ञेयः सकृच्छ्रो मेदसावृतः॥
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५३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
........ यवशताह्नानां ......... वलीनकैः । कुष्ठवक्र(क्र)स्य(त्व)चा युक्तमेतत् स्यादनुवासनम् ।। ६५ ।।
ऊरुस्तम्भकटीपृष्ठगुदवंक्षणशूलिषु । प्लीहोदावर्तगुल्मेषु फलतैलं प्रयोजयेत् ।। ६६ ।।
फलतैल— दशमूल-५० पल। मैनफल-१ आढक। पूतीक (करञ्ज), दन्ती, सुरभी (रास्ना) तथा गोखुरू-प्रत्येक २० पल। यव, कोल, कुलत्थ-१ प्रस्त। इन सबको एक उन्मन (द्रोण) जल में पकाकर क्वाथ करे। चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें एक आढक तैल डालकर सिद्ध करे। फिर उसमें आधा आढक गोमूत्र तथा यव, पिप्पली, तीनो लवण (विड, सैन्धव तथा रुचक), .... यव, शताह्वा, .... वलीनक कुष्ठ तथा वक्र (तगर या पित्त पापड़ा) की छाल डालकर पकाये। यह उत्तम अनुवासन है। इस फल तैल का ऊरुस्तम्भ, कटीशूल, पृष्ठशूल, गुदशूल, वंक्षणशूल, प्लीहा, उदाहवर्त तथा गुल्मरोग में प्रयोग करना चाहिये ।।६२-६६।।
इति शूलचिकित्सा ते विस्तरेण प्रकीर्तिता । सिद्धैः प्रयोगैर्विविधैः प्राणिनां हितकाम्यया ।। ६७ ।।
इस प्रकार मैंने तुझे प्राणियों के हित की दृष्टि से नाना प्रकार के सिद्ध योगों द्वारा विस्तारपूर्वक शूलचिकित्सा का उपदेश किया है ।। ६७ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। चू १ (७१)
(इति) खिलेषु शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः ।। १८ ।। डाड (१८)।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। चू १ (७१)
(इति) खिलेषु शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः ।। १८ ।। डाड (१८)।
अथाष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्याय एकोनविंशतितमः ।
अथातोऽष्टज्वरचिकित्सितोत्तरमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम अष्ट ज्वर चिकित्सितोत्तर नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।
एकद्वित्रिसमुत्थानां निदानं प्रागुदाहृतम् । चिकित्सां संप्रवक्ष्यामि सन्निपातस्य हेतुवत् ।। ३ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४६ त१मं पत्रम्)
मैंने एकदोषज (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक), द्विदोषज (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) तथा त्रिदोषज (सान्निपातिक-वातपित्तकफ तीनों दोषों से होने वाले) ज्वरों का निदान पहले बता दिया है। अब मैं उन सबकी चिकित्सा तथा सन्निपात ज्वर का निदान कहूंगा ।। ३ ।।
१. अस्याग्रे पत्रत्रयं लुप्तं ताडपत्रपुस्तके।
अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५३७
अहिता ............................................. । ............................ गुडसंयुतः ।।
इस श्लोक में संभवतः ज्वर का निदान दिया गया है। अर्थात् अहितकर आहार ....... तथा गुड के सेवन आदि से ज्वर हो जाता है।।
बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः काश्मर्यः पाटलिस्तथा एषां तु मूलं निष्क्वाथ्य पिबेत् सक्षारसैन्धवम् ।।
बिल्व, अग्निमन्थ, श्योनाक (अरलू), गंभारी तथा पाढल–इन सबकी मूल का क्वाथ बनाकर उसमें सर्जक्षार तथा सैन्धव मिलाकर वातज्वर के रोगी को पिलाना चाहिये।
समङ्गी मधुकं मुस्तं भद्रदार्वाथ शर्करा। वातज्वरे प्रयोक्तव्यं गुडूच्या सह पानकम् ।।
मंजीठ, मुलहठी, नागरमोथा, देवदारु शर्करा तथा गिलोय का पानक (शर्बत–Syrup) बनाकर वातज्वर में प्रयोग करना चाहिये।।
विदारिगन्धा ह्येरण्डं बृहत्यौ पृश्निपर्णिका। भद्रदारुसमायुक्तो वातज्वरहरो मतः ।।
विदारीगन्धा, एरण्ड, दोनों बृहती, पृश्निपर्णी तथा देवदारु–इन सबका वातज्वर में प्रयोग करना चाहिये।।
विदारिगन्धा कलशी तथा गन्धर्वहस्तकः। मधुकं भद्रदारुश्च क्वाथः शर्करया युतः ।।
वातज्वरहरो देयो मातुलुङ्गरसाप्लुतः।
विदारीगन्धा, कलशी (पृश्निपर्णी), गन्धर्वहस्तक (एरण्ड), मुलहठी तथा देवदारु के क्वाथ में शर्करा और मातुलुङ्ग का रस मिलाकर वातज्वर में देना चाहिये।।
एरण्डं वरुणं चैव बृहत्यौ मधुकं तथा ।।
वातज्वरहरः क्वाथो रास्नाकल्कसमायुतः।
एरण्ड, वरुण, दोनों बृहती (स्थूल तथा क्षुद्र बृहती) तथा मुलहठी के क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर देने से वातज्वर नष्ट होता है।।
द्विपञ्चमूलनिष्क्वाथः कोष्णो वा यदि वा हिमः ।
रास्नाकल्कसमायुक्तो वातज्वरहितो मतः ।।
दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) के ईषद् उष्ण अथवा शीतल क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर वातज्वर में हितकर माना गया है।
रास्नासरलदेवाव्हयष्टीमधुकसंयुतः। पेयो विदारिगन्ध्याद्यो निष्क्वाथो वा ससैन्धवः ।।
रास्ना, सरल (चीड़), देवदारु तथा मुलहठी से युक्त विदारीगन्धादि के क्वाथ में सैन्धव मिलाकर पीना चाहिये।।
पञ्चमुष्टिकयूषेण युक्ताम्ललवणेन च। भुञ्जीत भोजनं काले जाङ्गलानां रसेन च ।।
पिबेदन्तरपानं च बिल्वमूलशृतं जलम् ।
योग्य मात्रा में खटाई तथा लवण मिले हुए पञ्चमुष्टिक यूष अथवा जांगल पशु–पक्षियों के मांxrस के साथ योग्य काल में भोजन करना चाहिये। तथा भोजन के बीच में बिल्वमूल से सिद्ध किया हुआ जल देना चाहिये। पञ्चमुष्टिक यूष—इसका पहले खिलस्थान के शोथ चिकित्सिताध्याय में वर्णन किया गया है। इसे वहीं देखें (श्लोक सं. ३०) ।।
द्वे पञ्चमूले वर्चीवमेकेषीकां पुनर्नवाम् ।।
