काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] खिलस्थानम् ५४७
भैंस के दूध के गुण—भैंसे तृण घास आदि में रहने वाले कृमि, कीड़े, पतङ्गे तथा सांप आदि के साथ नाना प्रकार की हीन (निकृष्ट) तथा घास को खाती हैं। तथा वे पानी में अवगाहन करती रहती हैं अर्थात् पानी में बैठी रहती हैं इस लिये उनका (भैंसों का) दूध कषाय एवं शीतल होता है। शीतल होने से वह दुर्जर, स्निग्ध, गुरु (भारी) तथा दाह को शान्त करने वाला है। इसलिये भैंसों का दूध गाय के दूध की अपेक्षा अल्पगुणों वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तानिबर्हणात् ।।
अल्पत्वाच्च बलित्वाच्च लघु दोषहरं पयः । अल्पत्वात्तद्धनं क्षीरं घनत्वादपि बृंहणम् ।।
शीतं संग्राहि मधुरं बल्यं वातानुलोमनम् ।
बकरी के दूध के गुण—बकरियों के सूक्ष्म काय होने के कारण तथा कटु एवं तिक्त द्रव्यों (वृक्ष आदि के पत्तों) के सेवन करने से तथा उनके दूध के अल्प एवं बलवान् होने के कारण बकरी का दूध लघु एवं दोषनाशक होता है। वह दूध अल्प (परिमाण में थोड़ा) होने के कारण घन (सान्द्रगाढ़ा) होता है तथा घन होने से वह बृंहणकारक होता है। वह दूध शीतल, संग्राही, मधुर, बलवान् तथा वायु का अनुमोदन करने वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
महाशयतया श्याम(न)मधुरप्रायसेवनात् ।।
बहुत्वाच्च घनत्वाच्च बल्यं पुष्टिकरं पयः । गुरु वृष्यं च निर्दिष्टं मधुरं च विशेषतः ।।
अल्पाहारतयोष्ट्रीणां प्रियं चाऽऽलवणं ...... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २५९ त¹मं पत्रम् ।)
ऊंटनी के दूध के गुण—ऊंटनी के शरीर के बहुत बड़ा एवं श्याम वर्ण का होने से, मधुर प्राय ओषधियों के सेवन करने से तथा दूध के परिमाण में अधिक होने से ऊंटनी का दूध बल्य (Tonic), पुष्टिकारक, गुरु, वृष्य तथा विशेषकर रस में मधुर होता है। ऊंटनी के आहार कम करने से वह दूध प्रिय तथा ईषत् लवण (नमकीन) होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥
वक्तव्य—इससे आगे यह अध्याय खण्डित है। उस खण्डित अंश में बचे हुए प्राणियों के प्रत्येक के दूध का इसी प्रकार पृथक् २ वर्णन होना चाहिये। अब हम अन्य ग्रन्थों के आधार पर बचे हुए प्राणियों के दूध के गुणों का वर्णन करेंगे। भेड़ के दूध के गुण—यह पित्त और कफ को बढ़ाने वाला है। (च.सू. अ. २७)। हथिनी के दूध के गुण—'हस्तिनीनां पयोबल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्' । (चरक सू. अ. २७)। घोड़ी, गधी आदि एक शफवाले प्राणियों के दूध के गुण—यह रूक्ष, लघु, मधुर, अम्ल तथा अनुरस में लवण है—तथा शाखागत वात रोगों को नष्ट करता है (सुश्रुत सू. अ. ४५)। शाखा का अभिप्राय हाथ, पैर आदि से है। स्त्री के दूध के गुण—'जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः । नावनं रक्तपित्त च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम् ॥' (चरक. सू. अ. २७)। आजकल के विद्वान् भी दूध को पूर्ण भोजन (Perfect food) मानते हैं। दूध में लगभग वे सब घटक न्यूनाधिक रूप में विद्यमान होते हैं जो मनुष्य के शरीर के पोषण तथा वृद्धि के लिये आवश्यक होते हैं। दूध प्रत्येक प्राणी को जातिसात्म्य होता है इसीलिये दूध बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, प्रौढ़-प्रत्येक अवस्था में हितकर एवं सात्म्य होता है। बालक तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिये तो जीवन का सबसे अधिक सहारा होता है। दूध एक प्रकार का स्नेह का घोल (Emmulsion) होता है अर्थात् इसमें स्नेह के कण (Fat globules) अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में विद्यमान होते हैं इसीलिये यह अत्यन्त सुपच होता है।
१. अस्याग्रे एकं पत्रं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके।