काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
विषयानुक्रमणिका
<p align="right">·५६९</p>| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| बालानां रात्रौ स्नेहमर्दनोपदेशः | १९२ | १ | मदात्यये तर्पणम् | २०५ | १ |
| बालानां दुस्सङ्ग्रहजनितव्रणचिकित्सा | १९२ | ५ | मदात्यये मद्यप्रयोगः | २०५ | २ |
| द्विव्रणीयचिकित्सितोपसंहारः | १९३ | ५ | मदात्यये आहारविधिः | २०५ | ४ |
| प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? । | मदात्यये विहारः | २०६ | ४ | ||
| प्रतिश्यायस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९३ | १० | मदात्यये वर्ज्यानि | २०६ | ६ |
| प्रतिश्यायस्य सामान्यलक्षणम् | १९४ | १ | मदात्यये कतिपययोगाः | २०६ | १० |
| प्रतिश्यायस्य भेदाः | १९४ | ६ | फक्कचिकित्साध्यायः ? । | ||
| प्रतिश्यायस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९४ | ७ | फक्कलक्षणम् | २०८ | १ |
| प्रतिश्यायस्य चिकित्सा | १९५ | २ | फक्कनिदानम् | २०८ | ३ |
| उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? । | फक्कभेदाः, तेषां लक्षणानि च | २०८ | ८ | ||
| उरोघातस्य निदानम् | १९७ | ३ | फक्कचिकित्सा | २१० | १ |
| उरोघातस्य चिकित्सा | १९७ | ५ | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| शोथचिकित्सिताध्यायः ? । | धात्रीचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१२ | ३ | ||
| शोथस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९८ | ३ | कश्यपस्योत्तरम् | २१२ | ५ |
| शोथस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९८ | ६ | अग्निभेदेन धात्र्याश्चिकित्सा | २१२ | १० |
| कृमिचिकित्सिताध्यायः ? । | मेदस्विन्याः धात्र्याश्चिकित्सा | २१३ | १० | ||
| बालानां कृमिरोगे विडङ्गघृतम् | २०० | ३ | धात्रीरोगे बलातैलम् | २१३ | १४ |
| बालानां कृमिरोगे पथ्यम् | २०१ | १ | बलातैलातिदेशेनान्येषां तैलानां विधानम् | २१५ | ९ |
| बालानां कृमिरोगे धात्र्या औषधादिसेवनं कर्तव्यं | २०१ | ३ | षष्ठीग्रहस्य निदानं चिकित्सा च | २१७ | १ |
| बालानां कृमिरोगे गुदे कटुतैलप्रयोगः | २०१ | ७ | धात्रीणामजीर्णचिकित्सा | २१७ | १० |
| मदात्ययचिकित्साध्यायः ? । | कौमारभृत्यस्य भिषजः प्रशंसा | २१७ | १६ | ||
| मद्योत्थरोगभेदाः | २०२ | ३ | मातुः प्रशंसा | २१८ | ८ |
| पानात्ययस्य लक्षणम् | २०२ | ४ | सिद्धिस्थानम् ७ । | ||
| पानविभ्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | राजपुत्रीया सिद्धिः १ । | ||
| पानापक्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | बस्तिकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१९ | ३ |
| मद्यगुणाः | २०२ | ७ | कश्यपस्योत्तरम् | २१९ | ९ |
| अतिसेवितमद्यदोषाः | २०३ | ५ | बालस्य कदा बस्तिकर्म कार्यमित्यत्र नानामुनीनां मतानि | २२० | १ |
| मदात्ययस्य सामान्यलक्षणम् | २०३ | ९ | बस्तिदानविधिः | २२१ | ५ |
| मदात्ययस्य वाताजादिभेदेन लक्षणानि | २०४ | १ | एकान्तरं बस्तिविधानम् | २२२ | १ |
| मदात्यये लङ्घनम् | २०४ | ५ | निरूहबस्तिगुणाः | २२२ | ५ |
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| निरूहयोग्या नरा: | २२३ | ७ | दत्तनस्यस्य हित आहारो विहारश्च | २४२ | १ |
| बस्तिकर्मप्रशंसा | २२३ | ९ | क्रियासिद्धिः ५ । | ||
| त्रिलक्षणा सिद्धिः २ । | पञ्चकर्मणि अजीर्णमैथुनयानोच्चैर्भाष्यादिवा- | ||||
| पञ्चकर्मसु त्रिविधयोगलक्षणान्यवेक्षेत | २२४ | १२ | स्वापातिच-ङ्क्रमणस्थानासात्म्यादिव- | ||
| विशोधनं कदा देयम् | २२५ | १ | र्जनोपदेशः | २४२ | ११ |
