काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
पिप्पली, अतीस, नागरमोथा, स्थिरा (शालपर्णी), आढ्या (अजमोदा), दुरालभा, रक्तचन्दन, जौ, खस, सारिवा, निदिग्धिका (कण्टकारी), रोहिणी, आंवला, बिल्व तथा त्रायमाणा से सिद्ध किया हुआ घृत शिरःशूल, कास, जीर्णज्वर तथा क्षयरोग को नष्ट करता है।
वमनं कफरोगाणां पैत्तिकानां विरेचनम् ।।
शोधनं शमनं कार्यं कृशे शमनशोधनम् ।
श्लैष्मिक रोगों में वमन के द्वारा तथा पैत्तिक रोगों में विरेचन के द्वारा शोधन करके फिर दोषों का शमन करना चाहिये। यदि रोगी कृश हो तो पहले दोषों का शमन करें, उसके बाद शोधन करना चाहिये ।।
मण्डादिरिष्यते सामे यवागूर्वातजे तथा ।।
विषौषधिप्रजातानां पित्तघ्नीं कारयेत् क्रियाम् ।
आमज्वर में मण्ड आदि तथा वातज्वर में यवागू का सेवन करना चाहिये। तथा विषौषधियों से उत्पन्न हुए ज्वर में पित्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ।।
सन्निपातज्वरस्यातः प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।।
स सर्वलक्षणोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्योऽल्पलक्षणः ।
अब मैं सन्निपात ज्वर की चिकित्सा कहूंगा। यदि सन्निपातज्वर में सम्पूर्ण लक्षण विद्यमान हों तो वह असाध्य होता है तथा यदि उसमें थोड़े ही लक्षण विद्यमान हों तो वह कृच्छ्रसाध्य होता है ।।
बलहीनस्य नष्टाग्नेः सर्वथा नैव सिध्यति ।।
किमङ्ग ! बालकानां तु क्षीणधातुबलौजसाम् । तथाऽपि यत्नमातिष्ठेदानृशंस्याद्भिषग्वरः ।।
हे प्रिय ! जिन बालकों का बल कम हो गया है, जिनकी जाठराग्नि नष्ट हो चुकी है तथा जिनके धातु, बल एवं ओज क्षीण हो चुके हैं—उनमें सन्निपात ज्वर सर्वथा साध्य नहीं है अर्थात् बिलकुल असाध्य है। तथापि चिकित्सक को मृत्यु अथवा अन्तिम भयंकर अवस्था तक भी प्रयत्न करते रहना चाहिये ।।
सन्निपातेषु दोषेषु यो दोषो बलवान् भवेत् । तमेवादौ प्रशमयेच्छेषं दोषमतः परम् ।।
सन्निपात ज्वर में जो दोष सबसे अधिक बलवान् हो पहले उसीकी चिकित्सा करनी चाहिये। शेष दोषों की उसके बाद चिकित्सा करनी चाहिये ।।
अल्पान्तरबलेष्वेषु दोषेषु मतिमान् भिषक् । श्लेष्माणमादौ शमयेत् स ह्येषामनुबन्धकृत् ।।
गुरुत्वात् कृच्छ्रपाकत्वादूर्ध्वकायाश्रयात्तथा ।
यदि सन्निपात ज्वर में तीनों दोष लगभग समान बलवाले हों तो बुद्धिमान् चिकित्सक को पहले श्लेष्मा (कफ) की शान्ति करनी चाहिये। क्योंकि इसमें गुरु, कृच्छ्रपाकी (जिसका पाक-विपाक कठिनता से होता हो) तथा शरीर के ऊर्ध्व भाग में स्थित होने के कारण श्लेष्मा ही अनुबन्धवाला होता है।
तस्माज्ज्वरे यदुद्दिष्टं वातपित्तकफात्मके ।।
तस्मात्तस्यामवस्थायां तत्तत् कार्यं चिकित्सितम् ।
इसलिये वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक ज्वरों में जो २ कहा गया है—ज्वर की उस २ अवस्था में वह २ चिकित्सा करनी चाहिये। ('सन्निपातज्वरस्यातः' इत्यादि ३८ वें श्लोक से 'कार्यं चिकित्सितम्' इत्यादि ४३ तक के श्लोक पहले सूतिकोपक्रमणीय अध्याय में १३९ से १४५ श्लोकों में अक्षरशः इसी रूप में आ चुके हैं। यहां पुनरावृत्ति हुई है) ।।