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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५४९

सर्वाम्बु सद्यःपतितमप्रशस्तमनार्तवम् ।।
त ...................................... । ................................... रूदकम् ।।

सम्पूर्ण जल जो सद्यः पतित हों तथा बेमौसमी हों वे अप्रशस्त माने गये हैं। ..... वर्षा ऋतु के अतिरिक्त दूसरी ऋतुओं के आन्तरिक्ष जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी ऐसा कहा गया है॥

कफानिलकरं पित्ते हितं शीतातिकारकम्। रक्तापित्तहरं रूक्षमवश्यायोदकं लघु ।।
एतच्चतुर्विधं प्रोक्तं तत्त्वेनाम्भोऽन्तरिक्षजम्। सह .................................... ।।
............................................................... श्लेष्मप्रकोपनाः ।

अवश्याय (ओस) का जल, कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला है, पित्त में हितकर है, अत्यन्त शीतकारक है, रक्तपित्त को नष्ट करता है और रूक्ष तथा लघु है। यह आन्तरिक्ष जल चार प्रकार का कहा गया है। ........

वक्तव्य—यहां चार प्रकार के आन्तरिक्ष जलों में से केवल एक अवश्याय (ओस) जल का वर्णन मिलता है। शेष तीन का वर्णन उपलब्ध नहीं है। तत्संबंधी श्लोक खण्डित हैं अतः उनके विषय में निश्चय से कुछ नहीं कहा जा सकता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी चार प्रकार के आन्तरिक्ष जल का वर्णन मिलता है। कहा है—तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम्। तद्यथा—धारं कारं तौषारं हैममिति। अर्थात् जो धारारूप में वर्षा हो उसे ‘धार’ कहते हैं। यदि ओले गिरें तो उस जल को ‘कार’, ‘तुषार’ (Snow या ओस) के रूप में गिरने वाले जल को तौषार तथा हिम (बर्फ-Ice) के रूप में गिरने वाले जल को ‘हैम’ जल कहते हैं॥

क्षारोदाः प्राक्सृता नद्यः कफघ्नाः पित्तकोपनाः ।।
लघूदकाः प्रतीचीगा वातलाः कफनाशनाः । क्षारं ताभ्यस्तु सामुद्रं मधुरं गुरु पच्यते ।।
...................................................... । ........................ लवणं जलम् ।।

पूर्व की ओर बहने वाली नदियों का जल क्षारयुक्त होता है तथा वह कफनाशक और पित्तप्रकोपक होता है। पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के जल लघु, वातकारक तथा कफनाशक होते हैं। सामुद्रजल क्षारयुक्त, मधुर, गुरु ....... एवं लवणयुक्त होता है।

वक्तव्य—यहां भिन्न २ दिशाओं की ओर बहने वाली नदियों के जलों के गुण दिये गये हैं। चरक (सू. अ. २७), सुश्रुत (सू. अ. ४५), अष्टाङ्ग हृदय आदि ग्रन्थों में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है॥

साभिष्यन्दि स्वादुपाकि शीतं पित्तघ्नमौद्भिदम्।
सत्त्वक्लेदमलाद् दुष्टं पल्बलाम्बु गुरु स्मृतम् ।।
कषायमधुरं स्वादु विमलं सारसं जलम्। कौपं पि ................................ ।।
.................................................... । इत्यष्टधा जलं प्रोक्तं भूमिजं वृद्धजीवक ! ।।

औद्भिद जल के गुण—औद्भिद जल अभिष्यन्दि, स्वादुपाकी (मधुर विपाक वाला), शीतल तथा पित्तनाशक होता है। पल्वल का जल-पल्वल का जल सत्त्व, क्लेद तथा मल के कारण दूषित होता है तथा गुरु होता है। सरोवर का जल—सरोवर का जल कषाय, मधुर, स्वादु तथा निर्मल होता है। कूप का जल.... (खारा, पित्तकारक, कफनाशक, दीप लघु होता है—सुश्रुत के आधार पर यह अर्थ किया गया है) हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह आठ तरह का भौमजल कहा गया है।

५५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३]

वक्तव्य—यहां श्लोकों के खण्डित होने से आठो प्रकार के जलों का वर्णन उपलब्ध नहीं है। केवल तीन चार प्रकार के जलों का संक्षेप से वर्णन मिलता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में सात प्रकार के भौम जल दिये हैं—तत्पुनः सप्तविधम् । तद्यथा-कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्राप्रवणं, औद्भिदं, चौण्ट्यमिति । इससे आगे इन भौमजलों के पृथक् २ गुणों का वर्णन भी सुश्रुत में वहीं पर किया गया है ॥

लघु प्रकामं सस्नेहं शीतं सर्वरसान्वितम् । तृष्णापहं मनोल्हादि श्लेष्मघ्नं क्रिमिनाशनम् ।।
रक्षोघ्नं जीवनं वृष्यं मूर्च्छघ्नं ........ । ........................................ ।।

सेवनीय जल—जो जल लघु, ईषत् स्नेहयुक्त, शीतल तथा सब रसों से युक्त हो, जो तृष्णा को शान्त करता हो, मन को आह्लादित करता हो, श्लेष्मा, कृमि तथा जन्तुओं का नाशक हो, जीवन को देनेवाला हो, वृष्य हो तथा मूर्च्छा को नष्ट करता हो—वह जल सेवन करने योग्य होता है ॥

............ सूक्ष्मप्राणिसमाकुलम् । बहलं कलुषं चैव तथा पिच्छिलमाविलम् ।
ग्रामक्षेत्ररसैर्दुष्टं विषमूलोपदूषितम् ।।
शकुन्तक्रिमिशैवालयुक्तमत्युष्णचिक्कणम् ।

त्याज्य जल—जिस जल में सूक्ष्म प्राणी (कृमि कीट आदि) हों, जो बहल (घना-सान्द्र), कलुष (कलुषित या मैला), पिच्छिल (चिपचिपा) तथा आविल (मलयुक्त) हो, जो जल ग्राम, क्षेत्र (खेत) तथा अनेक प्रकार के रसों के कारण दूषित हो, जो विषयुक्त मूलों (कन्दों) से विषैला हो, जिसमें अनेक पक्षी, कृमि तथा शैवाल (काई) पड़ी हुई हो तथा जो अत्यन्त गरम एवं चिकना हो—ऐसे जल का त्याग कर देना चाहिये । चरक सू. अं. २७ में भी इसी प्रकार कहा है ॥

........................................................................... ।।
............................ गुर्विणीषु च वर्जयेत् ।
धात्रीणां च विशेषेण स्वस्थानां रोगिणामपि ।।
पूर्वोक्तगुणबाहुल्यात् पानीयं सेव्यमिष्यते ।
विपाके मधुरं शैत्याद्वारि पित्तघ्नमुच्यते ।।

शीतल जल का निषेध .... गर्भिणी स्त्रियों को (शीतल जल का) प्रयोग नहीं कराना चाहिये । पूर्वोक्त गुणों की अधिकता के कारण स्वस्थ अथवा रुग्ण धात्रियों को शीतल जल का प्रयोग कराना चाहिये । शीतल होने के कारण जल विपाक में मधुर होता है । इसीलिये वह पित्तनाशक होता है ।

वक्तव्य—शीतल जल के निषेध के कारण प्रसङ्गवश हम शीतल जल के प्रयोग का विधान भी लिखते हैं जो इस ग्रन्थ में संभवतः खण्डित हो गया है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—मूर्च्छापित्तोष्णादाहेषु विषे रक्ते मदात्यये । भ्रमक्लमपरीतेषु तमके वमथौ तथा ।। ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ॥

................................................................... ।
............. णशीतमुष्णमथापि वा । भक्तस्य पूर्वं पीतं वा कृशत्वं कुरुते शिशोः ।।
भक्तस्य मध्ये पीतं तन्मध्यमत्वं नियच्छति । भक्तस्योपरि पीतं तु पीनत्वं (संप्रयच्छति) ।।

...... भोजन से पूर्व चाहे उष्ण अथवा शीतल जल पीने से शिशु कृश (कमजोर) हो जाता है । भोजन के मध्य में जल का सेवन करने से मध्य अवस्था रहती है तथा भोजन के अन्त में जल का सेवन करने से शिशु मोटा हो जाता है । तन्त्रान्तर में साधारणतया भोजन के बाद जल का पीना प्रशस्त माना गया है परन्तु कुछ रोगों की अवस्था में उसका निषेध किया गया है । ऐसा चरक सू. अ. २७ में कहा है ॥

पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५५१

.................................... । ............ निष्क्वाथोष्णाम्बु पाचनम् ।।
श्रमे भेदेषु तृष्णासु मूर्च्छास्वतिपिपासिते । निष्क्वाथलाघवादम्बु सलिलं तप्तशीतलम् ।।
निर्दिशेत् सर्वदोषघ्नं बालानां ........................... ।

उष्ण जल के गुण—क्वाथ बनाकर गरम किया हुआ जल पाचक होता है । क्वाथ बनाने के कारण लघु हुआ यह जल श्रम, भेद (मलभेद-अतिसार), तृष्णा, मूर्च्छा तथा अत्यन्त पिपासा में उपयोगी है । गरम करके ठण्डा किया हुआ यह जल बालकों के सब रोगों को नष्ट करने वाला कहा गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् । श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।। यहां उष्ण किये हुए अथवा क्वाथ बनाकर तैयार किये हुए हुए जल का क्या अभिप्राय है-इसको भी आचार्य स्वयं वहीं स्पष्ट करते हैं कि—जो जल क्वाथ बनाने के कारण हल्का हो गया हो तथा चतुर्थांश शेष रहा हो-वही गुणकारी होता है ।।२४-२५।।