| विरेचनगुणा: | २२५ | ४ | अजीर्णादिसेवनजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्दान्तलक्षणम् | २२५ | ६ | च | २४३ | १ |
| अतिवान्तलक्षणम् | २२५ | ९ | वर्जिता बस्तयः | २४३ | ५ |
| सम्यग्विरिक्तलक्षणम् | २२६ | १ | बस्तिप्रणेतृदोषजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्विरिक्तस्य लक्षणम् | २२६ | ५ | च | २४३ | ६ |
| नस्यभेदा: | २२६ | ७ | बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ । | ||
| नस्यस्य समहीनातियोगलक्षणानि | २२६ | १० | बस्तिकर्मणोऽयोगातियोगलक्षणं | २४५ | ६ |
| स्वनुवासितलक्षणम् | २२७ | ३ | तच्चिकित्सा च | ||
| दुरुनुवासितलक्षणम् | २२७ | ४ | भृशमुत्पीडितबस्तेर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २४६ | ३ |
| सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | २२७ | ६ | पञ्चकर्मीया सिद्धिः ७ । | ||
| दुर्निरूढलक्षणम् | २२८ | १ | पञ्चकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २४८ | ३ |
| अतिनिरूढलक्षणम् | २२८ | ३ | वमनानर्हा रोगाः | २४८ | ४ |
| कर्मबस्तिलक्षणम् | २२८ | ४ | वमनार्हा रोगा रोगिणश्च | २४८ | ७ |
| वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ । | विरेचनार्हा रोगाः | २४९ | ३ | ||
| वमनौषधपानविधि: | २२८ | ९ | अविरेच्याः | २४९ | ६ |
| वमनस्य वेगसंख्यया हीनमध्योत्तमविभाग: | २२९ | ४ | शिरोविरेचनार्हा रोगाः | २५० | १ |
| वमनान्तरं कर्तव्य उपचार: | २२९ | ५ | स्नेहननस्ययोग्याः | २५० | ३ |
| बालरोगे शिशुधात्र्योरुभयोरपि संशोधनोपदेश: | २३१ | १ | अनुवासनार्हाः | २५० | ७ |
| विरेचनौषधदानविधि: | २३२ | ६ | अनुवासनायोग्याः | २५१ | २ |
| उत्तमवमनविरेचनयोर्लक्षणम् | २३३ | १ | निरूहणार्हाः | २५१ | ३ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २३४ | ३ | अनिरूह्याः | २५१ | ४ |
| नस्तःकर्मीया सिद्धिः ४ । | निरूहानुवासनयोः प्रमाणम् | २५१ | ६ | ||
| नस्यभेदा: | २३८ | ५ | लङ्घनीया रोगाः | २५२ | १ |
| नस्यदानविधि: | २३८ | ६ | बृंहणीया रोगाः | २५२ | २ |
| प्रधमनावपीडनयोर्विधि: | २३८ | १३ | मङ्गलसिद्धिः ८ । | ||
| नस्यदाने परिहार्याणि | २३९ | ३ | गृहस्थ्यैर्मङ्गलान्येव सेव्यानि | २५२ | ८ |
| परिहार्याण्यपरिहरतो व्यापदस्तासां | २३९ | ५ | अनुवासननिरूहयोर्लक्षणम् | २५२ | १० |
| चिकित्सा च | अनुवासनार्थं शैशुकः स्नेहः | २५३ | १ |
विषयानुक्रमणिका
५७१
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| कतिपयनिरूहयोगाः | २५३ | ७ | धूपाभिमन्त्रणम् | २६० | १२ |
| कल्पस्थानम् ८ । | लशुनकल्पाध्यायः ५ । | ||||
| धूपकल्पाध्यायः ४ । | लशुनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २६२ | ३ | ||
| कतिपयधूपयोगाः | २५५ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | २६२ | ७ |
| कौमारो धूपः | २५५ | ५ | लशुनस्य प्रागुत्पत्तिः | २६२ | ८ |
| अपस्मारग्रहापहो धूपः | २५५ | ८ | लशुनस्य रसविपाकगुणाः | २६३ | १ |
| माहेश्वरः धूपः | २५५ | १० | लशुनप्रयोगानर्हाः | २६४ | १२ |
| आग्नेयः धूपः | २५६ | १ | लशुनप्रयोगाईः कालः | २६५ | ६ |
| भद्रङ्करः धूपः | २५६ | ३ | लशुनप्रयोगविधिः | २६५ | ७ |
| रक्षोघ्नः धूपः | २५६ | ६ | लशुनप्रयोगे वर्ज्यानि | २६६ | १४ |
| प्रेतनिवारणः धूपः | २५६ | ८ | लशुनोपद्रवप्रतीकारः | २६७ | १६ |
| दशाङ्ग धूपः | २५६ | ११ | कतिपयलशुनकल्पाः | २७० | २ |
| मोहः धूपः | २५६ | १४ | गन्धमहन्नाम लशुनकल्पः | २७१ | ७ |
| वारुणः धूपः | २५६ | १६ | कटुतैलकल्पाध्यायः ६ । | ||
| चतुरङ्गिकः धूपः | २५७ | १ | प्लीहरोगे कटुतैलकल्पः | २७३ | ३ |
| नन्दकः धूपः | २५७ | ३ | प्लीहरोगे हितो विहारः | २७५ | १ |