५३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
सहस्त्रवीर्यां नादेयीं शतवीर्यां शतावरीम् । विश्वदेवां शुकनसां सहदेवां सनाकुलीम् ।। रास्नाजगन्धे पूतीकं देवाह्वं देवताडकम् । बले द्वे हंसपदीं च क्वाथोत्थीमुपलङ्कषाम् (?) ।। कृष्णागरुं व्याघ्रनखं शतपुष्पां पलङ्कषाम् । कायस्थां च वयस्थां च चोरकं जटिलां जटाम् । अपेतराक्षसीं यक्षां गुहाह्वामुष्ट्रलोमिकाम् । हरेणुकां हैमवतीं कैटर्यं सुवहां वचाम् ।। वृश्चिकालीं च भार्गीं च ..... स्या शिग्रुं च कल्कशः । संहृत्य तैलं विपचेद्वातज्वरनिबर्हणम् ।। पुराणसर्पिःसंस्कारो विधेयो जाङ्गलो रसः।
दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल), वर्चीव, एकेषीका (पाठा), पुनर्नवा, सहस्त्रवीर्या (दूर्वा), नादेयी (अरणी अथवा नागरमोथा), शतवीर्या (शतमूली अथवा द्राक्षा), शतावरी, विश्वदेवा (गोरक्षतण्डुला), शुकनासा (श्योनाक), सहदेवा (बला), गन्धनाकुली, रास्ना, अजगन्धा (वन्यवानी-जंगली अजवायन), पूतीक (करञ्ज), देवदारु, देवताड़क (देवदाली-घोषालता), दोनों बला (बला तथा अतिबाला), हंसपदी, किसी क्वाथ विशेष में शोधित गूगल, काला अगर, व्याघ्रनख (नखनखी) सौंफ, गूलर, कायस्था (आंवला अथवा काकोली), वयस्था (हरड़), चोरक (ग्रन्थिपर्णी का एक भेद-भटेउर), जटिला (वटवृक्ष), जटा (जटामांसी), अपेतराक्षसी (काली तुलसी), यक्षा (राल), गुहाह्वा (पृश्निपर्णी का भेद), उष्ट्रलोमिका, हैमवती (स्वर्णक्षीरी अथवा हरीतकी), कैटर्य (महानिम्ब का एक भेद गोरानीम), सुवहा (शेफालिका), बच, वृश्चिकाली (बरहण्टा), भारंगी .... तथा सुहांजने का कल्क बनाकर तैल पाक करे । यह वातज्वर को नष्ट करता है । इसमें पुराने घृत के संस्कार से युक्त जांगल मांसरस का प्रयोग करना चाहिये ।।
दशमूलकुलत्थानां यवानां कुडवस्य च ।। कुलीरशृङ्ग्या रास्नायाः शटीपुष्करमूलयोः । भार्ग्या दुरालभायाश्च निर्यूहः साधु साधितः ।। तेनास्य विगुणो वायुर्ज्वरश्चाशु प्रशाम्यति ।
दशमूल, कुलत्थ, यव, कुलीरशृंगी (काकड़ाशृंगी), रास्ना, कपूरकचरी, पुष्करमूल, भारंगी तथा दुरालभा-एक २ पल लेकर उनका अच्छी प्रकार निर्यूह (क्वाथ) बनाया जाये । इस प्रयोग से विगुण (दूषित) हुआ वायु तथा ज्वर शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ।।
वातश्लेष्मसमुत्थस्य व्याख्यास्यामि चिकित्सतम् ।। बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी । क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।।
अब मैं वातश्लेष्म ज्वर की चिकित्सा का उपदेश करूंगा । वातश्लेष्म ज्वर के प्रारंभ में दोनों बृहती (स्थूलफला तथा क्षुद्रफला), पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ, कपूरकचरी का क्वाथ पीना चाहिये । यह दोषों का पाचन करता है ।।
द्विपञ्चमूलं भार्गीं च कर्कटाख्यां दुरालभाम् । नागरं पिप्पलीं दारु पिबेद्वा सैन्धवान्वितम् ।।
अथवा इसमें दोनों पञ्चमूल, भारंगी, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सोंठ, पिप्पली तथा देवदारु के क्वाथ में सैन्धव मिलाकर पीना चाहिये ।।
पटोलं धान्यकं मुस्ता मूर्वा पाठा निदिग्धिका । कषाय एषां पातव्यः षडङ्गो मधुसंयुतः ।।
पटोल, धनिया, नागरमोथा, मूर्वा (मोरबेल), पाठा, निदिग्धिका (कण्टकारी)-इन ६ द्रव्यों के कषाय में मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।
त्रिफला जीवनीयानि पिप्पलीमूलशर्करे । सिद्धो ग्रहह्नसंयुक्तो वातश्लेष्मज्वरापहः ।।
खिलस्थानम् ५३९
त्रिफला, जीवनीयवर्ग की ओषधियां, पिप्पलीमूल, शर्करा तथा ग्रहघ्न (श्वेत सरसों) का क्वाथ वातश्लेष्म ज्वर को नष्ट करता है ।।
नागरं दश(मूलं) च कट्वङ्गं दारुकद्वयम् । पिप्पल्यस्त्रिफला भार्गी कर्कटाख्या दुरालभा ।।
वातश्लेष्मज्वरे पेयं सुखोष्णं सैन्धवान्वितम् ।
सोंठ, दशमूल, कट्वङ्ग (स्योनाक-अरलु), हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली, त्रिफला, भारंगी, काकड़ाशृंगी तथा दुरालभा के सुखोष्ण क्वाथ में सैन्धव मिलाकर वातश्लेष्म ज्वर में पीना चाहिये ।।
तिक्तकं कटुरोहिण्याः कल्कमक्षसमं भिषक् ।।
हिङ्गुसैन्धवसंसृष्टं पिबेत् क्षिप्रं सुखाम्बुना । कफजेऽनिलजे चैव ज्वरे पीतं सुखावहम् ।।
वैद्य को चाहिये कि वह तिक्तक (पटोल) तथा कटुरोहिणी (कुटकी) का कल्क १ अक्ष लेवे। उसमें हींग और लवण मिलाकर शीघ्र ही सुखोष्ण जल से पिला देवे। यह क्वाथ वातश्लेष्म ज्वर में पीने से सुखकारी होता है ।।
महतः पञ्चमूलस्य क्वाथः श्लैष्मिकवातिके । नागरामरदारुभ्यां श्रुतमुष्णं पिबेज्जलम् ।।
वातश्लेष्म ज्वर में बृहत् पञ्चमूल का क्वाथ तथा सोंठ और देवदारु से सिद्ध किया हुआ उष्ण जल पिलाना चाहिये ।।
बालमूलकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा । कटूष्णद्रव्ययुक्तेन मन्दस्निग्धेन भोजयेत् ।।
वातश्लेष्म ज्वर के रोगी को कच्ची मूली के यूष, जांगलमांसरस तथा अल्पस्नेह युक्त कटु एवं उष्ण द्रव्यों का भोजन करना चाहिये ।।
लाक्षाप्रियङ्गुमञ्जिष्ठायष्टिकोशीरबालकैः । चन्दनागरुबाहीकश्रीवेष्टककुटन्नटैः ।।
मूर्वाशिताह्लासरलसालनिर्यासरोचकैः । क्षीरद्रोणेऽर्धपलिकैर्भिषक्तैलाढकं पचेत् ।।
तत् साधु सिद्धमाहृत्य स्वनुगुप्तं निधापयेत् ।
लाक्षादिकमिदं तैल .................... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २५० ¹तमं पत्रम्)
...................................