......................................................... ।।
.............. मुष्णोदकं शिशोः । रक्तपित्तामयं त्यक्त्वा प्रायो वातकफात्मके ।।
रोगे शिशुर्वा धात्री वा गुर्विणी वोष्णकं पिबेत् । क्वचिद्रोगविशेषेण तप्तशीतं हितं बहु ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६१ तमं पत्रम् ।)

रक्तपित्त रोग को छोड़कर प्रायः सब वात एवं कफ के रोगों में शिशु को उष्ण जल का प्रयोग कराना चाहिये । शिशु, धात्री तथा गर्भिणी स्त्री को उष्ण जल का ही प्रयोग कराना चाहिये । किसी २ रोग में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल अधिक हितकर माना गया है । ऐसा सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है । रक्तपित्त रोग में उष्ण जल का निषेध किया गया है क्योंकि उष्णता से रक्तपित्त प्रकुपित हो जाता है ।।

अथान्तरिक्षं शरदि प्रशस्तं संतप्यमानं च रवेर्मयूखैः ।
पिबेत्सरो वाऽथ नदीं तडागं हेमन्तकाले शिशिरे च बालः ।।
वाप्यौद्भिदं प्रास्रवणं हि तोयं ग्रीष्मे प्रशस्तं कुसुमागमे च ।
वर्षासु कौपं सलिलं प्रशस्तमारोग्यहेतोरथ तप्तशीतलम् ।।

बालकों के लिये शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त (तपाया हुआ) हुआ आन्तरीक्ष जल (वर्षा जल) प्रशस्त माना गया है । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में सरोवर, नदी तथा तडाग (तालाब) का जल पीना चाहिये । ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में बाबड़ी, औद्भिद अथवा झरने का जल प्रयोग में लाना चाहिये । तथा वर्षा ऋतु में गरम करके ठण्डा किया हुआ कुंए का पानी आरोग्य के लिये हितकर होता है ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)

५५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

अथ मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशः ।

अथातो मांसगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम मांसगुणविशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में मांस के सामान्य तथा विशेष गुणों का वर्णन किया जायेगा ।।१-२।।

मांसं वृष्यं च बल्यं च मांसं प्राणविवर्धनम् । मांसं पुष्टिकं वृद्धकृशानां मांसवर्धनम् ।।३।।

**मांस के सामान्य गुण—**मांस वृष्य, बल्य तथा प्राणों की शक्ति को बढ़ाने वाला है। यह पुष्टिकारक है तथा वृद्ध एवं कृश व्यक्तियों के मांस को बढ़ाता है।

**वक्तव्य—**शरीर के मांस की वृद्धि करने में मांस सबसे बढ़कर माना गया है। 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर के मांस तथा खाद्य मांस में मांसत्व के सामान्य होने से यह शरीर के मांस की वृद्धि करता है ।।३।।

क्षयिणां क्षीणदेहानां मांसमेव परायणम् । न मांसतुल्यमन्यत्त्वारोग्यवीर्यविवर्धनम् ।।४।।

क्षय के रोगी तथा क्षीण देह वाले व्यक्तियों के लिये मांस ही श्रेष्ठ द्रव्य है। उनके आरोग्य तथा वीर्य की वृद्धि के लिये मांस के समान और कोई पदार्थ नहीं है ।।४।।

नराणां क्षीणशुक्राणां मांसं रेतोभिवर्धनम् । बन्ध्यानामपि नारीणां कुमाराणां तथैव च ।।५।।

जिन व्यक्तियों का शुक्र (वीर्य) क्षीण हो गया है उनमें मांस से वीर्य की वृद्धि होती है। तथा बन्ध्या स्त्रियों में एवं बालकों में भी यह शुक्र धातु की वृद्धि करता है ।।५।।

गर्भाधानकरं मांसमन्ते पुष्टिकं तथा । गर्भिणीनां च नारीणां वातप्रशमनं परम् ।।६।।

मांस गर्भाधान (गर्भस्थिति) कराने वाला है तथा अन्त में गर्भ की पुष्टि करता है। गर्भिणी स्त्रियों में मांस का सेवन करने से वायु की शान्ति होती है ।।६।।

स्त्रीणां प्रसवकाले तु मांस ............ मेव च । गर्भकाले च बालानां सरसं परमौषधम् ।।७।।

प्रसव के समय स्त्रियों में मांस (रस) ..... श्रेष्ठ माना गया है। गर्भ के समय (गर्भस्थित) बालकों के लिये रसयुक्त मांस (अर्थात् मांसरस) श्रेष्ठ ओषधि माना गया है ।।७।।

स्त्रीप्रियाणां तथा पुंसां नित्यव्यायामसेविनाम् ।
क्षीणानां यक्ष्मणां चैव ज्वरक्षीणाश्च ये नराः ।।८।।
वाताहतास्तु ये सत्त्वास्तेषां मांसरसो हितः ।

जिन व्यक्तियों को स्त्रियां प्रिय हैं (अर्थात् जो स्त्रियों का सहवास अथवा मैथुन अधिक करते हों), जो नित्य व्यायाम करते हों तथा जो क्षीण एवं क्षय के रोगी हैं, जो ज्वर के कारण क्षीण हुए हैं तथा जो वातरोग से पीडित हैं—ऐसे व्यक्तियों में मांसरस हितकर होता है ।।८।।

सुसंस्कृतो मांसरसो बिडजीरकहिङ्गुभिः ।।९।।
स्नेहे सिद्धश्च पयसा विशेषाद्वातिके स्मृतः ।

मांंसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५३

विडनमक, जीरा तथा हींग से अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ तथा दूध डालकर स्नेह के साथ सिद्ध किया हुआ मांस रस विशेषकर वातरोगों में हितकर माना गया है ॥९॥

वातपित्तोत्तरे पुंभिः शर्करामधुरीकृतः ।।१०।। स्निग्धो मांंसरसः पेयस्तथा रक्तामयार्दितैः ।

वात एवं पित्त के प्रकोप तथा रक्त रोगों से पीडित व्यक्तियों में शर्करा के द्वारा किया हुआ स्निग्ध मांंसरस पिलाना चाहिये ॥१०॥

क्षीण(र)सिद्धो मांंसरसो मधुरो लवणोऽपि वा ।।११।। बालानां क्षीणदेहानां गर्भकाले च शस्यते ।

दूध के द्वारा सिद्ध किया हुआ मधुर अथवा लवण मांंसरस क्षीण देह वाले बालकों के लिये तथा गर्भ के समय प्रशस्त होता है ॥११॥

हितं च बा(ब)लकामानां मांंसस्वरससाधितः (म) ।।

बल को चाहने वाले व्यक्तियों के लिये मांंसरस से सिद्ध किये हुए द्रव्य हितकर माने जाते हैं ॥१२॥

सुसिद्धं लवणे सिद्धं मांसं कटुकरोचनम् । कायाग्निदीपनं चैव रसा ....... पो हितः ।।१३।।

अच्छी प्रकार लवण के साथ सिद्ध तथा मरिच आदि कटु पदार्थों के द्वारा रुचिकारक बनाया हुआ मांस कायाग्नि को प्रदीप्त करता है ....... ॥१३॥

वेसवारः समधुरो लावणो वाऽपि रोचनः । पिष्टचूर्णितपक्वं ब्रा प्रकु ...... वापिवाग्न(?)तत् ।।१४।।

रुचिकारक मीठा या नमकीन वेसवार अथवा पिठ्ठी के चूर्ण से पकाया हुआ मांस हितकर होता है। जो मांस अस्थि रहित करके उबाल कर पुनः पत्थर पर पीस लिया जाय । .... उसमें फिर पिप्पली, मरिच, सोंठ, गुड तथा घृत मिलाकर पका लिया जाय उसे 'वेसवार' कहते हैं (सुश्रुत सू. अ. अ. ४६) ॥१४॥

शूल्यमङ्गारतप्तं च मांसं श्लेष्मामये हितम् । साम्लः(म्लं) सलवणश्चै(णं चै)व हितस्त (तं त)स्मात्तु जीवक ! ।।१५।।

लोहे की शलाका पर लेप करके अङ्गारों पर पकाया हुआ मांस श्लेष्म रोगों में हितकर होता है । इसलिये हे जीवक ! अम्ल एवं लवण युक्त करके इसका प्रयोग करना प्रशस्त माना गया है ॥१५॥

पिष्टं वा खण्डशो वाऽपि मांसं पुटकसाधितम् । सहिङ्गुसैन्धवबिडैर्मरिचाम्लसजीरकैः ।।१६।। साङ्कुरैर्धान्यकैश्चैव शृङ्गबेरार्द्रकैरपि । पलाशै भूस्तृणोपेतं मांसं सिद्धं प्रयोजयेत् ।।१७।।

मांस को पीसकर अथवा उसके टुकड़े २ करके हींग, सैन्धव, विडनमक, मरिच, अनार दाना, जीरा, अङ्कुरयुक्त गेहूँ, चने आदि धान्य तथा सोंठ, अदरक एवं भूस्तृण (गन्धतृण) आदि के द्वारा बर्तन में सिद्ध किया जाय । सिद्ध होने पर इसका प्रयोग करे ॥१६-१७॥