| कर्णधूपः | २५७ | ५ | प्लीहोदरहराः कतिपयोगाः | २७५ | ३ |
| श्रीधूपः | २५७ | ७ | षट्कल्पाध्यायः ७ । | ||
| ग्रहघ्नधूपः | २५७ | ९ | बालानामक्षिरोगोपशमनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २७६ | १ |
| पुण्यो धूपः | २५७ | ११ | कश्यपस्योत्तरम् | २७६ | ३ |
| शिशुकः धूपः | २५७ | १३ | अक्षिरोगे चक्षुष्याकल्पः | २७६ | ४ |
| ब्राह्मधूपः | २५८ | १ | पुष्पक-रोचना-रसाञ्जन-कतकफलानां कल्पाः | २७७ | ११ |
| प्रतिधूपाः | २५८ | ३ | चक्षुष्या-रोचना-पुष्पक-रसाञ्जन-कतकफलानां गुणाः | २७८ | ४ |
| अरिष्टो धूपः | २५८ | ७ | पञ्चेन्द्रियविवर्धनं पाञ्चभौतिकं तैलं | २७८ | ११ |
| अपस्मारनाशनो धूपः | २५८ | ९ | शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ८ । | ||
| सर्वरोगहरः धूपः | २५८ | १० | शतपुष्पाशतावरीकल्पविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २८० | ३ |
| गणधूपः | २५९ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | २८० | ४ |
| स्वस्तिको धूपः | २५९ | २ | शतपुष्पागुणाः | २८० | ५ |
| ग्रहनाशनाः पञ्च धूपाः | २५९ | ३ | शतावरीगुणाः | २८० | ७ |
| गृहधूपः | २५९ | ५ | शतपुष्पाशतावरीकल्पार्हाः | २८० | ९ |
| धूपानामुपयोगः | २५९ | ६ | शतपुष्पाकल्पाः | २८० | १३ |
| धूपनिर्माणविधिः | २५९ | ८ | |||
| धूपभेदाः | २६० | १ | |||
| धूपानां प्रागुत्पत्तिः | २६० | ३ |
५७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| शतावरीकल्पाः | २८२ | ४ | विशेषकल्पाध्यायः ११ । | ||
| रेवतीकल्पाध्यायः ९ । | सन्निपातज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३१९ | ३ | ||
| रेवत्याः प्रागुत्पत्तिः | २८२ | ८ | कश्यपस्योत्तरम् | ३२० | १ |
| कथंभूतां स्त्रियं जातहारिणी सज्जते | २८५ | ११ | सन्निपातज्वरहेतवः | ३२० | २ |
| कथंभूतानमनुष्याञ्जातहारिण्याविशति | २८७ | १ | सन्निपातज्वरस्य दुश्चिकित्स्यत्वम् | ३२० | ८ |
| जातहारिण्याविष्ठायाः स्त्रिया लक्षणानि | २८९ | ४ | सन्निपातज्वरस्य पूर्वरूपाणि | ३२१ | ३ |
| जातहारिण्या भेदास्तेषां लक्षणानि च | २८९ | ११ | सन्निपातज्वरस्य भेदास्तेषां लक्षणानि च | ३२१ | ४ |
| कस्यामवस्थायां जातहारिण्याविशति | २९४ | १ | सन्निपातज्वरे शीतलघृतयोर्निषेधः | ३२७ | १ |
| याः स्त्रिय आविश्य जातहारिण्यन्यां-<br>स्त्रियं प्रविशति तासां वर्णनम् | २९४ | ५ | सन्निपातज्वरे को दोष आदावुपक्रम्य इत्यत्र<br>विचारः | ३२७ | ८ |
| तिरश्च्या जातहारिण्या वर्णनम् | २९६ | १ | संनिपातज्वरे क्षौद्रनिषेधः | ३२८ | ७ |
| जातहारिणीग्रस्तस्य शिशो रूपाणि | २९९ | ३ | संनिपातज्वरे प्रारम्भोपक्रमाः | ३२८ | ११ |
| प्रजावरणबन्धविधिः | ३०० | २ | संनिपातज्वरे लङ्घनम् | ३२९ | १ |
| भोजनकल्पाध्यायः १० । | संनिपातज्वरे स्वेदनम् | ३२९ | ७ | ||
| भोजनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३०४ | १ | संनिपातज्वरे तृष्णाप्रशमनाय पानीयम् | ३३१ | २ |
| बुभुक्षितपिपासितयोर्लक्षणानि तत्रोपचारः | ३०५ | १ | संनिपातज्वरे पेयायूषरसादिविधानम् | ३३१ | ८ |
| तृष्णाया निदानम् | ३०५ | १३ | संनिपातज्वरे विरेचनम् | ३३३ | १ |
| अपतर्पितस्य लिङ्गानि | ३०६ | १ | संनिपातज्वरे कषाययोगाः | ३३३ | ३ |
| मन्दाशितस्य लिङ्गानि | ३०६ | ३ | संनिपातज्वरे उरःक्षतोपद्रवलक्षणम् | ३३५ | १ |
| अत्यशितमन्दाशितयोश्चिकित्सा | ३०६ | ५ | संनिपातज्वरे पित्तप्रकोपोपचिकित्सा | ३३५ | ५ |
| सम्यग्भुक्तवतो लक्षणानि | ३०६ | ७ | संनिपातज्वरे कटुकं सर्पिः | ३३५ | ९ |
| भोजनपानकालौ | ३०६ | ११ | निवृत्तसन्निपातो यथा रक्ष्यः | ३३६ | ५ |
| भोज्यानुपूर्वीवर्णनम् | ३०६ | १२ | सन्निपातस्यासाध्यलक्षणम् | ३३७ | १ |