...................................
लाक्षादि तेल—लाक्षा, प्रियङ्गु, मंजीठ, मुलहठी, खस, बालक (नेत्रबाला), चन्दन, अगर, बाहीक (हींग), श्रीवेष्टक (सरल निर्यास-गन्धा बिरोजा), कुटन्नट (स्योनाक अथवा केवटीमोथा), मूर्वा (मोरबेल), शताह्वा, सरल (चीड़), साल निर्यास (राल-Resin) तथा रोचक (राजपलाण्डु या बिजौरा)—आधा पल। इसको एक द्रोण जल में डालकर उसमें एक आढक तैल को सिद्ध करे। सम्यक् प्रकार से तैल सिद्ध होने पर उसे उतारकर एकान्त स्थान में रख दें। इसे लाक्षादि तैल ....... कहते हैं ।।
(पिप्प)ल्योऽतिविषा मुस्ता स्थिराढ्या सदुरालभा ।।
सचन्दनयवोशीरसारिवाः सनिदिग्धिकाः । रोहिण्यामलकं बिल्वं त्रायमाणातिसाधितम् ।।
घृतं हन्ति शिरः शूलं कासं जीर्णज्वरं क्षयम् ।
१. अस्याग्रे पत्रद्वयं लुप्तं ताडपत्रपुस्तके ।
५४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
पिप्पली, अतीस, नागरमोथा, स्थिरा (शालपर्णी), आढ्या (अजमोदा), दुरालभा, रक्तचन्दन, जौ, खस, सारिवा, निदिग्धिका (कण्टकारी), रोहिणी, आंवला, बिल्व तथा त्रायमाणा से सिद्ध किया हुआ घृत शिरःशूल, कास, जीर्णज्वर तथा क्षयरोग को नष्ट करता है।
वमनं कफरोगाणां पैत्तिकानां विरेचनम् ।।
शोधनं शमनं कार्यं कृशे शमनशोधनम् ।
श्लैष्मिक रोगों में वमन के द्वारा तथा पैत्तिक रोगों में विरेचन के द्वारा शोधन करके फिर दोषों का शमन करना चाहिये। यदि रोगी कृश हो तो पहले दोषों का शमन करें, उसके बाद शोधन करना चाहिये ।।
मण्डादिरिष्यते सामे यवागूर्वातजे तथा ।।
विषौषधिप्रजातानां पित्तघ्नीं कारयेत् क्रियाम् ।
आमज्वर में मण्ड आदि तथा वातज्वर में यवागू का सेवन करना चाहिये। तथा विषौषधियों से उत्पन्न हुए ज्वर में पित्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ।।
सन्निपातज्वरस्यातः प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।।
स सर्वलक्षणोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्योऽल्पलक्षणः ।
अब मैं सन्निपात ज्वर की चिकित्सा कहूंगा। यदि सन्निपातज्वर में सम्पूर्ण लक्षण विद्यमान हों तो वह असाध्य होता है तथा यदि उसमें थोड़े ही लक्षण विद्यमान हों तो वह कृच्छ्रसाध्य होता है ।।
बलहीनस्य नष्टाग्नेः सर्वथा नैव सिध्यति ।।
किमङ्ग ! बालकानां तु क्षीणधातुबलौजसाम् । तथाऽपि यत्नमातिष्ठेदानृशंस्याद्भिषग्वरः ।।
हे प्रिय ! जिन बालकों का बल कम हो गया है, जिनकी जाठराग्नि नष्ट हो चुकी है तथा जिनके धातु, बल एवं ओज क्षीण हो चुके हैं—उनमें सन्निपात ज्वर सर्वथा साध्य नहीं है अर्थात् बिलकुल असाध्य है। तथापि चिकित्सक को मृत्यु अथवा अन्तिम भयंकर अवस्था तक भी प्रयत्न करते रहना चाहिये ।।
सन्निपातेषु दोषेषु यो दोषो बलवान् भवेत् । तमेवादौ प्रशमयेच्छेषं दोषमतः परम् ।।
सन्निपात ज्वर में जो दोष सबसे अधिक बलवान् हो पहले उसीकी चिकित्सा करनी चाहिये। शेष दोषों की उसके बाद चिकित्सा करनी चाहिये ।।
अल्पान्तरबलेष्वेषु दोषेषु मतिमान् भिषक् । श्लेष्माणमादौ शमयेत् स ह्येषामनुबन्धकृत् ।।
गुरुत्वात् कृच्छ्रपाकत्वादूर्ध्वकायाश्रयात्तथा ।
यदि सन्निपात ज्वर में तीनों दोष लगभग समान बलवाले हों तो बुद्धिमान् चिकित्सक को पहले श्लेष्मा (कफ) की शान्ति करनी चाहिये। क्योंकि इसमें गुरु, कृच्छ्रपाकी (जिसका पाक-विपाक कठिनता से होता हो) तथा शरीर के ऊर्ध्व भाग में स्थित होने के कारण श्लेष्मा ही अनुबन्धवाला होता है।
तस्माज्ज्वरे यदुद्दिष्टं वातपित्तकफात्मके ।।
तस्मात्तस्यामवस्थायां तत्तत् कार्यं चिकित्सितम् ।
इसलिये वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक ज्वरों में जो २ कहा गया है—ज्वर की उस २ अवस्था में वह २ चिकित्सा करनी चाहिये। ('सन्निपातज्वरस्यातः' इत्यादि ३८ वें श्लोक से 'कार्यं चिकित्सितम्' इत्यादि ४३ तक के श्लोक पहले सूतिकोपक्रमणीय अध्याय में १३९ से १४५ श्लोकों में अक्षरशः इसी रूप में आ चुके हैं। यहां पुनरावृत्ति हुई है) ।।
अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५४१
पिप्पल्यादिवचादारुवयःस्थासरलान्वितः ।। पेयः कफोत्तरे सामे सहिङ्गुक्षारसैन्धवः । दोषास्तेनाशु पच्यन्ते विबन्धश्चोपशाम्यति ।।
ज्वर में कफरूप आमरस की प्रधानता होने पर पिप्पली बच, देवदारु, वयस्था (हरड़), सरल (चीड़), हींग, सर्जक्षार तथा सैन्धव का प्रयोग करना चाहिये । इससे दोषों का शीघ्र ही पाचन होता है तथा ज्वर भी शान्त हो जाता है ।।
नागरं कटफलं धान्यं मुस्तं पर्पटकं वचा । देवदार्वभया भार्गी भूतीकं दशमं भवेत् ।। शृतं सैन्धवहिङ्गुभ्यां पेयं वातकफोत्तरे । ऊर्ध्वजत्र्वङ्गरोगाणां ज्वरितानां प्रशस्यते ।।
वात एवं कफ प्रधान ज्वर में सोंठ, कायफल, धनिया, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, बच, देवदारु, हरड़, भार्गी तथा भूतीक (यवानी-अजवायन)-इन दस द्रव्यों का क्वाथ बनाकर उसमें सैन्धव तथा हींग मिलाकर प्रयोग कराना चाहिये । यह ज्वरयुक्त रोगी के ऊर्ध्वजत्रुज अङ्गों के रोगों में प्रशस्त माना गया है ।।
शटीपौष्करपिप्पल्यो बृहती कण्टकारिका । शुण्ठी कर्कटकी भार्गी दुरालम्भा यवानिका ।। शूलानाहविबन्धघ्नं शठ्याद्यं कफवातनुत् ।
शटि (कपूरकचरी-कचूर), पुष्करमूल, पिप्पली, बृहती (बड़ी कटेरी-भटकटैया), कण्टकारी, सोंठ, काकड़ाशृङ्गी, भार्गी, दुरालभा तथा यवानी (खुरासानी अजवायन) का प्रयोग करना चाहिये । यह शठ्यादि प्रयोग शूल, आनाह, विबन्ध तथा वात और कफ को नष्ट करता है ।।
विडङ्गातिविषे भार्गी पौष्करं चित्रकं शटी ।। शार्ङ्गेष्टा पिप्पली शुण्ठी पिबेद्वातकफोत्तरे ।
वात एवं कफ प्रधान ज्वर में विडङ्ग, अतीस, भार्गी, पुष्करमूल, चित्रक, कचूर, शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), पिप्पली तथा सोंठ का सेवन करना चाहिये ।।
दुरालभावचादारुपिप्पलीमूलनागरम् ।। .................... पुष्करं शटी । क्वाथं सलवणं देयं हिङ्गुक्षारान्वितं पिबेत् ।। सन्निपाते विबन्धे च वातश्लेष्मोत्तरे ज्वरे ।
सन्निपात, विबन्ध तथा वात कफ प्रधान ज्वर में दुरालभा, बच, देवदारु, पिप्पलीमूल, सोंठ ..... पुष्करमूल तथा कचूर के क्वाथ में लवण हींग तथा सर्जक्षार मिलाकर पिलाना चाहिये ।।
जीवकर्षभकौ शृङ्गी मूलं पुष्करजं शटी ।। सन्निपातेऽनिलकफे कासे चैषां प्रशस्यते ।
यदि सन्निपात ज्वर में वात एवं कफ की प्रधानता हो तथा कास हो तो जीवक, ऋषभक, काकड़ाशृङ्गी, पुष्करमूल तथा कचूर का क्वाथ प्रशस्त होता है ।।
बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी ।। क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।
सन्निपात ज्वर में प्रारम्भ में दोषों का पाचन करने के लिये दोनों बृहती, पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ तथा कचूर का गरम २ क्वाथ पीना चाहिये ।।
५४२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
दुरालभा वचा दारु पिप्पली भद्ररोहिणी ।।
महौषधं कर्कटकी बृहती कण्टकारिका । क्वाथः सलवणः पेयः सन्निपातज्वरापहः ।।
सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये दुरालभा, बच, देवदारु, पिप्पली, कटुरोहिणी, सोंठ, काकड़ाश्रृङ्गी, बड़ी कटेरी तथा छोटी कटेरी के क्वाथ में लवण मिलाकर पीना चाहिये ।।
देवदारु वचा मुस्तं कैरातं कटुरोहिणी । गुडूची नागरं क्वाथः सन्निपातज्वरापहः ।।
उरोग्रहे कण्ठरोगे मुखरोगे च शस्यते ।
सन्निपात ज्वर में देवदारु, बच, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, गिलोय तथा सोंठ के क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये । यह उरोग्रह, कण्ठरोग तथा मुखरोगों में हितकर है ।।
त्रिफला रोहिणी निम्बं पटोलं कटुकत्रयम् ।।
पाठा गुडूची वेताग्रं सप्तपर्णः सवत्सकः । किराततिक्तकं मुस्ता वचा चेत्येकतः शृतम् ।।
कफोत्तरं निहन्त्येतत् पानादग्निं च दीपयेत् ।
त्रिफला, रोहिणी, नीम, पटोल, त्रिकटु, पाठा, गिलोय, वेताग्र (नाडीशाक), सप्तपर्ण, इन्द्रजौ, चिरायता, नागरमोथा तथा बच का क्वाथ कफप्रधान सन्निपात ज्वर को नष्ट करता है तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है ।।
पटोलमुस्तमधुकरोहिणीकथितं जलम् ।।
योगमेतं त्रिफलया युक्तं च सुरदारुणा । पाययेन्मधुनाऽऽलोड्य सन्निपाते कफोत्तरे ।।
कफप्रधान सन्निपात ज्वर में पटोल, नागरमोथा, मुलहठी, रोहिणी, त्रिफला तथा देवदारु के क्वाथ में मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।
आरग्वधवचानिम्बपटोलोशीरखत्सकम् । शार्ङ्गष्टाऽतिविषा मूर्वा त्रिफला सदुरालभा ।।
भद्रमुस्ता बला पाठा मधुकं भद्ररोहिणी । कषाय एष शमयेज्ज्वरमाशु त्रिदोषजम् ।।
जाड्यं सशोफमाध्मानं गुरुत्वं चापकर्षति ।