अथ मांंसरसं(सः) सर्पिः सिद्धं (द्धः)सक्षीरमि(रइ)ष्यते । रसपाकविशेषेण तद्वल्यं (स बल्यः) तद्व (स र) सायनम् (नः) ।।१८।।

घृत से सिद्ध किये हुए मांस रस में दूध मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार यह मांस-रस एवं पाक की विशेषता के कारण बल्य (Tonic) एवं रसायन (Alterative) माना गया है ॥१८॥

५५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

अतः परं तु मांसानां रसपाकविशेषणम्। वक्ष्ये गुणविशेषं च वृद्धजीवक ! तच्छृणु ।।१९।।

हे वृद्धजीवक ! अब मैं मांसों के रस एवं पाक की विशेषता तथा उनके विशेष गुणों का वर्णन करूंगा। इसे तुम सुनो ।।

कफपित्तकरं मांसं गवां वाते हितं गुरु। विदाहि बृंहणं चैव, खङ्गमांसं च तत्समम् ।।२०।।

गौ का मांस—गौ का मांस कफ तथा पित्तकारक, वातरोगों में हितकर, गुरु, विदाहि एवं बृंहण होता है। गैंडे का मांस—यह भी गौ के मांस के ही समान होता है ॥२०॥

न्यङ्कूनां विहितं वाते कफपित्तहरं लघु। सक्षारं दान्तिनं मांसं बृंहणं कटुतिक्तकम् ।।२१।।
वीर्येणोष्णं च तद्विद्यात् कफपित्तं करोति च।

शम्बर मृग (बारहसिंगे) का मांस—शम्बर मृग का मांस वातरोगों में हितकर है तथा यह कफ—पित्तहर एवं लघु है। हाथी का मांस-हाथी का मांस क्षारयुक्त, बृंहण, कटु एवं तिक्त होता है। यह वीर्य में उष्ण होता है तथा कफ और पित्त को बढ़ाता है ॥२१॥

गोकर्णमांसं तत्तुल्यं गवयस्थ रुरोरपि ।।२२।।

गोकर्ण (मृगभेद), गवय (गलकम्बल से शून्य गौ के समान पशु-नील गाय) तथा रुरु (मृगभेद) का मांस भी हाथी के मांस के समान ही होता है ॥२२॥

रसे पाके च मधुरं वातपित्तहरं गुरु। उष्णं चैव च्छागमांसमाविकं चापि तद्गुणम् ।।२३।।

अजा का मांस—अजा (बकरे) का मांस रस एवं विपाक में मधुर, वात पित्त नाशक, गुरु तथा उष्ण है। भेड़ का मांस—भेड़ के मांस-भेड़ के मांस के गुण बकरे के मांस के समान ही है ॥२३॥

वृष्यं तु मांस वाराहं मधुरं गुरु पच्यते। तद्गुणं माहिषं विद्धि, शौकरं स्यात्ततो गुरु ।।२४।।

सूअर का मांस—सूअर का मांस वृष्य, मधुर तथा गुरुपाकी होता है। भैंस का मांस—भैंस के मांस के वे ही गुण हैं जो सूअर के मांस के हैं। सूअर का मांस इससे गुरु होता है ।।

गर्दभस्य तथाऽश्वस्य मांसं यत् पृषतस्य च। कफघ्नं वातलं रूक्षं कटुतिक्ताह्वयं लघु ।।२५।।

गदहा, घोड़ा तथा पृषत (जिसके शरीर पर चित्र विचित्र बिन्दु होते हैं ऐसा चित्तल मृग) नामक हरिण का मांस-कफनाशक, वातकारक, रूक्ष, कटु, तिक्त एवं लघु होते हैं ।।

श्वदंष्ट्रो वृषदंष्ट्रश्च ऋष्यः शरभ एव च। वातघ्ना उष्णवीर्याश्च रसत: कटुकान्वया: ।।२६।।
गोलाङ्गूला वानराश्च तत्तुल्या मधुरोत्तराः ।

श्वदंष्ट्र (चार दांत वाला एक मृग), वृषदंष्ट्र (रान का बिलाव), ऋष्य (नीले अण्डकोश वाला रोहू मृग) तथा शरभ (महासिंह नामक काश्मीर देशीय हरिण विशेष—अष्टापद उष्ट्रप्रमाणो महाशृङ्गः पृष्ठगतचतुष्पादः काश्मीरे प्रसिद्ध) का मांस वातनाशक, उष्णवीर्य तथा रस में कटु होता है। गोलाङ्गूल (बन्दर की जाति) तथा वानरों का मांस-इन्हीं के समान है परन्तु इनमें कुछ मधुर रस की अधिकता होती है ॥२६॥

वृकर्क्षकोकजम्बूकाः सिंहा व्याघ्रतरक्षवः ।।२७।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५५

स्वाद्युमांसास्स्त्विमे वृष्या उष्णाः पित्तविवर्धनाः । कषायतिक्ता रसतो वातघ्नाः कटुपाकिनः ।। २८ ।।

वृक (भेडिया), ऋक्ष (रीछ), कोक (ईहामृग), जम्बूक (गीदड़), सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (व्याघ्रविशेष) का मांस स्वादु, वृष्य, उष्ण तथा पित्तवर्धक होता है। इनका रस कषाय एवं तिक्त होता है, ये वातनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु होता है ॥२७-२८॥

नकुलो मूषिकः श्वाविद्बभ्रुः शल्यक एव च । कषायमधुराः शीता वृष्या गोधाश्च तद्गुणाः ।। २९ ।।

नेवला, मूषिक (चूहा), श्वावित् (सेही), बभ्रु (नकुल भेद) तथा शल्यक—का मांस कषाय, मधुर, शीत एवं वृष्य होता है। गोधा (गोह) का मांस भी इन्हीं के समान होता है ॥

ये स्युः शशकुरङ्गाद्याः सृमरश्चमराश्च ये । लघवो ........ ष्णाः पित्तला नातिबृंहणाः ।। ३० ।।

शश (खरगोश), कुरंग (हरिण), सृमर (शृङ्ग त्यागी मृग), चमर (चंवर गाय) का मांस-लघु, ... उष्ण, पित्तकारक तथा थोड़े बृंहण होते हैं ॥३०॥

बार्हिणं मधुरोष्णं तु विषघ्नं गुरु बृंहणम् । तुल्यं कौक्कुटजं वन्यं, तत्तुल्यं ग्राम्यकौक्कुटम् ।। ३१ ।।

मोर का मांस—मधुर, उष्ण, विषनाशक, गुरु एवं बृंहण होता है। जंगली तथा ग्राम्य (पालतू) मुर्गे का मांस भी इन्हीं के समान है ॥३१॥

विष्किराः क्रौञ्चवर्तीका मयूरेण समाः स्मृताः ।
तस्माल्लघुस्तु वर्तीरो वर्तीका लघवो लघुः ।। ३२ ।।

विष्किर (पंजों से कुरेद कर चुगने वाले प्राणी—विकीर्य विष्किराश्चेति), क्रौञ्च तथा वर्तीक (बटेर) के मांसों के गुण मोर के मांस के समान होते हैं। वर्तीर (कपिञ्जल के समान पक्षी-घरघरा) उससे लघु होता है वर्तीक (बटेर) उससे भी लघु होता है ॥३२॥

तित्तिरिस्तु कटुः पाके सोष्णास्तु कफवातजित् । कपिञ्जलश्चकोरश्च उपचक्रश्च तत्समाः ।। ३३ ।।

तीतर (काला तीतर) का मांस—विपाक में कटु, उष्ण तथा कफ और वात को शान्त करने वाला है। कपिञ्जल (गोरा तीतर), चकोर तथा उपचक्र (हंस विशेष) के मांस इन्हीं के समान होते हैं ॥३३॥

लोहपृष्ठो रक्तपृष्ठो रक्ताक्षो जीवजीवकः । तथाऽन्ये हिमवज्जाता मधुरा वृष्यबृंहणाः ।। ३४ ।।
गुरवः शीतलाः पाके कषाया रसस्तथा ।

लोहपृष्ठ (कङ्कपक्षी), रक्तपृष्ठ, रक्ताक्ष (पारावत-कबूतर), जीवजीवक (प्लवजातीय चकोर भेद) तथा अन्य हिमालय में उत्पन्न होने वाले प्राणी-मधुर, वृष्य, बृंहण, गुरु, पाक में शीतल तथा रस में कषाय होते हैं ॥३४॥

खञ्जरीटो वपुक्कारः क्रकरो दीर्घपुंसकः ।। ३५ ।।
कोयष्टिकः कपोतश्च रक्तपादो वसन्तकः । भृङ्गराजोऽथ हारीतः कोकिलः शुकसारिकाः ।। ३६ ।।
एते चान्ये च प्रच्छदा (?) शीतमारुतकोपकाः । कषायमधुराः स्वादे कफघ्नाः कटुपाकिनः ।। ३७ ।।

खञ्जरीट (खञ्जन), वपुक्कार, केकड़ा, दीर्घपुंसक, कोयष्टिक (टिटिहरी या क्रौञ्च), कबूतर, रक्तपाद (तोता), वसन्तक, भृङ्गराज (पक्षिविशेष), हारीत (हरिताल पक्षी), कोयल, तोता तथा मैना—इन तथा अन्य भी प्रच्छद पक्षियों के मांस शीत तथा वायु को कुपित करनेवाले हैं। ये स्वाद में कषाय एवं मधुर हैं, कफनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु है ॥३५-३७॥

