भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५४१

पिप्पल्यादिवचादारुवयःस्थासरलान्वितः ।। पेयः कफोत्तरे सामे सहिङ्गुक्षारसैन्धवः । दोषास्तेनाशु पच्यन्ते विबन्धश्चोपशाम्यति ।।

ज्वर में कफरूप आमरस की प्रधानता होने पर पिप्पली बच, देवदारु, वयस्था (हरड़), सरल (चीड़), हींग, सर्जक्षार तथा सैन्धव का प्रयोग करना चाहिये । इससे दोषों का शीघ्र ही पाचन होता है तथा ज्वर भी शान्त हो जाता है ।।

नागरं कटफलं धान्यं मुस्तं पर्पटकं वचा । देवदार्वभया भार्गी भूतीकं दशमं भवेत् ।। शृतं सैन्धवहिङ्गुभ्यां पेयं वातकफोत्तरे । ऊर्ध्वजत्र्वङ्गरोगाणां ज्वरितानां प्रशस्यते ।।

वात एवं कफ प्रधान ज्वर में सोंठ, कायफल, धनिया, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, बच, देवदारु, हरड़, भार्गी तथा भूतीक (यवानी-अजवायन)-इन दस द्रव्यों का क्वाथ बनाकर उसमें सैन्धव तथा हींग मिलाकर प्रयोग कराना चाहिये । यह ज्वरयुक्त रोगी के ऊर्ध्वजत्रुज अङ्गों के रोगों में प्रशस्त माना गया है ।।

शटीपौष्करपिप्पल्यो बृहती कण्टकारिका । शुण्ठी कर्कटकी भार्गी दुरालम्भा यवानिका ।। शूलानाहविबन्धघ्नं शठ्याद्यं कफवातनुत् ।

शटि (कपूरकचरी-कचूर), पुष्करमूल, पिप्पली, बृहती (बड़ी कटेरी-भटकटैया), कण्टकारी, सोंठ, काकड़ाशृङ्गी, भार्गी, दुरालभा तथा यवानी (खुरासानी अजवायन) का प्रयोग करना चाहिये । यह शठ्यादि प्रयोग शूल, आनाह, विबन्ध तथा वात और कफ को नष्ट करता है ।।

विडङ्गातिविषे भार्गी पौष्करं चित्रकं शटी ।। शार्ङ्गेष्टा पिप्पली शुण्ठी पिबेद्वातकफोत्तरे ।

वात एवं कफ प्रधान ज्वर में विडङ्ग, अतीस, भार्गी, पुष्करमूल, चित्रक, कचूर, शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), पिप्पली तथा सोंठ का सेवन करना चाहिये ।।

दुरालभावचादारुपिप्पलीमूलनागरम् ।। .................... पुष्करं शटी । क्वाथं सलवणं देयं हिङ्गुक्षारान्वितं पिबेत् ।। सन्निपाते विबन्धे च वातश्लेष्मोत्तरे ज्वरे ।

सन्निपात, विबन्ध तथा वात कफ प्रधान ज्वर में दुरालभा, बच, देवदारु, पिप्पलीमूल, सोंठ ..... पुष्करमूल तथा कचूर के क्वाथ में लवण हींग तथा सर्जक्षार मिलाकर पिलाना चाहिये ।।

जीवकर्षभकौ शृङ्गी मूलं पुष्करजं शटी ।। सन्निपातेऽनिलकफे कासे चैषां प्रशस्यते ।

यदि सन्निपात ज्वर में वात एवं कफ की प्रधानता हो तथा कास हो तो जीवक, ऋषभक, काकड़ाशृङ्गी, पुष्करमूल तथा कचूर का क्वाथ प्रशस्त होता है ।।

बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी ।। क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।

सन्निपात ज्वर में प्रारम्भ में दोषों का पाचन करने के लिये दोनों बृहती, पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ तथा कचूर का गरम २ क्वाथ पीना चाहिये ।।