अमलतास, बच, नीम, पटोल, खस, इन्द्रजौ, शार्ङ्गेष्टा, अतीस, मूर्वा, त्रिफला, दुरालभा, नागरमोथा, बला, पाठा, मुलहठी तथा कटुरोहिणी का कषाय शीघ्र ही त्रिदोषज (सान्निपातिक) ज्वर को शान्त कर देता है । यह जड़ता, शोफ (शोथ), आध्मान तथा शरीर के भारीपन को भी दूर करता है ।।
नागरं दशमूलं च कट्वङ्गं दा ........ ।
सोंठ, दशमूल, कट्वङ्ग (स्योनाक) ........ आदि का क्वाथ सन्निपात ज्वर में देना चाहिये ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २५३ तर्मं पत्रम्)
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इससे आगे ताडपत्र पुस्तक में ५ पृष्ठ खण्डित हैं। उस खण्डित प्रकरण में कुछ अंश अष्टज्वर चिकित्सा-१९वां अध्याय का होना चाहिये। इसके अतिरिक्त २०वां अध्याय (अज्ञात नाम) सम्पूर्ण रूप से खण्डित है तथा मधुविशेषणीय-
१. अस्याग्रे पत्रपञ्चकं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके ।
अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५४३
नामक २१वें अध्याय का भी बहुत सा अंश खण्डित है। (इस प्रकार अष्टज्वरचिकित्सिताध्याय बीच में ही खण्डित हो गया है)।
वक्तव्य—यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। अध्याय के अन्त में थोड़े से श्लोक इस अध्याय के मिलते हैं। अध्याय के अन्त में अध्याय की समाप्ति की सूचना देनेवाले लेख को देखकर ही अनुमान होता है कि यह मधुविशेषणीय नामक २१ वां अध्याय है। अब हम उपलब्ध श्लोकों का व्याख्यान करेंगे।
............ शिशुं प्राशयेयुः कथञ्चन ।।
शिशु को किसी प्रकार मधु का सेवन कराना चाहिये।
वक्तव्य—प्रारंभिक सम्पूर्ण श्लोकों के खण्डित होने से यह कहना कठिन है कि ऊपर से क्या प्रकरण आ रहा है। फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि कम से कम यह प्रकरण शिशुओं को मधु सेवन कराने का है। सुश्रुत में अत्यन्त विस्तार के साथ मधु के गुणों का वर्णन किया गया है। नवजात शिशु को अनेक स्थानों पर मधु चटाने का विधान दिया गया है ।।
नवसद्यःक्षतानां तद् व्रणानां रोहणं भवेत् ।
क्षतजं प्राप्य हि विषं दर्शयत्यात्मनो बलम् ।।
प्रसादयति तच्चाशु सन्धत्ते च मधु व्रणम् ।
मधु के गुण—मधु नवीन एवं सद्यःक्षत व्रणों का रोहण करता है–उन्हें भर देता है। क्षत (चोट आदि) के कारण शरीर में जो विष उत्पन्न हो जाता है उस पर मधु अपनी शक्ति प्रकट करता है। मधु उस विष को शान्त कर देता है तथा व्रण का सन्धान करता है ।।
तस्मात् स्वभावतो नृणां सहोष्णोनाशितं मधु ।।
विरुद्धत्वान्त्रिभिर्दोषैर्जीवितान्ताय कल्पते ।
तुल्यत्वादुष्णयोगाच्च यथा च मधुसर्पिषी ।
मधु अपने स्वभाव से तीनों दोषों से विरुद्ध होने के कारण उष्ण पदार्थों के साथ सेवन किया जाता हुआ मृत्यु का कारण होता है। उदाहरण के लिये मधु तथा घृत समान मात्रा में लेने से तथा उष्णता के कारण घातक होता है। अर्थात् मधु को घृत के साथ यदि सेवना करना हो तो दोनों द्रव्य समान परिमाण में कभी नहीं होने चाहिये। समान परिमाण में मिलने से वे दोनों दूषितविष का कार्य करते हैं। मधु के विषय में दूसरी बात यह ध्यान रखनेवाली है कि इसे न तो कभी स्वयं उष्ण करना चाहिये तथा न उष्ण द्रव्यों के साथ या उष्ण प्रकृतिवाले मनुष्य में सेवन कराना चाहिये। मधुमक्खियों द्वारा यह अनेक प्रकार के फूलों से संग्रह किया जाता है। उन फूलों में कई विषयुक्त भी हो सकते हैं जिससे मधु में कुछ विषयुक्त अंश भी विद्यमान हो सकता है। विष का उष्णता से विरोध होता है। उष्णता मिलने से विष प्रकुपित हो जाता है। इसलिये मधु को कभी भी गरम नहीं करना चाहिये। गरम वस्तुओं के साथ इसे मिलाना भी नहीं चाहिये तथा उष्ण प्रकृति वाले रोग अथवा मनुष्यों में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। परन्तु वमन द्रव्यों के साथ यदि मधु का प्रयोग किया जा रहा हो तो वहां उष्णता का विरोध नहीं होता क्योंकि उसका परिपाक नहीं होता है तथा शरीर में वह ठहरता नहीं है। मधु एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसे मधुमक्खियां भिन्न २ फूलों से लाकर अपने छत्तों में एकत्र करती हैं। इसमें अन्य तत्त्वों के अतिरिक्त सबसे अधिक मात्रा में ग्लूकोज (Glucose) होता है। ग्लूकोज का पाचन बहुत सुगमता से हो सकता है तथा यह हृदय को अत्यन्त बल देने वाला पदार्थ है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में मधु को बहुत
५७ का.सं.