५५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गृध्रः काकः श्येनचाषौ भासोलूककुलिङ्गकाः । शशन्ता मूषिकाः क्रोडास्तथाऽन्ये मांसभोजनाः ।।
प्रसहास्ते तु मधुरा वातघ्नाः कटुपाकिनः । बृंहणाश्चोष्णवीर्याश्च सततं शोषिणां हिताः ।।३९।।

गृध्र, कौवा, श्येन (बाज), चाष, भास (गोकुलचारी गृध्रविशेष), उल्लू, कुलिङ्गक (चिड़िया), शशन्त, मूषिक, क्रोड-तथा अन्य जो भी प्रसहवर्ग के मांस भोजन करनेवाले हैं वे मधुर, वातनाशक, कटुपाकी, बृंहण तथा उष्णवीर्य हैं एवं शोषरोगियों के लिये निरन्तर सेवन करने से हितकर हैं। प्रसह—अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खानेवाले प्राणी 'प्रसह' कहलाते हैं ।।

प्लवा बका बलाकाश्च तीदार्यः कुररास्तथा । ........ रक्ताक्षा मल्लिकाक्षाः सवारटाः ।।४०।।
नदीमुखा मेघरावाः शराख्या जलकुक्कुटाः । समुद्रकाकाः कुहरा गोट्टुभा गण्डमालकाः ।।४१।।
कारण्डवाः सजीमूतास्तथाऽन्ये जलचारिणः । पाके च मधुरा वृष्या गुरवश्च ........ ।।४२।।
............................................ । ............................................ ।।४३।।

प्लव (पानी में तैरनेवाले जीव संघातंचारी पक्षी), बक (बगुला), बलाका (बकभेद), तीदार्य, कुरर, ..... रक्ताश्व, मल्लिकाक्ष (हंस विशेष), वारट (हंसी), नन्दीमुख, मेघराव (मेघनाद या चातक), शर, जलकुक्कुट (जल मुर्गा), समुद्र का, कुहर, गोट्टुभ, गण्डमालक, कारण्डव (सफेद हंस का भेद), जीमूत तथा अन्य जो भी जलचर पक्षी हैं उनका मांस पाक में मधुर, वृष्य एवं गुरु होता है ....... ।।४०-४३।।

हंसस्तु गुरुरत्यर्थं वृष्योऽथ कफपित्तलः । शरारिः पाकहंसश्च चक्रवाकस्तथैव च ।।४४।।
जालपादास्तथाऽन्ये च हंसतुल्या गुणैः स्मृताः ।

हंस का मांस अत्यन्त गुरु, वृष्य तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। शरारि (आटी), पाकहंस, चक्रवाक, जालपाद तथा अन्य पक्षी गुणों में हंस के समान माने गये हैं ।।४४।।

क्रौञ्चः कुलिङ्गो द्रविडः पद्मपुष्करसादकः ।।४५।।
वार्धीणसः सारसश्च सारङ्गो धामृण्यलिकः (?) ।
एते चान्ये चाम्बुचराः पक्षिणो गुरवः स्मृताः ।।४६।।
रसे पाके च मधुरा उष्णाः सलवणान्वयाः । वृष्या वातहराश्चैव कफपित्तविवर्धनाः ।।४७।।

क्रौञ्च, कुलिङ्ग, द्रविड, पद्मपुष्कर, सादक,, वार्धीणस (नीली ग्रीवा तथा लाल सिर वाला पक्षी विशेष), सारस, सारङ्ग (मृगभेद-चित्रमृग), धामृण्यलिक (?)—इत्यादि तथा अन्य भी जलक्षर पक्षी गुरु माने गये हैं। ये रस तथा विकाप में मधुर होते हैं और ये उष्ण, लवणरसयुक्त, वृष्य, वातनाशक एवं कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं ।।४५-४७।।

नलमीनो झषश्चैव पाठीनश्चर्मपीवरः । चेलीमः शकुलार्भ(द)श्च शिलीन्ध्रो गर्गरस्तथा ।।४८।।
पुष्करो गोकरो मूचो वारडः शूलपाटलः । कृष्णमत्स्यः श्वेतमत्स्यो गोमत्स्यो रोहितस्तथा ।।४९।।
शकली महाशकली चम्पः कुन्दोऽथ मद्गुरः ।
इल्यः शङ्कुश्चिरणो राजीवः शफरी तथा ।।५०।।
एते चान्ये च बहवो विविधा मत्स्यजातयः । रसे पाके च मधुरा वातघ्ना वृष्यबृंहणाः ।।५१।।
उष्णवीर्याश्च ते ज्ञेया गुरवः कफपित्तलाः । लघ्वाशायास्तेऽन्ये तु किञ्चित्तिक्तान्वयान्तराः ।।५२।।
रोहितो नलमीनश्च ........... लघवः स्मृताः ।

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५७

नलमीन (चिलिचिम मछली), झष (मत्स्यभेद), पाठीन, चर्सपीवर, चेलीम, शकुलार्भक, शिलीन्द्र, गर्गर, पुष्कर, गोकर, मूच, वारड, शूलपाटल, कृष्णमत्स्य, श्वेतमत्स्य, गोमत्स्य, रोहित, शकली, महाशकली, चम्प, कुन्द, मद्गुर, इल्य, शङ्क (शांकोच), चिचरण, राजीव, शफरी (प्रोष्ठी मत्स्य), इत्यादि तथा अन्य भी कई मछलियों की जातियां रस एवं पाक में मधुर, वातघ्न, वृष्य, बृंहण, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। इनमें लघु शरीर वाले तथा कुछ तिक्त रस वाले प्राणियों का ग्रहण करना चाहिये। रोहित एवं नलमीन ..... आदि लघु कहे गये हैं॥४८-५२॥

कूर्मो दुटिश्च नक्रश्च मकरोऽवकुशस्तथा ॥५३॥
तिमिः सहस्रदशनस्तथैव च तिमिङ्गिलः । इञ्चकः शुक्तिकः शङ्खोऽवलूको जलसूकरः ॥५४॥
शम्बूकश्चन्द्रिकः शृङ्गी कर्कटः शकुटीपयः । एते चान्ये च जलजा मधुरा रसपाकयोः ॥५५॥
गुरवश्चोष्णवीर्याश्च गुरवः कफपित्तलाः ।।

कूर्म (कछुआ), दुटि, नक्र (नाका), मकर (मगरमच्छ), अवकुश, तिमि, सहस्रदशन, तिमिङ्गिल, इञ्चक, शुक्तिक (सीप), शङ्ख, अवलूक, जलशूकर, शम्बूक (घोंघा), चन्द्रिक, शृङ्गी, कर्कट (केंकड़ा), शकुटीपय आदि तथा अन्य जलचर प्राणी रस तथा पाक में मधुर, गुरु, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक होते हैं ॥५३-५५॥

आनूपे तूत्तमश्छागः, श्रेष्ठो मत्स्येषु रोहितः ॥५६॥
जलजे शुक्तिकूर्मौ च, वारटोऽप्यथ पक्षिषु । एणो मृगेषु प्रवरः, प्रतुदेषु शुको वरः ॥५७॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)

विषयेषु ...... ग्न्यो लावः खगेषु तु ।
तित्तिरो विष्किरेष्वग्न्यः, काकोऽग्न्यः प्रसहेषु तु ॥५८॥

आनूप (जलयुक्त प्रदेश में रहने वाले) प्राणियों में बकरा सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मछलियों में रोहित मछली सबसे श्रेष्ठ होती है (रोहितो मत्स्यानां-चरक सू. अ. २५), जलज प्राणियों में शुक्ति और कूर्म (कछुआ), पक्षियों में वारट, मृगों में एण हरिण (ऐणेयं मृगमांसानां-चरक सू. अ. २५), प्रतुद (नोक से कुरेदकर चुगनेवाले) पक्षियों में तोता, विषयों में ........., पक्षियों में लाव (लावः पक्षिणां चरक सू. अ. २५), विष्किर (पंजों से कुरेदकर चुगने वाले) प्राणियों में तीतर, प्रसह (अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले) प्राणियों में कौवा श्रेष्ठ माना गया है ॥५६-५८॥

लघूक्तं रुधिरं मांसाद् गुरु मेदश्च चर्म च । मज्जावसे गुरुतरे तेभ्यो गुरु शिरः स्मृतम् ॥५९॥

मांस की अपेक्षा रक्त लघु कहा गया है तथा मेद और चर्म (त्वचा) गुरु और मज्जा तथा वसा इनसे गुरु तथा सिर इनसे भी गुरु माना गया है ॥५९॥

लघुः स्कन्धो हि शिरसस्तस्मात् पार्श्वं लघु स्मृतम् ।
पार्श्वात् सक्थि लघु प्रोक्तं पादमांसं गुरु स्मृतम् ॥६०॥

सिर की अपेक्षा कन्धा लघु होता है, कन्धों से पार्श्वभाग तथा पार्श्व से सक्थि लघु होती है तथा पैरों का मांस गुरु होता है ॥६०॥

वसा मेदश्च मज्जा च वातपित्तहिताः स्मृताः । रसे पाके च मधुराः स्नेहाच्छ्लेष्मप्रकोपनाः ॥६१॥
रक्तं रक्तप्रशमनं मांसं मांसविवर्धनम् ।

वसा मेद तथा मज्जा—वात एवं पित्त के लिये हितकर होते हैं। ये रस तथा पाक में मधुर होते हैं, स्नेहयुक्त होते हैं तथा श्लेष्मा को प्रकुपित करते हैं। रक्त रक्त को निर्मल करने वाला है तथा मांस मांस की वृद्धि करता है ॥६१॥

