काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 903, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५४३
नामक २१वें अध्याय का भी बहुत सा अंश खण्डित है। (इस प्रकार अष्टज्वरचिकित्सिताध्याय बीच में ही खण्डित हो गया है)।
वक्तव्य—यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। अध्याय के अन्त में थोड़े से श्लोक इस अध्याय के मिलते हैं। अध्याय के अन्त में अध्याय की समाप्ति की सूचना देनेवाले लेख को देखकर ही अनुमान होता है कि यह मधुविशेषणीय नामक २१ वां अध्याय है। अब हम उपलब्ध श्लोकों का व्याख्यान करेंगे।
............ शिशुं प्राशयेयुः कथञ्चन ।।
शिशु को किसी प्रकार मधु का सेवन कराना चाहिये।
वक्तव्य—प्रारंभिक सम्पूर्ण श्लोकों के खण्डित होने से यह कहना कठिन है कि ऊपर से क्या प्रकरण आ रहा है। फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि कम से कम यह प्रकरण शिशुओं को मधु सेवन कराने का है। सुश्रुत में अत्यन्त विस्तार के साथ मधु के गुणों का वर्णन किया गया है। नवजात शिशु को अनेक स्थानों पर मधु चटाने का विधान दिया गया है ।।
नवसद्यःक्षतानां तद् व्रणानां रोहणं भवेत् ।
क्षतजं प्राप्य हि विषं दर्शयत्यात्मनो बलम् ।।
प्रसादयति तच्चाशु सन्धत्ते च मधु व्रणम् ।
मधु के गुण—मधु नवीन एवं सद्यःक्षत व्रणों का रोहण करता है–उन्हें भर देता है। क्षत (चोट आदि) के कारण शरीर में जो विष उत्पन्न हो जाता है उस पर मधु अपनी शक्ति प्रकट करता है। मधु उस विष को शान्त कर देता है तथा व्रण का सन्धान करता है ।।
तस्मात् स्वभावतो नृणां सहोष्णोनाशितं मधु ।।
विरुद्धत्वान्त्रिभिर्दोषैर्जीवितान्ताय कल्पते ।
तुल्यत्वादुष्णयोगाच्च यथा च मधुसर्पिषी ।
मधु अपने स्वभाव से तीनों दोषों से विरुद्ध होने के कारण उष्ण पदार्थों के साथ सेवन किया जाता हुआ मृत्यु का कारण होता है। उदाहरण के लिये मधु तथा घृत समान मात्रा में लेने से तथा उष्णता के कारण घातक होता है। अर्थात् मधु को घृत के साथ यदि सेवना करना हो तो दोनों द्रव्य समान परिमाण में कभी नहीं होने चाहिये। समान परिमाण में मिलने से वे दोनों दूषितविष का कार्य करते हैं। मधु के विषय में दूसरी बात यह ध्यान रखनेवाली है कि इसे न तो कभी स्वयं उष्ण करना चाहिये तथा न उष्ण द्रव्यों के साथ या उष्ण प्रकृतिवाले मनुष्य में सेवन कराना चाहिये। मधुमक्खियों द्वारा यह अनेक प्रकार के फूलों से संग्रह किया जाता है। उन फूलों में कई विषयुक्त भी हो सकते हैं जिससे मधु में कुछ विषयुक्त अंश भी विद्यमान हो सकता है। विष का उष्णता से विरोध होता है। उष्णता मिलने से विष प्रकुपित हो जाता है। इसलिये मधु को कभी भी गरम नहीं करना चाहिये। गरम वस्तुओं के साथ इसे मिलाना भी नहीं चाहिये तथा उष्ण प्रकृति वाले रोग अथवा मनुष्यों में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। परन्तु वमन द्रव्यों के साथ यदि मधु का प्रयोग किया जा रहा हो तो वहां उष्णता का विरोध नहीं होता क्योंकि उसका परिपाक नहीं होता है तथा शरीर में वह ठहरता नहीं है। मधु एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसे मधुमक्खियां भिन्न २ फूलों से लाकर अपने छत्तों में एकत्र करती हैं। इसमें अन्य तत्त्वों के अतिरिक्त सबसे अधिक मात्रा में ग्लूकोज (Glucose) होता है। ग्लूकोज का पाचन बहुत सुगमता से हो सकता है तथा यह हृदय को अत्यन्त बल देने वाला पदार्थ है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में मधु को बहुत
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