काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] खिलस्थानम् ५४५
हे जीवक ! प्राचीन काल में प्रजापति (ब्रह्मा) की इच्छा से सम्पूर्ण प्राणियों के प्राणों का धारण हुआ। पञ्चमहाभूतों के गुणों से युक्त पर्वतों का जन्म हुआ तथा वनस्पति, वृक्ष, सम्पूर्ण वानस्पत्य, वीरुध्, ओषधि, गुल्म, विविध प्रकार के तृण, घास तथा मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार यह उपर्युक्त सम्पूर्ण वर्ग भूमि का सार कहलाता है। अर्थात् इन सबकी पृथ्वी पर उत्पत्ति होने के कारण ये सब पृथ्वी के सार रूप हैं।
वक्तव्य—वनस्पति-जिसके पुष्प न हों पर फल हों उन्हें वनस्पति कहते हैं तथा इसका उदाहरण गूलर दिया जाता है। 'अपुष्पा' का अर्थ 'अविद्यमानपुष्प' किया जाता है अर्थात् जिसमें पुष्प न हों। परन्तु यह बात वनस्पति शास्त्र के सिद्धान्त के ही विरुद्ध है कि बिना पुष्प के फल हो जाय। पहले पुष्प उत्पन्न होते हैं तथा उसीसे बाद में फल बनते हैं। आधुनिक विद्वान् यह मानते हैं कि गूलर आदि फलों को यदि सूक्ष्मवीक्षण यन्त्र से देखा जाय तो हमें ज्ञान होता है कि इनके अन्दर भी असंख्य सूक्ष्म फूल होते हैं जो एक बन्द आधार में रहते हैं। इसलिये 'अपुष्पा' का अर्थ अविद्यमान न करके 'अदृश्य' किया जाना अधिक उचित है अर्थात् इनमें फूल अदृश्य होता है। वृक्ष-जिनके फूल भी हों और फल भी हों उन्हें वृक्ष कहते हैं जैसे आम्र, जामुन आदि। वानस्पत्य—वानस्पत्य तथा वृक्ष का एक ही अभिप्राय होता है। तन्त्रान्तर में कहा है-'वानस्पत्यः फलपुष्पवति वृक्षे। पुष्पजफलवृक्षे आम्रादौ।' वीरुध्—जो फैलने वाली लता होती है उन्हें वीरुध् कहते हैं। ओषधि-जो फल के पक जाने पर नष्ट हो जाती हैं उन्हें 'ओषधि' कहते हैं। मनुस्मृति में भी कहा है—'ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः' अर्थात् जिसमें पुष्प और फल बहुत हों परन्तु फल के पक जाने पर जो नष्ट हो जाती है उसे 'ओषधि' कहते हैं। इसके उदाहरण-शालि, यव, गोधूम (गेहूं), तिल तथा मूंग आदि हैं। गुल्म—जो गुल्म या गुच्छे के आकार का हो उसे 'गुल्म' कहते हैं। यह काण्डशून्य वृक्ष जाति होती है। इसका समावेश भी वीरुध् में ही होता है ॥४-६॥
सोमस्य वायुतेजोपां बुद्धिश्चेति प्रजापतेः ।। तदाहारगुणोत्पन्नं गवादीनामतः परम् ।
उपर्युक्त गुण वाले आहारों से उत्पन्न होने के कारण गौ आदि का दूध सोम (चन्द्रमा), वायु, तेज (सूर्य), जल तथा प्रजापति (ब्रह्मा) को बुद्धिरूप समझा जाता है। अर्थात् गौ आदि प्राणियों का दूध उपर्युक्त आहार के सेवन से बनता है तथा वह आहारद्रव्य सूर्य, चन्द्रमा, जल आदि से उत्पन्न होता है। इसलिये यह उनका बुद्धिरूप या सारतत्त्व समझा जा सकता है॥
यथा सर्वौषधीसारं क्षीरोदे मथिते पुरा ।। संभूतदमृतं दिव्यममरा येन देवताः। तथा सर्वौषधीसारं गवादीनां तु कुक्षिषु ।। क्षीरमुत्पद्यते तस्मात् कारणादमृतोपमम् ।
जिस प्रकार प्राचीन काल में क्षीरसागर के मथे जाने पर सम्पूर्ण ओषधियों का सार दिव्य अमृत बन गया था उसी प्रकार सम्पूर्ण ओषधियों का सार गौ आदि की कुक्षि (पेट) में पहुँच कर दूध बन जाता है। इसलिये यह अमृत के समान होता है॥
जरायुजानां भूतानां विशेषेण तु जीवनम् ।।
पशु, मनुष्य आदि जरायुज प्राणियों के लिये दूध विशेषकर जीवन देने वाला है। चरक सू. अ. २७ में भी कहा है कि दूध सबसे श्रेष्ठ जीवनीय (जीवन देने वाला) द्रव्य समझा जाता है। जरायुज—जो प्राणी जरायु-अर्थात् गर्भाशय से उत्पन्न होते हैं उन्हें जरायुज कहते हैं। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—'तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः' ।