| येषां शीतं जलं पथ्यम् | ३०८ | ११ | निवृत्तसन्निपातस्य हित आहारो विहारश्च | ३३७ | ३ |
| येषु देशेषु यद्यत् सात्म्यं तद्देशवासिनस्तैरेव<br>भोज्यैरुपक्रम्याः | ३०९ | ५ | सन्निपातज्वरे वर्जनीयानि | ३३७ | ११ |
| पेयाया गुणाः | ३१० | १४ | सन्निपातज्वरे पथ्यान्यन्नपानानि | ३३८ | १ |
| आमाशयवर्णनम् | ३११ | ५ | संहिताकल्पाध्यायः १२ । | ||
| येषां मांसरसो हितः, येषां चाहितः | ३११ | ७ | काश्यपसंहितायाः स्थानाध्यायनिरूपणम् | ३३९ | १ |
| तक्रगुणाः | ३११ | १५ | एतत्तन्त्राध्ययनफलम् | ३३९ | १२ |
| मण्डयूषयोर्गुणाः | ३१२ | ३ | रोगाणां प्रागुत्पत्तिः | ३४० | १ |
| यवागूगुणाः | ३१३ | ११ | अस्य तन्त्रस्य प्रतिसंस्कारेतिहासः | ३४० | ७ |
| क्षीरगुणाः | ३१४ | १ | खिलस्थानम् ९ । | ||
| इक्षुरसगुणाः | ३१७ | ५ | विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः १ । | ||
| विषमज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३४२ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
५७३
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| कश्यपस्योत्तरम् | ३४२ | ९ | ज्वरे विपरीतप्रकृतौ सति सुखसाध्यत्वम् | ३५९ | ३ |
| समविषमज्वयोर्लक्षणम् | ३४३ | १ | केषां शमनं केषां च शोधनं हितम् | ३५९ | ६ |
| विषमज्वरस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ३४३ | ४ | शमनशोधनयोर्लक्षणम् | ३५९ | १० |
| विषमज्वरलक्षणम् | ३४४ | १ | शमनीयानि द्रव्याणि | ३६० | ३ |
| विषमज्वरस्य पुनः पुनरभ्यागमने हेतुः | ३४४ | ५ | शोधनानि | ३६० | ६ |
| सततकान्येद्युष्कतृतीयकचतुर्थकानां लक्षणानि | ३४५ | ६ | शमनशोधनानि द्रव्याणि | ३६० | ९ |
| चतुर्थकज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | ३४६ | ७ | दोषोपशमलक्षणम् | ३६० | १३ |
| पञ्चमादिदिने विषमज्वरानभ्यागमने हेतुः | ३४८ | १ | संक्षेपतश्चिकित्सोपदेशः | ३६१ | २ |
| मोक्षकाले ज्वराभिवर्धने हेतुः | ३४८ | ५ | चिकित्सा कथं विधेया | ३६१ | ४ |
| ज्वरविसृष्टौ हेतुः | ३४९ | २ | आर्षप्रयोगास्तथैव प्रयोक्तव्याः, तत्राविज्ञाय प्रक्षेपापचयौ न विधेयौ | ३६१ | ७ |
| शीतपूर्वदाहपूर्वज्वरयोर्हेतुः | ३४९ | ३ | वयःशरीराद्यवेक्ष्य मात्रा विधेया | ३६२ | १ |
| ज्वरे शिरोभितापे पादशैत्ये च हेतुः | ३५० | १० | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ । | ||
| ज्वरे उष्णोपक्रमे हेतुः | ३५१ | १ | भैषज्योपक्रमादिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३६२ | ६ |
| जीर्णविषमज्वरचिकित्सा | ३५१ | १० | कश्यपस्योत्तरम् | ३६३ | १८ |
| विषमज्वरे दोषाधिक्येन चिकित्साविशेषः | ३५२ | २ | रोगभेदाः | ३६४ | ४ |
| विषमज्वरे सामान्यचिकित्सा | ३५२ | ६ | शारीरव्याधिहेतवः | ३६४ | ७ |
| विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ । | मानसव्याधिहेतवः | ३६४ | ८ | ||
| सर्वज्वरचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५४ | ३ | शारीरमानसरोगयोः प्रतीकारः | ३६५ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ३५४ | ६ | निजागन्तुभेदेन रोगद्वैविध्यम् | ३६५ | ३ |
| अवस्थायां प्रयुक्तभेषजस्य गुणकारित्वम् | ३५४ | ८ | औषधभेदाः, तल्लक्षणं च | ३६५ | ८ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | ९ | कषायशब्दनिरुक्तिः | ३६६ | ३ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | १२ | कीदृशं भेषजं राजार्हं भवति | ३६६ | ७ |
| ज्वरे शिरोविरेचनम् | ३५५ | १ | सप्तविधकषायभेदास्तेषां लक्षणानि च | ३६६ | ११ |
| ज्वरे दोषबलाबलभेदेन चिकित्साभेदः | ३५५ | ३ | दशौषधकालाः | ३६७ | ९ |