५५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गुरवः प्राणिनो बाला, युवानो वृष्यबृंहणाः ।।६२।।
वृद्धास्तु वातला रूक्षाः, पुंभ्यस्तु लघवः स्त्रियः ।
मृगाल्लघुतरः पक्षी, पक्षिभ्योऽम्बुचरो गुरुः ।।६३।।

बाल (छोटे) प्राणी गुरु माने गये हैं, युवा प्राणी वृष्य तथा बृंहण होते हैं तथा वृद्धप्राणी वातकारक एवं रूक्ष होते हैं। पुरुषों (Males) की अपेक्षा स्त्रियां (Females) लघु होती हैं। मृगों (पशुओं) की अपेक्षा पक्षी लघु होते हैं तथा पक्षियों से जलचर प्राणी गुरु होते हैं ॥६२-६३॥

महाशरीराश्चल्पकाया लघवो जीवक ! स्मृताः । विज्ञेयाश्चाल्पभुग्भ्योऽपि गुरवो बहुभोजनाः ।।६४।।

हे जीवक ! (नकुल मूषिक आदि) अल्प शरीरवाले प्राणियों में बड़े और मोटे प्राणियों का मांस लघु होता है । अल्पभुक् (थोड़ा खानेवाले) प्राणियों में अधिक भोजन करनेवाले प्राणी गुरु होते हैं ॥६४॥

लघवोऽल्पभूमिचरा, अलसेभ्यो विदूरगाः । लघुदेशचरा अल्पा लघवो लघुभोजनाः ।।६५।।

अल्पभूमिचर (थोड़ा चरने वाले) प्राणी लघु होते हैं । आलसी प्राणियों में बहुत दूर तक जाकर चरने वाले प्राणी लघु होते हैं तथा लघु देश में चरने वाले, अल्प शरीर वाले एवं लघु भोजन करने वाले प्राणी भी लघु होते हैं ॥६५॥

गुरुदेशचराः स्थूला गुरवो गुरुभोजनाः । पाशबद्धं गुरु मांसं रूक्षं क्षुद्व्याधिभिर्हतम् ।।६६।।

गुरु (भारी) देश (स्थान) में विचरने वाले, स्थूल तथा गुरु भोजन करने वाले प्राणी गुरु होते हैं। जाल में पकड़े हुए प्राणियों का मांस गुरु होता है। क्षुधा (भूख) एवं रोग से मरे हुए प्राणी का मांस रूक्ष होता है ॥६६॥

श्वभिर्हतं पीतरक्तं नातिबृंहणमुच्यते । विषैर्हतमभक्ष्यं स्याच्छुष्कं नातिगुणावहम् ।।६७।।

कुत्तों द्वारा मारे हुए तथा जिसका रक्तपान कर लिया गया है ऐसे प्राणियों का मांस अधिक बृंहण नहीं होता है। विष द्वारा मारे हुए प्राणियों का मांस अभक्ष्य होता है। वह शुष्क तथा गुणहीन होता है ॥६७॥

सद्योऽपरिक्लिष्टहतं मांसं धातुं विवर्धयेत् । पूतिमांसं गुर्वसारं तदवृष्यमबृंहणम् ।।६८।।

ताजा मारा हुआ तथा अदूषित मांस-मांस तथा धातु की वृद्धि करता है। जो मांस सड़ा हुआ, गुरु एवं साररहित हो वह अवृष्य तथा अबृंहण होता है ।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. २५ तथा सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अत्यन्त विस्तारपूर्वक देश, काल, अवस्था, लिङ्ग, जाति तथा अङ्गों के भेद से मांस के गुणों का वर्णन किया गया है ॥६८॥

एवं मांसविशेषज्ञः कल्पयेद्भोजने सदा । बालानां गुर्विणीनां वा बालपुत्रासु वा भिषक् ।।६९।।
दुष्प्रजातासु वा स्त्रीषु बाले वा कृशिते सदा । प्रयुञ्जन् सिद्धिमप्नोति तत्त्वविद् वृद्धजीवक ! ।।७०।।

इस प्रकार मांस के गुणों को जानने वाले व्यक्तियों को भोजन में सदा मांस की कल्पना करनी चाहिये । हे वृद्धजीवक ! जो तत्त्ववेत्ता मनुष्य बालक, गर्भिणी, छोटी लड़की, दुष्प्रजाता स्त्री तथा कृश बालकों में इस प्रकार कल्पनानुसार मांस का प्रयोग करता है वह सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है ॥६९-७०॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)

देशसात्म्याध्यायः २५] खिलस्थानम् ५५९

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)


अथ देशसात्म्याध्यायः पञ्चविंशः ।

अथातो देशसात्म्याध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम देशसात्म्याध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में किस २ देश में कौन २ सा आहार-विहार सात्म्य होता है—इसका वर्णन किया जायगा। यह अध्याय भी अपूर्ण ही मिलता है। इसमें कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर पहले पूर्व दिशा के देश तथा सात्म्य आहार विहार का वर्णन किया है। उससे आगे दक्षिण दिशा के देश में केवल नामों का ही उल्लेख मिलता है। उससे आगे अध्याय खण्डित हो गया है। उस खण्डित अंश में संभवतः दक्षिण देशों का सात्म्य आहार-विहार तथा पश्चिम एवं उत्तर देशों के नामपूर्वक सात्म्य आहार-विहार आदि का वर्णन किया गया होगा ॥१-२॥

कश्यपाख्यमृषिश्रेष्ठं पृष्टवान् ...... रोचतः । देशसात्म्यमजानन्तः कथं कुर्युश्चिकित्सितम् ॥३॥
कस्य देशस्य मध्ये तु कुरुक्षेत्रं प्रतिष्ठितम् ।

कश्यप नाम वाले श्रेष्ठ ऋषि से जीवन ने प्रश्न किया-देश सात्म्य को जाने बिना हम किस प्रकार चिकित्सा कर सकते हैं तथा कुरुक्षेत्र किस देश के मध्य में स्थित है ॥३॥

इत्येवमुक्तो भगवान् काशिराजो महामुनिः ॥४॥
इदमुत्तरमक्लिष्टं व्याख्यातुमुपचक्रमे । कुरुक्षेत्रं मध्यदेशश्चाद्योजनानां शतं परम् ॥५॥
समस्तान् षड्रसान् प्रायो भुञ्जते मध्यदेशजाः । भक्ष्यभोज्यान्नवीरास्ते तु भुञ्जन्तो वाऽसकृत्तथा ॥६॥

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महामुनि भगवान् काशीराज ने सरल ढंग से उत्तर देना प्रारंभ किया-देश के मध्यभाग में सौ योजन विस्तार वाला कुरुक्षेत्र प्रदेश है। मध्य देश के निवासी प्रायः सम्पूर्ण छहों रसों (रसों से युक्त आहार) का सेवन करते हैं। वे भक्ष्य, भोज्य एवं अन्न (खान पान) में अत्यन्त वीर होते हैं तथा वे अनेक बार भोजन करते हैं। अर्थात् वे खूब खाने पीने वाले होते हैं ॥४-६॥

पूर्वदिशस्तु विज्ञेयो मधुरः शीतलो गुरुः । कुमारवर्तनीमा(चा)दौ कटीवर्षस्तथैव च ॥७॥
मगधासु महाराष्ट्रऋषभद्वीपमेव च । पौण्ड्रवर्धनकं चापि मृत्तिकावर्धमानकम् ॥८॥
कर्वटं च समातङ्गं ताम्र(प्र)लिप्तं सचीरकम् । प्रियङ्गुमथ कौशल्यं कलिङ्गपृष्ठपूरकम् ॥९॥

पूर्व दिशा के देश मधुर, शीतल तथा गुरु माने गये हैं। वे देश निम्न हैं—सबसे पहले कुमारवर्तनी, फिर कटीवर्ष, मगध में महाराष्ट्र, ऋषभ द्वीप, पौण्ड्रवर्द्धनक, मृत्तिकावर्धमानक, कर्वट, मातङ्ग, ताम्रलिप्त, चीर (चीन), प्रियङ्गु, कौशल्य, कलिङ्ग तथा पृष्ठपूरक ॥७-९॥

एषु प्लीहविनो मर्त्या गलगण्डिकमे(न ए)व च । गुडशाल्योदनप्राया मत्स्यभोजनसेविनः ॥१०॥
प्रायशो मधुराहारा वातश्लेष्मात्मका नराः ।

५६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

इन देशों के लोग प्लीहा एवं गलगण्ड से युक्त होते हैं अर्थात् उनमें प्लीहारोग (Enlargement of Spleen आदि) तथा गलगण्ड (Goitre) रोग अधिक होते हैं। ये प्रायः गुड तथा शालिचावल और मछली का भोजन करते हैं। इनका आहार प्रायः मधुर होता है तथा यहां के लोग वात एवं श्लेष्म प्रकृति के होते हैं ॥१०॥

तेषां कटुकतिक्तं च रूक्षमुष्णं च भोजनम् ।।११।।
यच्चान्यदपि श्लेष्मघ्नं तेषां तत्तत् प्रयोजयेत् ।

इन व्यक्तियों को कटु, तिक्त, रूक्ष एवं उष्ण भोजन कराना चाहिये तथा अन्य जो भी श्लेष्मनाशक आहार-विहार है—उसका सेवन कराना चाहिये ॥११॥