५४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२]
अधिक महत्त्व दिया गया है । अधिकांश आयुर्वेदिक ओषधियों का अनुपान मधु ही होता है । इसका कारण मुख्यरूप से यह है कि मधु में योगवाही गुण होता है । योगवाही का अभिप्राय यह है कि उसे जिस द्रव्य के साथ मिलाया जाता है, अपने गुणों को स्थिर रखने हुए वह उसके गुणों को बढ़ा देता है । इसी गुण के कारण इसका इतना महत्त्व है । भिन्न २ प्रकार की मक्खियों द्वारा संचित किये हुए मधु के गुणों में परस्पर अन्तर होता है । इसका विशेष विवरण सुश्रुत सू. अ. ४५ मधुवर्ग में देखें ॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मधुविशेषणीयो नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ थ १ (२१)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु मधुविशेषणीयो नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥
अथ क्षीरगुणविशेषीयाध्यायो द्वाविंशतितमः ।
अथातः क्षीरगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम क्षीरगुण विशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । अर्थात् इस अध्याय में भिन्न २ प्राणियों के दूधों के पृथक् २ गुणों का विवेचन किया जायगा ॥१-२॥
गोर्महिष्या अजायाश्च नार्या उष्ट्या अवेः स्त्रियाः ।
तुरङ्ग्या इति चोक्तानि पूर्वमेव पयांसि तु ॥३॥
भूयश्च गुणवैशेष्यात् क्षीराण्राष्टौ निबोध मे ।
गौ, भैंस, बकरी, नारी, ऊंटनी, भेड़, स्त्री तथा घोड़ी के दूध का पहले वर्णन किया गया है । अब गुणों की विशेषता के कारण पुनः इन आठ प्रकार के दूध के विषय में तू मेरे से सुन ।
**वक्तव्य—**यहां नारी तथा स्त्री शब्द दोनों एक ही अर्थ के वाचक हैं । यह संभवतः प्रमादवश लिखा गया है । इन दोनों में से एक शब्द के स्थान पर हथिनी वाचक शब्द होना चाहिये । क्योंकि स्त्री शब्द का दोबारा आने का कोई अर्थ नहीं है तथा हथिनी के दूध का इसमें समावेश नहीं किया गया है । हथिनी के दूध को मिलाकर ही आठ प्रकार के दूध होते हैं । आयुर्वेद में चिकित्सार्थ अनेक प्राणियों के दूध का उपयोग किया जाता है परन्तु जहां तक पीने का संबन्ध है उपर्युक्त आठ प्राणियों का दूध ही व्यवहृत होता है ॥३॥
प्रजापतेः पुरेच्छातः प्रजानां प्राणधारणम् ॥४॥
पञ्चभूतगुणं चापि भूरुहां जन्म कथ्यते । वनस्पतीनां वृक्षाणां वानस्पत्यगणस्य च ॥५॥
वीरुधामोषधीनां च गुल्मानामपि जीवक ! । विविधानां तृणानां च सस्यानां चैव देहिनाम् ॥६॥
एवमादिगणो यस्तु भूमेः सार उदाहृतः ।
क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] खिलस्थानम् ५४५
हे जीवक ! प्राचीन काल में प्रजापति (ब्रह्मा) की इच्छा से सम्पूर्ण प्राणियों के प्राणों का धारण हुआ। पञ्चमहाभूतों के गुणों से युक्त पर्वतों का जन्म हुआ तथा वनस्पति, वृक्ष, सम्पूर्ण वानस्पत्य, वीरुध्, ओषधि, गुल्म, विविध प्रकार के तृण, घास तथा मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार यह उपर्युक्त सम्पूर्ण वर्ग भूमि का सार कहलाता है। अर्थात् इन सबकी पृथ्वी पर उत्पत्ति होने के कारण ये सब पृथ्वी के सार रूप हैं।
वक्तव्य—वनस्पति-जिसके पुष्प न हों पर फल हों उन्हें वनस्पति कहते हैं तथा इसका उदाहरण गूलर दिया जाता है। 'अपुष्पा' का अर्थ 'अविद्यमानपुष्प' किया जाता है अर्थात् जिसमें पुष्प न हों। परन्तु यह बात वनस्पति शास्त्र के सिद्धान्त के ही विरुद्ध है कि बिना पुष्प के फल हो जाय। पहले पुष्प उत्पन्न होते हैं तथा उसीसे बाद में फल बनते हैं। आधुनिक विद्वान् यह मानते हैं कि गूलर आदि फलों को यदि सूक्ष्मवीक्षण यन्त्र से देखा जाय तो हमें ज्ञान होता है कि इनके अन्दर भी असंख्य सूक्ष्म फूल होते हैं जो एक बन्द आधार में रहते हैं। इसलिये 'अपुष्पा' का अर्थ अविद्यमान न करके 'अदृश्य' किया जाना अधिक उचित है अर्थात् इनमें फूल अदृश्य होता है। वृक्ष-जिनके फूल भी हों और फल भी हों उन्हें वृक्ष कहते हैं जैसे आम्र, जामुन आदि। वानस्पत्य—वानस्पत्य तथा वृक्ष का एक ही अभिप्राय होता है। तन्त्रान्तर में कहा है-'वानस्पत्यः फलपुष्पवति वृक्षे। पुष्पजफलवृक्षे आम्रादौ।' वीरुध्—जो फैलने वाली लता होती है उन्हें वीरुध् कहते हैं। ओषधि-जो फल के पक जाने पर नष्ट हो जाती हैं उन्हें 'ओषधि' कहते हैं। मनुस्मृति में भी कहा है—'ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः' अर्थात् जिसमें पुष्प और फल बहुत हों परन्तु फल के पक जाने पर जो नष्ट हो जाती है उसे 'ओषधि' कहते हैं। इसके उदाहरण-शालि, यव, गोधूम (गेहूं), तिल तथा मूंग आदि हैं। गुल्म—जो गुल्म या गुच्छे के आकार का हो उसे 'गुल्म' कहते हैं। यह काण्डशून्य वृक्ष जाति होती है। इसका समावेश भी वीरुध् में ही होता है ॥४-६॥
सोमस्य वायुतेजोपां बुद्धिश्चेति प्रजापतेः ।। तदाहारगुणोत्पन्नं गवादीनामतः परम् ।
उपर्युक्त गुण वाले आहारों से उत्पन्न होने के कारण गौ आदि का दूध सोम (चन्द्रमा), वायु, तेज (सूर्य), जल तथा प्रजापति (ब्रह्मा) को बुद्धिरूप समझा जाता है। अर्थात् गौ आदि प्राणियों का दूध उपर्युक्त आहार के सेवन से बनता है तथा वह आहारद्रव्य सूर्य, चन्द्रमा, जल आदि से उत्पन्न होता है। इसलिये यह उनका बुद्धिरूप या सारतत्त्व समझा जा सकता है॥
यथा सर्वौषधीसारं क्षीरोदे मथिते पुरा ।। संभूतदमृतं दिव्यममरा येन देवताः। तथा सर्वौषधीसारं गवादीनां तु कुक्षिषु ।। क्षीरमुत्पद्यते तस्मात् कारणादमृतोपमम् ।
जिस प्रकार प्राचीन काल में क्षीरसागर के मथे जाने पर सम्पूर्ण ओषधियों का सार दिव्य अमृत बन गया था उसी प्रकार सम्पूर्ण ओषधियों का सार गौ आदि की कुक्षि (पेट) में पहुँच कर दूध बन जाता है। इसलिये यह अमृत के समान होता है॥