| आमज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ८ | कस्यामवस्थायां केषु च भेषजं न प्रयोज्यम् | ३६९ | ५ |
| निरामज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ११ | ऊनद्वादशवर्षाणामेकान्तेन भेषजदाननिषेधः | ३६९ | १० |
| बहिर्मार्गगतज्वरलक्षणं तत्र चिकित्सा च | ३५६ | १ | कीदृशं भेषजं न योज्यम् | ३७० | २ |
| दोषदुर्बलौषधदुर्बललक्षणानि चिकित्सा च | ३५६ | ४ | कीदृशं भेषजमवचार्यम् | ३७० | ५ |
| ज्वरापहो लंघनादिक्रमः | ३५७ | ७ | औषधदानविधिः | ३७० | ९ |
| ज्वरे कषायः कदा देयः | ३५७ | ९ | पीतौषधेन वर्ज्यानि | ३७० | १२ |
| ज्वरे संशमनम् | ३५८ | ४ | जीर्यमाणभेषजलिङ्गानि | ३७१ | १ |
| ज्वरे सर्पिः | ३५८ | ६ | अन्नकालस्य लक्षणम् | ३७१ | ३ |
| ज्वरे विरेचनम् | ३५८ | १० | त्रिविधवयोभेदाः | ३७१ | ५ |
| ज्वरे निरूहानुवासनौ | ३५९ | १ |
५७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| वयोभेदेन भेषजमात्राभेदः | ३७२ | १ | ओदनदोषाः | ३८४ | १२ |
| भेषजमात्रानिर्णयेऽग्न्यृतुसात्म्यादीन्यप्यवेक्षेत | ३७४ | १४ | यवागूसाधनपरिभाषा | ३८५ | १ |
| योगज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३७५ | ३ | यवागूदोषाः | ३८५ | ४ |
| तीक्ष्णमृदुमध्यौषधयोग्या नराः | ३७६ | ४ | विविधरोगेषु यवागूविधानम् | ३८५ | ८ |
| यूषनिर्देशीयाध्यायः ४ । | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५ । | ||||
| आहारप्रशंसा | ३७७ | ४ | आहारगुणाः | ३८७ | ९ |
| आहारभेदाः | ३७८ | ३ | भोजनविधिः | ३८७ | १२ |
| आहारगुणः | ३७८ | ८ | आरोग्यलिङ्गानि | ३८८ | ५ |
| यूषगुणाः | ३७९ | ५ | अन्नकालाः | ३८९ | १ |
| यूषनिरुक्तिः | ३७९ | ९ | भोजनविधिनोपभुञ्जतो गुणाः | ३८९ | २ |
| यूषयवाग्वोर्लक्षणम् | ३७९ | ११ | मधुरादिरससात्म्यताया गुणा दोषाश्च | ३९२ | ८ |
| यूषभेदाः | ३७९ | १३ | घृतक्षीरतैलमांससात्म्यताया गुणाः | ३९३ | ३ |
| यूषरागखाडवपानकानां लक्षणम् | ३८१ | १ | भोजनोपकल्पना | ३९३ | ९ |
| वातरोगे हिता यूषाः | ३८१ | ३ | असम्यक्परिपाकहेतवः | ३९४ | ६ |
| क्वाथकल्कयोः पर्यायाः | ३८१ | ८ | समशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| मुद्गयूषः | ३८१ | १० | अध्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| विरसिकायूषः | ३८१ | १२ | प्रमृताशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| रोचनयूषः | ३८१ | १३ | विषमाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| दाडिमयूषः | ३८१ | १३ | विरुद्धाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| धात्रीयूषः | ३८१ | १४ | अजीर्णाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| चित्रकयूषः | ३८१ | १५ | अत्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ४ |
| मूलकयूषः | ३८१ | १७ | चतुर्विंशतिभोजनोपकल्पनाः केषु योज्याः | ३९५ | ६ |
| पञ्चकोलयूषः | ३८२ | २ | रसदोषविभागीयाध्यायः ६ । | ||
| धान्ययूषः | ३८२ | ४ | रसदोषविभागज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३९६ | १ |
| कुलत्थयूषः | ३८२ | ८ | दोषभेदतो व्याधीनां द्विषष्ठिधा कल्पना | ३९६ | ३ |
| फलयूषः | ३८२ | १० | रसानां त्रिषष्ठिधा कल्पना | ३९८ | ३ |
| पुष्पयूषः | ३८२ | १२ | दोषभेदानवेक्ष्य रसा योज्याः | ३९९ | ३ |
| पत्रयूषः | ३८३ | १ | कफजे व्याधौ कटुतिक्तकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ३ |
| वल्कलयूषः | ३८३ | ३ | पित्तजे व्याधौ तिक्तस्वादुकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ८ |
| पल्लवयूषः | ३८३ | ५ | वातजे व्याधौ लवणाम्लकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | १२ |