कञ्चीपदा नवध्वाना कावीरास्तुल्ययोरपि ।।१२।।
वानसी कुमुदाराज्यं चिरिपालिस्तथैव च। चीरराज्यञ्च चोराणां पुलिन्द(न्दं)द्रविडेषु च ।।१३।।
करघाटशनानां च विवे(दे)हा मण्डपेषु च। कान्तारं च वराहं च घटास्वाभीरमेव च ।।१४।।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य देशा वि ........ ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६४ तमं पत्रम्)

दक्षिण दिशा का आश्रय करके निम्न देश हैं—कञ्चीपद, नवध्वान, कावीर, वानसी, कुमुदाराज्य, चिरिपालि, चोरों का चीरराज्य, द्रविड में पुलिन्द, शनों में करघाट, मण्डपों में विदेह, कान्तार, वाराह तथा घटाओं में आभीर देश हैं।....
(वक्तव्य—इन देशों का यथासंभव परिचय उपोद्धात में दिया गया है। पाठक इन्हें वहीं देखें) ॥१२-१४॥

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खिलस्था¹नस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।
खिलस्थान का इतना ही भाग उपलब्ध होता है।

काश्यपसंहिता वृद्धजीवकीयतन्त्रं च एतावत्येवोपलब्धभागे विश्राम्यति ।


१. खिलान्यशीतिरध्याया इति पूर्वोद्देशानुसारेणाऽस्मादपूर्णपञ्चविंशाध्यायादुत्तरं पञ्चपञ्चाशदध्याया अवशिष्यन्ते, तेनाऽर्धग्राम इवायमकाण्डे विच्छिन्नो ग्रन्थः पूर्त्तये पुनरनुकूलदैवं समीहते। उक्तं चाभियुक्तैः—
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ इत्यलम्।

काश्यपसंहिताया विषयानुक्रमणिका

सूत्रस्थानम् ।

विषयपृ.^१पं.विषयपृ.पं.
लेहाध्यायः ।शुद्धक्षीरस्य लक्षणम्१२
लेहनविषये जीवकस्य प्रश्नाःअशुद्धक्षीरसेवनदोषास्तेषां शान्तिश्च१३
कश्यपस्योत्तरम्वज्रस्य (स्तनकीलकस्य) संज्ञाहेतुसंप्राप्ति-लक्षणानि१३
गर्भिण्या रसधातोस्त्रिधा विभागःवज्रस्य चिकित्सा१४
देहिनां प्रकृत्यभिनिर्वृत्तौ हेतुःनार्याः स्तनोपरि दुष्टदृष्टिपातस्तच्चिकित्सा च१५
देहप्रकृतेर्भेदाःदन्तजन्मिकाध्यायः २० ।
देहप्रकृत्याश्रिता भेषजकल्पनादन्तजन्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः१५
वयोभेदेन बालेषु भेषजमात्रानिर्देशःकश्यपस्योत्तरम्१६
लेहनायोग्या बालाःदन्तानां भेदाः, संज्ञाः, उत्पत्तिकालश्च१६
बालानां सात्म्यान्येवान्नपानान्युपयोज्यानिकुमारीणां कुमाराणां च दन्तजन्मनि विशेषः१७
लेहनविधिःदन्तानां निषेकोद्भेदादौ हेतुः१७
बालानां सुवर्णप्राशनगुणाःदन्तानां निषेककालः१८
बालानां मेधाजनना लेहाःअप्रशस्तं दन्तजन्म, तच्छान्तिश्च१८
बालानां लेहनार्थम् अभयं घृतम्चतुर्विधं दन्तजन्म१८
बालानां लेहनार्थम् संवर्धनं घृतम्सामुद्रसंवृतविवृतानां दोषाः१८
बालानां लेहनार्थम् ब्राह्मयाद्यं घृतम्मासविशेषेण दन्तनिषेकस्य दोषा गुणाश्च१८
क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ।दन्तसंपत्१८१०
स्कन्दादिग्रहदूषितधात्रीदुग्धलक्षणम्अप्रशस्ता दन्ताः१८१२
रसवर्णाभ्यां धात्र्याः क्षीरपरीक्षाचूड़ाकरणीयाध्यायः २१ ।
दुष्टक्षीरस्य संशोधनम्कर्णपालीवर्धनोपायाः२१
क्षीरवर्धनम्१०अभिषजः कर्णवेधननिषेधः२१
क्षीरविशोधनो गणः१०स्नेहाध्यायः २२ ।
क्षीरशोधनकालिक आहारः११स्नेहस्य योनिर्विकल्पाश्च२३
क्षीरसंशोधनकाले वर्जनीयानि११स्थावरस्नेहाः२३
क्षीर-प्रजनन-वर्धनानि११

१. अत्र सर्वत्र पङ्क्तिसंख्यागणनायां केवलं संस्कृतमूलश्लोकगद्यस्थितपङ्क्तीनामेव ग्रहणम् ।

५६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
औद्भिदाः स्नेहाः२३जीर्णस्नेहलक्षणम्३३
घृततैलवसामज्ज्ञां पूर्वपूर्वस्य श्रेष्ठत्वम्२३स्नेहावपीडगुणाः३३
घृतगुणाः२४स्नेहापचारजा रोगाः, तच्चिकित्सा च३३
तैलगुणाः२४स्नेहव्यापद्धेतुस्तच्चिकित्सा च३४
मज्जावसोर्गुणाः२४स्नेहविचारणायोग्या नराः३४
तिलतैलघृतप्रयोगप्रशंसा२४प्रमेहादिषु स्नेहने विशेषविधिः३४
ऋतुविशेषेण स्नेहविशेषोपयोगः२५स्नेहनस्वेदनविशोधनक्रमः३५
स्नेहविशेषेणानुपानविशेषः२५स्वेदाध्यायः २३ ।
उष्णोदकानुपानगुणाः२५स्वेदविषये जीवकस्य प्रश्नाः३५
उष्णोदकनिर्माणविधिः२५कश्यपस्योत्तरम्३५
उष्णोदकानुपानं येषां निषिद्धम्२५स्वेद्या नराः३५१०
ओदनादिभिः स्नेहप्रयोगविधानम्२६दोषविशेषेण स्वेदविशेषः३५११
प्रकृतिविशेषेण स्नेहप्रयोगकालः, ततोऽन्यथा प्रयोगे दोषाश्च२६शरीरावयवविशेषे स्वेदविशेषः३६
स्नेहाच्छपाने त्रिविधा मात्रा, तद्योग्या नराश्च२७स्वेदनसमये नेत्रादिसंरक्षणविधिः३६
त्रिविधस्नेहमात्राणां गुणाः२८स्वेदनिर्वर्तनकालः३७
घृतपानयोग्या नराः२८अतिस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७
तैलपानयोग्याः नराः२८मन्दस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७
वसापानयोग्याः नराः२९सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम्३८
मज्जपानयोग्याः नराः२९अस्वेद्या नराः३८
स्नेह्याः नराः२९स्वेद्या नराः३८
अस्नेह्याः नराः३०स्वेदस्यादौ भेदाः३९
अस्नेह्यानामच्छस्नेहपानाद्दोषाः३०हस्तस्वेदविधिः३९
अस्निग्धस्य लक्षणम्३०अवहितेन बालेषु स्वेदो योज्यः४०
स्निग्धस्य लक्षणम्३०प्रदेहस्वेदविधिः४०
अतिस्निग्धस्य लक्षणम्३०नाडीस्वेदविधिः४१
स्नेहपानात् पूर्वदिने कर्तव्यम्३१प्रस्तरस्वेदविधिः४१
स्नेहपीतस्य विहारः३१सङ्करस्वेदविधिः४२
कोष्ठभेदेन स्नेहनकालः३१उपनाहस्वेदविधिः४२
मृदुकोष्ठस्य लक्षणम्३१उपकल्पनीयाध्यायः २४ ।
अजीर्णस्नेहलक्षणम्३२सम्यक्शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः४३
स्नेहजीर्णाजीर्णविशङ्कायां चिकित्सा३२अन्नसंसर्जनक्रमव्यभिचारजा रोगाः४५
तैलादीनामजीर्णे विशेषलक्षणानि३२शुद्धस्य शीतपानान्नादिसेवनजा रोगाः४६
स्नेहाजीर्णे चिकित्सा३३सम्यग्जीर्णान्निलक्षणम्४६

विषयानुक्रमणिका

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
अजीर्णत्रिलक्षणम्४६विषूचिकाया लक्षणानि५१
अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः४७अलसकस्य लक्षणानि५१
आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि४७नेत्रामयानां लक्षणानि५२
कण्ड्वाः लक्षणानि५२
अजीर्णानां सामान्यलक्षणम्४७आमस्य पूर्वरूपाणि५२
अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः४७पाण्डुरोगस्य लक्षणानि५२
अजीर्णानां चिकित्सा४७कामलायाः लक्षणानि५२
सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः४८मदात्ययस्य लक्षणानि५२
वेदनाध्यायः २५ ।उरोघातस्य लक्षणानि५३
अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः४८जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि५३
ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि५३
कश्यपस्योत्तरम्४९बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि५३१३
शिरोरुजाया लक्षणम्४९बालरोगाणामुपक्रमाः५४
कर्णवेदनायाः लक्षणम्४९चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ ।
मुखामयस्य लक्षणम्४९चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः५४
कण्ठवेदनायाः लक्षणम्४९भिषजो गुणाः५५
अधिजिह्विकायाः लक्षणम्४९भेषजसंपत्५५
गलग्रहस्य लक्षणम्४९आतुरसंपत्५६
कण्ठश्वयथोः लक्षणम्४९परिचारकसंपत्५६
ज्वरपूर्वरूपाणि४९चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम्५७
अतिसारस्य पूर्वरूपाणि५०रोगाध्यायः २७ ।
शूलिनो बालस्य लक्षणानि५०रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि५८
छर्देः पूर्वरूपाणि५०रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः५८
श्वासस्य पूर्वरूपाणि५०रोगाणां अधिष्ठानद्वयम्५८१०
हिक्कायाः पूर्वरूपाणि५०व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम्५८११
तृष्णायाः पूर्वरूपाणि५०रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः५९
आनाहस्य पूर्वरूपाणि५०वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि५९
अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि५०निजागन्तुरोगयोर्विशेषः६०
उन्मादस्य रूपाणि५०ओजसः स्वरूपम्६०
मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि५०ओजसो वर्धनानि६१
प्रमेहस्य रूपाणि५१वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम्६१
अर्शसां रूपाणि५१आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम्६१
अश्मर्याः रूपाणि५१अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः६१
विसर्पस्य पूर्वरूपाणि५१वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६३

