काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 906, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] |
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क्षीरं सात्म्यं हि बालानां क्षीरं जीवनमुच्यते । क्षीरं पुष्टिकंर वृद्धिकरं बलविवर्धनम् ।।
क्षीरमोजस्करं पुंसां क्षीरं प्राणगुणावहम् । गर्भधानकरं क्षीरं बन्ध्यानामपि योषिताम् ।।
बालकों के लिये दूध सात्म्य होता है तथा उनका जीवन होता है (अर्थात् उनके लिये जीवन तुल्य होता है) । यह पुष्टि, शरीर की वृद्धि तथा बल को बढ़ाने वाला है । दूध प्राणियों में ओज को बढ़ाता है तथा प्राणों को बलवान् बनाता है तथा यह बन्ध्या (बांझ) स्त्रियों में गर्भ का स्थापन कराता है । अर्थात् इसमें गर्भस्थापक गुण हैं ।।
क्षीणानां च कृशानां च शोषिनां राजयक्ष्मणाम् ।
व्यायामश्रमनित्यानां स्त्रीनित्यानां च देहिनाम् ।।
संक्षीणरेतसां चापि गर्भस्त्रावे च दारुणे । रक्तपित्तामयेऽर्शस्सु मदक्षीणे ज्वरे तथा ।।
गर्भशोषे च वातानां क्षीरं परममुच्यते ।
यह क्षीण, कृश, शोथ तथा राजयक्ष्मा (क्षय) के रोगियों, नित्य व्यायाम, परिश्रम का कार्य तथा नित्य स्त्रीसंभोग करने वाले एवं जिनका वीर्य क्षीण (निर्बल) हो गया है—उन मनुष्यों में हितकर माना गया है । इसके अतिरिक्त दारुण गर्भस्राव (Severe Abortion), रक्तपित्त, अर्श, मद के कारण हुई क्षीणता, ज्वर तथा वायु के कारण हुए गर्भशोष में दूध अत्यन्त हितकर माना गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में दूध के सामान्य गुण अत्यन्त विस्तार से दिये गये हैं ।।
सामान्यादिह दुग्धानां पुरा चोक्ता गुणादयः ।।
पृथक्त्वेन च वक्ष्यामि गवादीनां विशेषणम् ।
ये सम्पूर्ण दूध के सामान्य गुण कहे गये हैं। अब मैं गौ आदि के दूध का विशेष रूप से पृथक् २ वर्णन करूंगा ।।
तृणगुल्मौषधीनां च अग्राग्रं पय एव हि ।।
खादन्ति मधुरप्रायं लवणं च विशेषतः । तत्सारगुणवैशेष्याद्गवां क्षीरं प्रशस्यते ।।
गौ के दूध के गुण—गौ का दूध तृण, गुल्म और ओषधियों का प्रधान अथवा सारभाग होता है । गौएं मधुर एवं लवण प्रधान द्रव्यों का भक्षण करती हैं । इसलिये गौओं का दूध उन सबका सार होने के कारण प्रशस्त माना गया है ।।
मधुरो हि रसः श्रेष्ठो रसानां परिकीर्तितः । तन्नित्यं वा गवां क्षीरं मधुरं बृंहणं मतम् ।।
सम्पूर्ण रसों में मधुर रस श्रेष्ठ माना गया है। उसका नित्य सेवन करने के कारण गौओं का दूध मधुर एवं बृंहण होता है ।।
औषधाग्रातिभक्षत्वाद्विरेचयति तत् पयः । एतस्मात् कारणादुक्तं गवां क्षीरं रसायनम् ।।
ओषधियों के प्रधान अंश का अत्यधिक भक्षण करने के कारण वह (गोदुग्ध) विरेचन कराता है । इसी कारण से गौ का दूध रसायन माना गया है । ये सब गोदुग्ध के विशेष गुण कहे गये हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत अ. ४५ में भी कहा है । आहार के विषय में पाश्चात्य विद्वान् Robert Mc carrison ने अपनी ‘Food’ नामक पुस्तक में विस्तृत रूप से लिखा है ।।
एष वैशेषिकगुणो गोक्षीरस्य प्रकीर्तितः । क्रिमीकीटपतङ्गैश्च सर्पैरपि तृणाश्रितैः ।।
सह नानातृणं हीनं महिष्यो भक्षयन्ति हि । अवगाहन्ति तोयानि गर्भाणि च विशेषतः ।।
एतस्ताम् कारणात्तासां क्षीरं कषायशीतलम् । शीतत्वाद् दुर्जरं स्निग्धं (गुरु) दाहनिबर्हणम् ।।
गवां क्षीराच्चाल्पा (गु)णं महिषीणां पयो मतम् ।