| काम्बलिकयूषः | ३८३ | १० | |||
| महायूषः | ३८३ | १४ | |||
| मूलकयूषः | ३८४ | ४ | |||
| ओदनगुणाः | ३८४ | ११ |
विषयानुक्रमणिका ५७५
| पृ. | प | पृ. | प | ||
|---|---|---|---|---|---|
| पूर्वोक्तरसप्रविचारणाया ज्वरे<br>उदाहरणरूपेण प्रयोगदर्शनम् | ४०१ | १ | निरूहगुणाः | ४३० | १ |
| दोषविकल्पानवेक्ष्य रसानां प्रक्षेप्रावकषौँ<br>विधेयौ | ४०१ | ९ | सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | ४३० | ४ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिदोषभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०२ | ३ | निरूहायोगातियोगलिङ्गानि | ४३० | ७ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिरसभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०४ | १४ | निरूढस्यानुवासनप्रयोगः | ४३० | ९ |
| संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७ । | अनुवासनगुणाः | ४३१ | ५ | ||
| संशोधनमधिकृत्य षट्सु ऋतुषु दोषाणां<br>संचयप्रकोपोपशमवर्णनम् | ४०७ | ९ | अनुवासनार्थं फलतैलम् | ४३२ | १ |
| हेत्वीरितदोषस्य शीघ्रोपक्रमोपदेशः | ४०९ | ३ | अनुवासनार्थं एरण्डबस्तिः | ४३२ | १२ |
| बहुदोषस्य लक्षणम् | ४१० | १ | अनुवासनमात्राः | ४३३ | १ |
| बहुमध्याल्पबलेषु दोषेषु चिकित्साविशेषः | ४१० | ४ | निरूहमात्रा | ४३४ | १ |
| स्नेहनगुणाः | ४११ | १ | प्रधानमध्यावरा मात्राः केषु योज्याः | ४३४ | ४ |
| स्वेदनगुणाः | ४११ | २ | रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९ । | ||
| शोधनगुणाः | ४११ | ४ | रक्तगुल्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४३४ | ११ |
| शोधनविधिः | ४१३ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | ४३५ | १४ |
| शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४१३ | ९ | गर्भाशयस्य रजस उत्पत्तेश्च वर्णनम् | ४३५ | १७ |
| वमनविधिः | ४१४ | ११ | रक्तगुल्मस्य संप्राप्ति | ४३६ | १० |
| विरेचनविधिः | ४१७ | २ | रक्तगुल्मस्य लक्षणानि | ४३७ | ९ |
| प्रधानमध्यमावरशुद्धिलक्षणम् | ४१७ | ९ | रक्तगुल्मस्य निरुक्तिः | ४३८ | ५ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तासां चिकित्सा च | ४१७ | ११ | रक्तगुल्मे गर्भसमानलक्षणोत्पत्तौ हेतुः | ४३९ | १ |
| कथंभूतं भेषजं सम्यक्शुद्धिमावहति | ४१९ | १२ | रक्तगुल्मे कालप्रकर्षे हेतुः | ४३९ | १० |
| बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८ । | रक्तगुल्मस्य दशममासात्परमुपक्रम्यत्वे हेतुः | ४४० | १ | ||
| बस्तिकर्मणः प्रशंसा | ४२० | ७ | रक्तगुल्मगर्भयोर्विशिष्टलक्षणानि | ४४० | ४ |
| बस्तिकर्मणस्त्रयो भेदास्तेषां लक्षणानि च | ४२१ | ५ | रक्तगुल्मगर्भयोर्निश्चयं विधायैव चिकित्सा<br>विधेया | ४४१ | ३ |
| चतुर्भद्राख्यश्रुतार्थो बस्तिकल्पः | ४२३ | १० | पूर्णे प्रसवकाले प्रवर्तमानरक्तनिवारणनिषेधः | ४४२ | ५ |
| अयुग्मबस्तिदानोपदेशः | ४२४ | ५ | रक्तगुल्मे चिकित्सासूत्रम् | ४४२ | ८ |
| बस्तिकर्मसाध्या रोगाः | ४२४ | १० | रक्तगुल्मे वर्ज्यानि | ४४३ | १ |
| निरूहप्रणिधानविधिः | ४२५ | १ | रक्तगुल्मोपद्रवाः | ४४३ | २ |
| निरूहबस्तिप्रमाणोत्कर्षापकर्षविधिः | ४२६ | ८ | रक्तगुल्मस्य शैथिल्यकरण- भेदनार्थं<br>चिकित्सा | ४४३ | ३ |
| कथंभूतं निरूहमुपकल्पयेत् | ४२८ | १ | अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० । | ||
| अतोऽन्यथाप्रयोगे व्यापदः | ४२८ | ४ | अन्तर्वत्नीचिकित्सितोपक्रमः | ४४५ | ३ |
| कथंभूतो बस्तिः प्रशस्यते | ४२९ | ९ | गर्भिण्या ज्वरस्य विशेषतः कष्टकारकत्वम् | ४४५ | ५ |
| गर्भिण्या ज्वरस्य निदानम् | ४४५ | ७ |
५९ का. सं.