५६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
चत्वारिंशत्पित्तविकाराणां नामतो निर्देशः६३शुभाशुभानि स्फिगलक्षणानि६९१६
पित्तस्य स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६४शुभाशुभानि कुकुन्दरलक्षणानि६९१८
कफजविंशतिविकाराणां नामतो निर्देशः६५शुभाशुभानि जघनलक्षणानि६९१९
श्लेष्मणः स्वरूपं, कर्माणि, उपक्रमाश्च६५शुभाशुभानि वृषणलक्षणानि६९२०
वातपित्तश्लेष्मणां विशिष्टोपक्रमाः६६शुभाशुभानि प्रजननलक्षणानि६९२३
एकविधा व्याधयः६६शुभाशुभानि मूत्रलक्षणानि६९२४
द्विविधाः६६शुभाशुभानि योनिलक्षणानि७०
त्रिविधाः६६शुभाशुभानि रोमराजिलक्षणानि७०
चतुर्विधाः व्याधयः६६शुभाशुभानि कुक्षिलक्षणानि७०
पञ्चविधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि उदरलक्षणानि७०
षड्विधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि नाभिलक्षणानि७०११
सप्तविधाः व्याधयः६६११शुभाशुभानि पायुलक्षणानि७०१३
अष्टविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पार्श्वलक्षणानि७०१३
दशविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पृष्ठलक्षणानि७०१४
विंशतिविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि अंसलक्षणानि७०१५
उपद्रवलक्षणम्६७शुभाशुभानि कक्षालक्षणानि७०१७
उपद्रवचिकित्साविचारः६७शुभाशुभानि बाहुलक्षणानि७०१८
रक्तजविकाराणां हेतुः६७शुभाशुभानि मणिबन्धलक्षणानि७०२०
रक्तजा रोगाः६८शुभाशुभानि यवपंक्तिलक्षणानि७०२१
रक्तजानां रोगाणां चिकित्सा६८शुभाशुभानि केशभूमिलक्षणानि७०२४
बालोपक्रमे विशेषः६८शुभाशुभानि गतिलक्षणानि७०२६
लक्षणाध्यायः २८ ।अप्रशस्तानि शरीराणि७०२७
बालानां शुभाशुभदेहलक्ष्णविषये जीवकस्य प्रश्नाः६९बालानां प्रशस्तानि रुषितादीनि७०२८
कश्यपस्योत्तरम्६९वक्त्रचक्षुःस्वररूपैर्वृत्तमनःसारगुणानां परीक्षा७४
शुभाशुभानि नखलक्षणानि६९सत्त्वानां भेदाः७४
शुभाशुभानि पादलक्षणानि६९ब्राह्मसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि अङ्गुलीलक्षणानि६९११प्राजापत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि पार्ष्णिलक्षणानि६९१२आर्षसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि उत्तरपादलक्षणानि६९१३ऐन्द्रसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि गुल्फलक्षणानि६९१३याम्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि जङ्घालक्षणानि६९१४वारुणसत्त्वस्य लक्षणम्७५
शुभाशुभानि जानुलक्षणानि६९१५कौबेरसत्त्वस्य लक्षणम्७६
शुभाशुभानि ऊरुलक्षणानि६९१६गान्धर्वसत्त्वस्य लक्षणम्७६
शुद्धसत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७६

विषयानुक्रमणिका
५६५

विषयपृ.पं.
आसुरसत्त्वस्य लक्षणम्७६
राक्षससत्त्वस्य लक्षणम्७७
पैशाचसत्त्वस्य लक्षणम्७७
सार्पसत्त्वस्य लक्षणम्७७
याक्षसत्त्वस्य लक्षणम्७७
भूतसत्त्वस्य लक्षणम्७७
शाकुनसत्त्वस्य लक्षणम्७७
राजससत्त्वस्य सामान्यलक्षण्७८
पाशवसत्त्वस्य लक्षणम्७८
मात्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८
वानस्पत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८
तामससत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७८
सत्त्वरजस्तमसां लक्षणानि७८
सत्त्वानुरूपं देहिनामाचरणं तत्फलं च७९
समानसत्त्वाया धात्र्याः प्रशस्तत्वम्७९
नवविधसाराणां नामतो निर्देशः७९
त्वक्सारबालस्य लक्षणम्७९
रक्तसारबालस्य लक्षणम्७९

विमानस्थानम् ३ ।

कर्णायजयावळीवनं(?)विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
अवेक्षितगदानां चिकित्सा८३

शिष्योपक्रमणीयं विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
शिष्योपनयनयोग्यः कालः८३
शिष्योपनयनविधिः८३
शिष्यगुणाः८५
गुरोर्गुणाः८५
शिष्यानुशासनम्८६
अध्ययनविधिः८७
अनध्ययनकालाः८७
अधीतायुर्वेदस्य कर्तव्यानि८७
तद्विद्यसंभाषाविधिः८८
आयुर्वेदविषये पञ्चदश प्रश्नाः८९
आयुषो लक्षणम्८९
आयुर्वेदशब्दस्य निरुक्तिः८९
आयुर्वेदस्याष्टावङ्गानि८९
आयुर्वेदस्योत्पत्तिः८९१०
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैः किमर्थमायुर्वेदोऽध्येयः८९१३
कौमारभृत्यतन्त्रस्याष्टस्वङ्गेष्वाद्यत्वम्८९१८
आयुर्वेदस्य पञ्चमवेदत्वप्रतिपादनम्९०
आयुर्वेदस्य नित्यत्वप्रतिपादनम्९०
आयुर्वेदस्य वातपित्तकफाश्रयत्वप्रतिपादनम्९०
वातपित्तश्लेष्मप्रकृतीनां लक्षणानि९०१०

शारीरस्थानम् ४ ।

विषयपृ.पं.
ऋतुविभागः९५
युगविभागेन कालविभागः९५
*सृष्ट्युत्पत्तिक्रमः९७
अष्टौ प्रकृतयः९७
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि९७
पञ्च कर्मेन्द्रियाणि९७
पञ्च इन्द्रियार्थाः९७
मनसोऽतीन्द्रियत्वम्९७
क्षेत्रक्षेत्रज्ञनिरूपणम्९७
आत्मनो लिङ्गानि९७
मनसो लक्षणम्९७
पञ्चमहाभूतानि९७
महाभूतानां गुणाः९७
नव द्रव्याणि९७
गुणानां द्रव्याश्रितत्वम्९७
खादीनां विशिष्टा गुणाः९७१०
इन्द्रियाणां विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तित्वम्९७१०
सर्वेन्द्रियाणां स्पर्शनलक्षणत्वम्९७११

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ?