जरायुजानां भूतानां विशेषेण तु जीवनम् ।।
पशु, मनुष्य आदि जरायुज प्राणियों के लिये दूध विशेषकर जीवन देने वाला है। चरक सू. अ. २७ में भी कहा है कि दूध सबसे श्रेष्ठ जीवनीय (जीवन देने वाला) द्रव्य समझा जाता है। जरायुज—जो प्राणी जरायु-अर्थात् गर्भाशय से उत्पन्न होते हैं उन्हें जरायुज कहते हैं। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—'तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः' ।
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क्षीरं सात्म्यं हि बालानां क्षीरं जीवनमुच्यते । क्षीरं पुष्टिकंर वृद्धिकरं बलविवर्धनम् ।।
क्षीरमोजस्करं पुंसां क्षीरं प्राणगुणावहम् । गर्भधानकरं क्षीरं बन्ध्यानामपि योषिताम् ।।
बालकों के लिये दूध सात्म्य होता है तथा उनका जीवन होता है (अर्थात् उनके लिये जीवन तुल्य होता है) । यह पुष्टि, शरीर की वृद्धि तथा बल को बढ़ाने वाला है । दूध प्राणियों में ओज को बढ़ाता है तथा प्राणों को बलवान् बनाता है तथा यह बन्ध्या (बांझ) स्त्रियों में गर्भ का स्थापन कराता है । अर्थात् इसमें गर्भस्थापक गुण हैं ।।
क्षीणानां च कृशानां च शोषिनां राजयक्ष्मणाम् ।
व्यायामश्रमनित्यानां स्त्रीनित्यानां च देहिनाम् ।।
संक्षीणरेतसां चापि गर्भस्त्रावे च दारुणे । रक्तपित्तामयेऽर्शस्सु मदक्षीणे ज्वरे तथा ।।
गर्भशोषे च वातानां क्षीरं परममुच्यते ।
यह क्षीण, कृश, शोथ तथा राजयक्ष्मा (क्षय) के रोगियों, नित्य व्यायाम, परिश्रम का कार्य तथा नित्य स्त्रीसंभोग करने वाले एवं जिनका वीर्य क्षीण (निर्बल) हो गया है—उन मनुष्यों में हितकर माना गया है । इसके अतिरिक्त दारुण गर्भस्राव (Severe Abortion), रक्तपित्त, अर्श, मद के कारण हुई क्षीणता, ज्वर तथा वायु के कारण हुए गर्भशोष में दूध अत्यन्त हितकर माना गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में दूध के सामान्य गुण अत्यन्त विस्तार से दिये गये हैं ।।
सामान्यादिह दुग्धानां पुरा चोक्ता गुणादयः ।।
पृथक्त्वेन च वक्ष्यामि गवादीनां विशेषणम् ।
ये सम्पूर्ण दूध के सामान्य गुण कहे गये हैं। अब मैं गौ आदि के दूध का विशेष रूप से पृथक् २ वर्णन करूंगा ।।
तृणगुल्मौषधीनां च अग्राग्रं पय एव हि ।।
खादन्ति मधुरप्रायं लवणं च विशेषतः । तत्सारगुणवैशेष्याद्गवां क्षीरं प्रशस्यते ।।
गौ के दूध के गुण—गौ का दूध तृण, गुल्म और ओषधियों का प्रधान अथवा सारभाग होता है । गौएं मधुर एवं लवण प्रधान द्रव्यों का भक्षण करती हैं । इसलिये गौओं का दूध उन सबका सार होने के कारण प्रशस्त माना गया है ।।
मधुरो हि रसः श्रेष्ठो रसानां परिकीर्तितः । तन्नित्यं वा गवां क्षीरं मधुरं बृंहणं मतम् ।।
सम्पूर्ण रसों में मधुर रस श्रेष्ठ माना गया है। उसका नित्य सेवन करने के कारण गौओं का दूध मधुर एवं बृंहण होता है ।।
औषधाग्रातिभक्षत्वाद्विरेचयति तत् पयः । एतस्मात् कारणादुक्तं गवां क्षीरं रसायनम् ।।
ओषधियों के प्रधान अंश का अत्यधिक भक्षण करने के कारण वह (गोदुग्ध) विरेचन कराता है । इसी कारण से गौ का दूध रसायन माना गया है । ये सब गोदुग्ध के विशेष गुण कहे गये हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत अ. ४५ में भी कहा है । आहार के विषय में पाश्चात्य विद्वान् Robert Mc carrison ने अपनी ‘Food’ नामक पुस्तक में विस्तृत रूप से लिखा है ।।
एष वैशेषिकगुणो गोक्षीरस्य प्रकीर्तितः । क्रिमीकीटपतङ्गैश्च सर्पैरपि तृणाश्रितैः ।।
सह नानातृणं हीनं महिष्यो भक्षयन्ति हि । अवगाहन्ति तोयानि गर्भाणि च विशेषतः ।।
एतस्ताम् कारणात्तासां क्षीरं कषायशीतलम् । शीतत्वाद् दुर्जरं स्निग्धं (गुरु) दाहनिबर्हणम् ।।
गवां क्षीराच्चाल्पा (गु)णं महिषीणां पयो मतम् ।
क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] खिलस्थानम् ५४७
भैंस के दूध के गुण—भैंसे तृण घास आदि में रहने वाले कृमि, कीड़े, पतङ्गे तथा सांप आदि के साथ नाना प्रकार की हीन (निकृष्ट) तथा घास को खाती हैं। तथा वे पानी में अवगाहन करती रहती हैं अर्थात् पानी में बैठी रहती हैं इस लिये उनका (भैंसों का) दूध कषाय एवं शीतल होता है। शीतल होने से वह दुर्जर, स्निग्ध, गुरु (भारी) तथा दाह को शान्त करने वाला है। इसलिये भैंसों का दूध गाय के दूध की अपेक्षा अल्पगुणों वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तानिबर्हणात् ।।
अल्पत्वाच्च बलित्वाच्च लघु दोषहरं पयः । अल्पत्वात्तद्धनं क्षीरं घनत्वादपि बृंहणम् ।।
शीतं संग्राहि मधुरं बल्यं वातानुलोमनम् ।
बकरी के दूध के गुण—बकरियों के सूक्ष्म काय होने के कारण तथा कटु एवं तिक्त द्रव्यों (वृक्ष आदि के पत्तों) के सेवन करने से तथा उनके दूध के अल्प एवं बलवान् होने के कारण बकरी का दूध लघु एवं दोषनाशक होता है। वह दूध अल्प (परिमाण में थोड़ा) होने के कारण घन (सान्द्रगाढ़ा) होता है तथा घन होने से वह बृंहणकारक होता है। वह दूध शीतल, संग्राही, मधुर, बलवान् तथा वायु का अनुमोदन करने वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
महाशयतया श्याम(न)मधुरप्रायसेवनात् ।।
बहुत्वाच्च घनत्वाच्च बल्यं पुष्टिकरं पयः । गुरु वृष्यं च निर्दिष्टं मधुरं च विशेषतः ।।
अल्पाहारतयोष्ट्रीणां प्रियं चाऽऽलवणं ...... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २५९ त¹मं पत्रम् ।)