५७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीज्वरस्य चिकित्सासूत्रम् | ४४५ | १० | त्रिविधदेशभेदेन सूतिकोपक्रमे विशेषः | ४६७ | ८ |
| तरुणे गर्भे अभ्यङ्ग-शिरोविरेक-धूमपान-स्वेद-वमन-स्रंसनास्थापनानुवासननिषेधः | ४४७ | २ | सूतिकाज्वरस्य निदानम् | ५६९ | १ |
| गर्भिण्याः वातज्वरे हिता योगाः | ४४८ | ६ | सूतिकाज्वरस्य दुरुपक्रमत्वे हेतुः | ४६९ | ७ |
| गर्भिण्या पित्तज्वरे हिता योगाः | ४४९ | १० | वातजादिभेदेन सूतिकाज्वरस्य लक्षणानि | ४७० | १० |
| गर्भिण्याः श्लेष्मज्वरे हिता योगाः | ४५० | ७ | स्तन्यागमोत्थज्वरस्य लक्षणम् | ४७१ | १० |
| गर्भिण्याः संसृष्टज्वरे हिता योगाः | ४५० | १० | सूतिकाया आगन्तुज्वरलिङ्गानि | ४७२ | १ |
| मद्यपाया गर्भिण्याश्चिकित्सा | ४५१ | ६ | सूतिकाज्वरे अवस्थाभेदेनोपक्रमः | ४७३ | ९ |
| गर्भिण्या अतिसारे चिकित्सा | ४५१ | ११ | वातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७४ | ११ |
| गर्भिण्या परिकर्तिकायां चिकित्सा | ४५५ | ७ | पित्तजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७६ | १० |
| गर्भिण्या मुखपाके चिकित्सा | ४५६ | १ | कफजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७८ | ९ |
| गर्भिण्या आक्षेपाकपतानकयोश्चिकित्सा | ४५६ | ५ | सन्निपातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७९ | १४ |
| गर्भिण्या छर्द्यां चिकित्सा | ४५७ | ३ | जातकर्मोत्तराध्यायः १२ । | ||
| गर्भिण्या कामलायां चिकित्सा | ४५८ | ३ | प्रथमे मासि शिशोः सूर्योदयस्य दर्शनोपस्थापनं प्रदोषे चन्द्रमसश्च | ४८३ | ३ |
| गर्भिण्या हृद्रोगे चिकित्सा | ४५८ | ५ | चतुर्थे मासि शिशोः अन्तर्गृहान्निष्क्रमणविधिः | ४८३ | ५ |
| गर्भिण्या कासे चिकित्सा | ४५८ | ११ | षष्ठे मासि भूमावभ्यासार्थं सकृदुपवेशनविधिः | ४८३ | १२ |
| गर्भिण्या दोषभेदेन जायमानेषु कासेषु चिकित्सा | ४५८ | १२ | शिशोश्शिरोपवेशननिषेधः | ४८५ | १ |
| गर्भिण्या श्वासरोगे चिकित्सा | ४५९ | ३ | षष्ठे मासि शिशोः फलप्राशनम् | ४८५ | ८ |
| गर्भिण्या ऊर्ध्ववाते चिकित्सा | ४५९ | १० | जातदन्तस्य दशमे मासि अन्नप्राशनविधिः | ४८५ | ९ |
| गर्भि ङ्कायां चिकित्सा | ४५९ | ११ | बालानाम्नदानविधिः | ४८७ | १ |
| गर्भिण्या मूत्रग्रहेषु चिकित्सा | ४५९ | १४ | कुक्कुणकचिकित्साध्यायः १३ । | ||
| गर्भिण्या चतुर्थादिमासेषु जायमानरोगचिकित्सा | ४६० | ३ | कुक्कुणकस्य निदानम् | ४८७ | ९ |
| गर्भिण्या विषाबाधाचिकित्सा | ४६१ | ३ | कुक्कुणकस्य लिङ्गानि | ४८८ | ८ |
| गर्भिण्य अरिष्टालिङ्गानि | ४६१ | १० | कुक्कुणकस्य चिकित्सा | ४८८ | १२ |
| गर्भिण्य हितो विहारः | ४६३ | १२ | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४ । | ||
| सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११ । | विसर्पविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ४९६ | ३ | ||
| चतुःषष्टिर्दुब्भजातामयाः | ४६४ | ११ | कश्यपस्योत्तरं | ४९७ | ३ |
| सूतिकोपक्रमेऽप्रमत्तेन भवित यम् | ४६६ | १ | विसर्पस्य प्रागुत्पत्तिः | ४९७ | ४ |
| सूतिकाया उदरे पीडनपूर्वकं पट्टवेष्टनम् | ४६६ | ५ | विसर्पस्य निरुक्तिः | ४९७ | ६ |
| सूतिकायाः स्वेदनम् | ४६६ | ९ | विसर्पस्य निदानम् | ४९७ | ७ |
| सूतिकायाः धूपनम् | ४६७ | १ | विसर्पस्य भेदाः | ४९८ | १ |