विषयपृ.पं.
गर्भाभिवृद्धिक्रमः, चतुर्थादिमासेषु गर्भिण्या लिङ्गानि च१०२

गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ।

विषयपृ.पं.
जीवस्य गर्भेऽवक्रमणम्१०५

५६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.
गर्भस्य शरीरावयवाभिनिर्वृत्तिविषये जीवकस्य प्रश्नाः१०५
कश्यपस्योत्तरम्१०५
गर्भस्याकाशादिमहाभूतजाः शरीरावयवाः१०५
गर्भस्य मातृजाः१०५१३
गर्भस्य पितृजाः१०५१४
गर्भस्य आत्मजाः शारीरभावाः१०५१५
गर्भस्य सात्म्यजाः शारीरभावाः१०५१७
गर्भस्य रसजाः शारीरभावाः१०५१८
सत्त्वस्यौपपादुकत्वकथनम्१०५१९
हृदययकृत्प्लीहफुप्फुसनिरूपणम्१०७
गर्भाशय-गुद-बस्तीनां निरूपणम्१०७
अष्टावाशयाः गर्भस्य मातृजाः पितृणाश्च धातवः१०८
देहस्य षट्कोशवत्त्वम्१०८
शरीरविचयशारीराध्यायः ? ।
अवयवविभागेनास्थां गणना१०८
दश प्राणायतनानि१११
त्रीणि महामर्माणि१११
कोष्ठाङ्गानि११२
प्रत्यङ्गानि११२
द्विविधानि स्रोतांसि११३
दश मातृसिराः११३
देहस्वरूपम्११४
धमन्यः११४
रोमकूपानि११४
रोमकूपेभ्यः स्वेदप्रवृत्तिः११४
अञ्जलिप्रमेयाः शरीरधातवः११४१०
शुक्रप्रवृत्तिकालः११५
महाभूतानामन्योऽन्याश्रयत्वम्११५
देहावयवसौक्ष्म्यस्य सुदुर्वाचत्वम्११६
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ।
स्वभावस्य मनुष्याद्याकृतिभेदनिर्वर्तकत्वम्११६
शरीराभिनिर्वृत्तौ वायुपरमाणूनां कार्यम्११६
स्वभावतः प्रजानिर्वृत्तौ स्त्रीपुंसयोरुपचार११६
शुक्रशोणितयोरभिव्यक्तेः कालावेक्षितवम्११७
कदा शुक्रशोणिते पूर्णे भवतः११७
ऋतुकालः११७
पुत्रकामः कन्यार्थी च कदा स्त्रियमुपेयात्११८
गर्भाधानविधिः११९
पुत्रीया इष्टिः११९
आहारस्य धातुपोषकत्वम्१२१
धातूनां धातुपोषकत्वम्१२१
धातूनां तत्समगुणैस्तत्पोषणम्१२१
गर्भिण्यै हितानि१२३
गर्भिण्या हितं वेश्म१२३
गर्भिण्या हिता चर्या१२३
आसन्नप्रसवाया लक्षणानि१२३११
तत्र कर्तव्यानि१२४
शीघ्रप्रसवकरा योगाः१२६
प्रसवसमये कर्तव्यम्१२६
इन्द्रियस्थानम् ५ ।
ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १२ ।
ओषधभेषजयोर्विशेषः१३०
औषधभेषजयोर्गुणालाभेऽचिकित्स्यत्वं१३०
मासान्तिकं रिष्टम्१३१
मासार्धिकं१३१
स्कन्दादिग्रहाबाधसूचकानि स्वप्नानि१३१
अफलाः स्वप्नाः१३३
फलवन्तः स्वप्नाः१३४
दुःस्वप्नफलम्१३४
शुभं स्वप्नदर्शनम्१३४
दुःस्वप्नशान्तिः१३५
चिकित्सास्थानम् ६ ।
ज्वरचिकित्साध्यायः ? ।
ज्वरनिदानचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः१३७

विषयानुक्रमणिका

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? ।वातोत्तरे प्लीहरोगे कतिपययोगाः१५६
परिकर्तिकाहरा योगाः१४१उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? ।
प्रवाहिकाहरा योगाः१४१आनानोदावर्त्तयोर्निदानपूर्विका संप्राप्तिः१५८
कामलाहरा योगाः१४११०उदावर्त्तभेदाः१५८
हृच्छूलहरा योगाः१४२उदावर्त्तस्य सामान्यलक्षणानि१५८११
त्वग्वातहरो योगः१४२उदावर्त्तस्य पूर्वरूपाणि१५८१४
ऊर्ध्वानिलहरो योगः१४२उदावर्त्तचिकित्सा१५९
हिक्काश्वासहरो लेहः१४२राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ।
दीपनीयो योगः१४२राजयक्ष्मणि पिप्पलीक्षीरम्१६१
गर्भिण्याः पथ्यापथ्यम्१४२१०राजयक्ष्मणि पिप्पलीवर्धमानकम्१६१
दुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? ।राजयक्ष्मणि नागबलाप्रयोगः१६२
दुष्प्रजातायाः सामान्यचिकित्सा१४३राजयक्ष्मणि मण्डूकपर्णीशुण्टीब्राह्मीमधुकानां प्रयोगाः१६२१०
दुष्प्रजाताव्याधीनां निदानम्१४३राजयक्ष्मणि आजं रसायनम्१६२१४
दुष्प्रजाताव्याधीनां नामतो निर्देशः१४४राजयक्ष्मणि महाभयारिष्टः१६३
दुष्प्रजातारोगेषु त्रैवृत्तस्नेहः१४४राजयक्ष्मणि इन्द्राणीघृतम्१६३
बालग्रहचिकित्सताध्यायः ? ।राजयक्ष्मणि लशुनप्रयोगः१६३१०
रेवत्या वरप्राप्तिः१४६राजयक्ष्मणि द्राक्षासर्पिः, पीलुघृतं च१६४
रेवत्या विंशतिनामानि१४७राजयक्ष्मणि दैवव्यपाश्रयचिकित्सा१६४
रेवतीपूजनफलम्१४८गुल्मचिकित्साध्यायः ? ।
रेवतीरोषजनिता रोगाः१४८गुल्मस्य भेदाः१६५
रेवत्याश्चिकित्सा१४९गुल्मस्य सामान्या संप्राप्तिः१६५
पूतनाग्रहोत्पत्तिः१५०वातगुल्मस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः१६५
पूतनाया नामानि१५०१२गुल्मानां पूर्वरूपम्१६६
पूतनाया चिकित्सा१५०१४वातगुल्मस्य लक्षणम्१६६
मुखमण्डिकाग्रहोत्पत्तिः१५३पित्तगुल्मस्य लक्षणम्१६६
मुखमण्डिकायाश्चिकित्सा१५३११कफगुल्मस्य लक्षणम्१६६
शीतपूतनार्दिते बाले चिकित्सा१५४सान्निपातिकगुल्मस्य लक्षणम्१६७
सर्वग्रहाणां सामान्य चिकित्सा१५५रक्तगुल्मस्य निदानसंप्राप्तिलक्षणानि१६७
प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ।गुल्मस्य साध्यासाध्यविचारः१६८
प्लीहवृद्धिलक्षणानि१५५११गुल्मस्य चिकित्सासूत्रम्१६८
प्लीहवृद्धौ सामान्यचिकित्सा१५६वातगुल्मे दशाङ्गं घृतम्१६८
प्लीहवृद्धौ आमलकीघृतम्१५६

५६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयःपृ.पं.विषयःपृ.पं.
वातगुल्मे षट्पलं घृतम्१६८मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? ।
वातगुल्मे शैशुकं घृतम्१६९मूत्रकृच्छ्रस्य संप्राप्तिः१७७
गुल्मे संशोधनं१६९दोषभेदेन मूत्रकृच्छ्रस्य लक्षणानि१७७
गुल्मे भोजनम्१६९मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोर्विशेषः१७८
गुल्मे पिप्पल्यादिवटकाः१६९मूत्रकृच्छ्रे कतिपययोगाः१७९
वातगुल्मे हितमन्नपानम्१६९१०मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोश्चिकित्सायां विशेषः१७९११
वातगुल्मे बस्तिः१६९१२सरक्ते मूत्रकृच्छ्रे ऊषकादियोगः१७९१४
वातगुल्मे हरीतकीप्रयोगः१६९१३मूत्रकृच्छ्रेऽन्ये कतिपययोगाः१८०
कुष्ठचिकित्साध्यायः ? ।शर्कराश्मर्योर्लक्षणं चिकित्सा च१८०१३
कुष्ठपूर्वरूपाणि१७१द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ।
वातपित्तकफसन्निपातोत्तराणां कुष्ठानां लिङ्गानि१७२व्रणविषये जीवकस्य प्रश्नाः१८२
दोषविशेषैः कुष्ठविशेषोत्पत्तिः१७२कश्यपस्योत्तरम्१८२
कुष्ठेषु साध्यासाध्यविभागः१७२निजागन्तुभेदेन व्रणस्य द्वैविध्यम्१८३
कुष्ठानामाश्रयभूता धातवः१७२१०दोषभेदेन व्रणानां लिङ्गानि१८३
सिध्मस्य लक्षणम्१७२११व्रणानां नवविध उपक्रमः१८४
विचर्चिकायाः लक्षणम्१७२१२दोषभेदेन व्रणोपक्रमाः१८४
पामायाः लक्षणम्१७२१२व्रणबन्धनविधिः१८५
दद्रोः लक्षणम्१७२१२व्रणे कल्कदानम्१८५
किटिभस्य लक्षणम्१७२१३पच्यमानव्रणलक्षणम्१८६
कपालस्य लक्षणम्१७२१४पक्वव्रणलक्षणम्१८६
महारुष्कस्य लक्षणम्१७२१५तत्र चिकित्सा१८६
मण्डलस्य लक्षणम्१७२१६व्रणे सवर्णकरणो योगः१८७
विषजस्य लक्षणम्१७२१७व्रणे रोमसंजननो योगः१८७
पौण्डरीकस्य लक्षणम्१७२१७बालानामष्टौ पिडकाः१८७
श्वित्रस्य लक्षणम्१७२१७तासां नामानि१८७
ऋष्यजिह्वस्य लक्षणम्१७२१८शराविका-कच्छपिका-जालिनी-सर्षपिकाऽ-लजीविनतानां लक्षणानि१८७
शतारुष्कस्य लक्षणम्१७२१९विद्रध्याः लक्षणानि१८७१०
औदुम्बरस्य लक्षणम्१७२१९अरुंषिकायाः लक्षणानि१८७११
काकणस्य लक्षणम्१७२२०पिडकानां चिकित्सासूत्रम्१८९
चर्मदलस्य लक्षणम्१७२२०अरुंषिकाणां चिकित्सा१८९
एककुष्ठस्य लक्षणम्१७२२०अरकीलिकाय लक्षणं चिकित्सा च१९०
विपादिकायाः लक्षणम्१७२२१बालानामागन्तुव्रणचिकित्सा१९१
कुष्ठेषु दोषविशेषेण चिकित्सा१७२२२बालानां दद्रोर्निदानं चिकित्सा च१९११२