ऊंटनी के दूध के गुण—ऊंटनी के शरीर के बहुत बड़ा एवं श्याम वर्ण का होने से, मधुर प्राय ओषधियों के सेवन करने से तथा दूध के परिमाण में अधिक होने से ऊंटनी का दूध बल्य (Tonic), पुष्टिकारक, गुरु, वृष्य तथा विशेषकर रस में मधुर होता है। ऊंटनी के आहार कम करने से वह दूध प्रिय तथा ईषत् लवण (नमकीन) होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
वक्तव्य—इससे आगे यह अध्याय खण्डित है। उस खण्डित अंश में बचे हुए प्राणियों के प्रत्येक के दूध का इसी प्रकार पृथक् २ वर्णन होना चाहिये। अब हम अन्य ग्रन्थों के आधार पर बचे हुए प्राणियों के दूध के गुणों का वर्णन करेंगे। भेड़ के दूध के गुण—यह पित्त और कफ को बढ़ाने वाला है। (च.सू. अ. २७)। हथिनी के दूध के गुण—'हस्तिनीनां पयोबल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्' । (चरक सू. अ. २७)। घोड़ी, गधी आदि एक शफवाले प्राणियों के दूध के गुण—यह रूक्ष, लघु, मधुर, अम्ल तथा अनुरस में लवण है—तथा शाखागत वात रोगों को नष्ट करता है (सुश्रुत सू. अ. ४५)। शाखा का अभिप्राय हाथ, पैर आदि से है। स्त्री के दूध के गुण—'जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः । नावनं रक्तपित्त च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम् ॥' (चरक. सू. अ. २७)। आजकल के विद्वान् भी दूध को पूर्ण भोजन (Perfect food) मानते हैं। दूध में लगभग वे सब घटक न्यूनाधिक रूप में विद्यमान होते हैं जो मनुष्य के शरीर के पोषण तथा वृद्धि के लिये आवश्यक होते हैं। दूध प्रत्येक प्राणी को जातिसात्म्य होता है इसीलिये दूध बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, प्रौढ़-प्रत्येक अवस्था में हितकर एवं सात्म्य होता है। बालक तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिये तो जीवन का सबसे अधिक सहारा होता है। दूध एक प्रकार का स्नेह का घोल (Emmulsion) होता है अर्थात् इसमें स्नेह के कण (Fat globules) अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में विद्यमान होते हैं इसीलिये यह अत्यन्त सुपच होता है।
१. अस्याग्रे एकं पत्रं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके।
५४८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३]
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यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। अध्याय के अन्त के समाप्तिसूचक लेख को देखकर ही इस अध्याय का 'पानीयगुणविशेषीय' यह नाम प्रतीत होता है। इस अध्याय में भिन्न २ प्रकार के जलों के विशेष गुण दिये गये हैं। अब हम प्राप्त एवं खण्डित श्लोकों की यथासंभव व्याख्या करते हैं।
अतीते प्रथमे मासि प्रावृट्प्रौष्ठपदागमे ।।
दिव्यं खात् पतितं तोयं नाम्ना हंसोदकं शिवम् ।
आपूतं सूर्यतेजोभिरगस्त्येनाऽविषीकृतम् ।।
प्रावृत्त ऋतु (आषाढ़ तथा श्रावण मास) और प्रौष्ठपद (भाद्रपद मास-वर्षा ऋतु का प्रारम्भ) के व्यतीत हो जाने पर प्रथम मास में अर्थात् शरदऋतु (कार्तिक तथा मार्गशीर्ष) में आकाश से गिरनेवाला दिव्य जल 'हंसोदक' कहलाता है। यह जल कल्याणकारक एवं पवित्र होता है तथा सूर्य के तेज एवं अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के कारण विषरहित हो जाता है। अर्थात् शरद् ऋतु से पूर्व वर्षा में जल अत्यन्त मलिन एवं अपरिपक्व (अम्लविपाक) होता है—उसका सम्यक् पाक नहीं होता है। उस जल में वर्षा के कारण बहुत मलिनताएं होती हैं। वह जल पीने के योग्य नहीं होता है। इस जल के सेवन में अनेक प्रकार के संक्रामक रोग होने का भय रहता है। इसीलिये चरक में कहा है—'उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ......... चात्र वर्जयेत् ।। इसके बाद शरदऋतु में वही जल काल द्वारा सम्यक् परिपक्व होकर दोषरहित तथा अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने से विषरहित हो जाता है। उस जल को 'हंसोदक' कहते हैं। इस जल का सेवन करना चाहिये। हंसोदक का अर्थ सूर्य और चन्द्रमा के कारण निर्मल हुआ अथवा हंस के समान निर्मल जल होता है।।
..................................... । ...................................ति ।।
स्निग्धं वृष्यं च बल्यं च हेमन्ते गुरु वर्षति । शिशिरे वर्षति जलं कफवातप्रकोपनम् ।।
वसन्ते वर्षति जलं कषायस्वादुरूक्षणम् । तत्र ................................. ।।
....... हेमन्त ऋतु में वर्षा के समय जल स्निग्ध, वृष्य, बलवान् तथा गुरु होता है। शिशिर ऋतु में बरसने वाला जल कफ तथा वायु को प्रकुपित करता है। तथा वसन्त में बरसने वाला जल कषाय, स्वादु तथा रूक्ष होता है। ..... भिन्न २ ऋतुओं में बरसने वाले जलों के गुण पृथक् २ होते हैं। चरक सू. अ. २७ में इसका वर्णन किया गया है।।
.................. (पति)तं क्षितौ । तत् पात्रोपेक्षितवति पात्रदोषेण तत्त्वतः ।।
नानारसत्वं भजते तोयं संप्राप्य भूत लम् ।
....... अन्तरिक्ष से गिरता हुआ जल भूमि पर पहुंचकर पात्र (स्थान) की अपेक्षा रखता है। पात्रों (भिन्न २ स्थानों) के दोषों के अनुसार वह भूमि पर पहुँच कर अनेक रसों वाला हो जाता है।
**वक्तव्य—**साधारणतया आन्तरिक्ष जल का कोई रस नहीं होता है। उसका रस अव्यक्त माना गया है। परन्तु जब वह बरस कर नीचे भूमि पर आता है तब उसमें आकाश, वायुमण्डल तथा भूमि की अनेक मलिनताओं के मिल जाने से वह जल अनेक रसों वाला हो जाता है। आन्तरिक्ष जल सब जगह का एक ही गुण वाला होता है। परन्तु भिन्न २ स्थानों की भूमि के गुण भिन्न २ हुआ करते हैं। उस २ भूमि पर पहुंचने पर वह अव्यक्तरस वाला आन्तरिक्ष जल भिन्न २ रसोंवाला हो जाया करता है। चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी इसी प्रकार कहा गया है।।
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