भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 904

५४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२]

अधिक महत्त्व दिया गया है । अधिकांश आयुर्वेदिक ओषधियों का अनुपान मधु ही होता है । इसका कारण मुख्यरूप से यह है कि मधु में योगवाही गुण होता है । योगवाही का अभिप्राय यह है कि उसे जिस द्रव्य के साथ मिलाया जाता है, अपने गुणों को स्थिर रखने हुए वह उसके गुणों को बढ़ा देता है । इसी गुण के कारण इसका इतना महत्त्व है । भिन्न २ प्रकार की मक्खियों द्वारा संचित किये हुए मधु के गुणों में परस्पर अन्तर होता है । इसका विशेष विवरण सुश्रुत सू. अ. ४५ मधुवर्ग में देखें ॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मधुविशेषणीयो नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ थ १ (२१)


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु मधुविशेषणीयो नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥


अथ क्षीरगुणविशेषीयाध्यायो द्वाविंशतितमः ।

अथातः क्षीरगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम क्षीरगुण विशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । अर्थात् इस अध्याय में भिन्न २ प्राणियों के दूधों के पृथक् २ गुणों का विवेचन किया जायगा ॥१-२॥

गोर्महिष्या अजायाश्च नार्या उष्ट्या अवेः स्त्रियाः ।
तुरङ्ग्या इति चोक्तानि पूर्वमेव पयांसि तु ॥३॥
भूयश्च गुणवैशेष्यात् क्षीराण्राष्टौ निबोध मे ।

गौ, भैंस, बकरी, नारी, ऊंटनी, भेड़, स्त्री तथा घोड़ी के दूध का पहले वर्णन किया गया है । अब गुणों की विशेषता के कारण पुनः इन आठ प्रकार के दूध के विषय में तू मेरे से सुन ।

**वक्तव्य—**यहां नारी तथा स्त्री शब्द दोनों एक ही अर्थ के वाचक हैं । यह संभवतः प्रमादवश लिखा गया है । इन दोनों में से एक शब्द के स्थान पर हथिनी वाचक शब्द होना चाहिये । क्योंकि स्त्री शब्द का दोबारा आने का कोई अर्थ नहीं है तथा हथिनी के दूध का इसमें समावेश नहीं किया गया है । हथिनी के दूध को मिलाकर ही आठ प्रकार के दूध होते हैं । आयुर्वेद में चिकित्सार्थ अनेक प्राणियों के दूध का उपयोग किया जाता है परन्तु जहां तक पीने का संबन्ध है उपर्युक्त आठ प्राणियों का दूध ही व्यवहृत होता है ॥३॥

प्रजापतेः पुरेच्छातः प्रजानां प्राणधारणम् ॥४॥
पञ्चभूतगुणं चापि भूरुहां जन्म कथ्यते । वनस्पतीनां वृक्षाणां वानस्पत्यगणस्य च ॥५॥
वीरुधामोषधीनां च गुल्मानामपि जीवक ! । विविधानां तृणानां च सस्यानां चैव देहिनाम् ॥६॥
एवमादिगणो यस्तु भूमेः सार उदाहृतः ।