| सूतिकायाः अन्नपानविधिः | ४६७ | २ | विसर्पे रक्तावसेकवस्य परमौषधत्वम् | ४९८ | ३ |
| विसर्पस्य वातजादिभेदेन लक्षणानि | ४९८ | ६ |
विषयानुक्रमणिका
<div align="right">५७७</div>| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| विसर्पस्य सामान्यचिकित्सा | ४९९ | १ | शोथानां सामान्यचिकित्सा | ५२१ | ९ |
| वातजविसर्पस्य चिकित्सा | ४९९ | ४ | वातिकशोथस्य चिकित्सा | ५२४ | ६ |
| पैत्तिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०१ | ७ | पैत्तिकशोथस्य चिकित्सा | ५२५ | ११ |
| श्लैष्मिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०४ | ११ | कफजशोथस्य चिकित्सा | ५२६ | १३ |
| संसर्गजविसर्पस्य चिकित्सा | ५०६ | ११ | आगन्तुकशोथस्य चिकित्सा | ५२९ | ६ |
| चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५ । | शोथोपद्रवाः चिकित्सा | ५२९ | ७ | ||
| चर्मदलविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ५०७ | ५ | शूलचिकित्सिताध्यायः १८ । | ||
| कश्यपस्योत्तरम् | ५०८ | ३ | शूलस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५३० | ३ |
| चर्मदलस्य निदानम् | ५०८ | ४ | शूलस्य वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५३० | ७ |
| महतां चर्मदलासंभवे हेतुः | ५०८ | ७ | वातिशूलस्य चिकित्सा | ५३० | ११ |
| चर्मदलभेदाः | ५०८ | ९ | पैत्तिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | ४ |
| वातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | १ | श्लैष्मिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | १२ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | ६ | शूले घृततैल्योः | ५३३ | ७ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | १ | शूले बस्तियोगाः | ५३४ | ८ |
| सान्निपातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | ७ | अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९ । | ||
| चर्मदलस्य साध्यासाध्यत्वविचारः | ५१० | ११ | वातज्वरहरा योगाः | ५३६ | ७ |
| वातिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १ | वातश्लेष्मज्वरहरा योगाः | ५३८ | ११ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १२ | ज्वरे दोषविशेषेण चिकित्साविशेषः | ५४० | १ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५१२ | १० | सन्निपातज्वरचिकित्सा | ५४० | ५ |
| अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६ । | मधुन उष्णयोगनिषेधः | ५४३ | २ | ||
| अम्लपित्तस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५१४ | ३ | क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २० । | ||
| अम्लपित्तस्य लक्षणम् | ५१५ | ५ | क्षीरभेदाः | ५४४ | ४ |
| अम्लपित्तस्य चिकित्सा | ५१६ | १ | क्षीरसामान्यगुणाः | ५४४ | ७ |
| अम्लपित्तस्य उपद्रवाः | ५१८ | १० | गोक्षीरगुणाः | ५४५ | ३ |
| शोथचिकित्सिताध्यायः १७ । | महिषीक्षीरगुणाः | ५४६ | १३ | ||
| शोथस्य निदानम् | ५१९ | ४ | अजाक्षीणगुणाः | ५४७ | १ |
| शोथस्य भेदाः | ५१९ | ९ | उष्ट्रीक्षीरगुण | ५४७ | ४ |
| शोथानां वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५२० | २ | पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २१ । | ||
| शोथानां असाध्यलिङ्गानि | ५२१ | ८ | हंसोदकगुणाः | ५४८ | १ |
| ऋतुभेदेनोदकगुणाः | ५४८ | ४ | |||
| अप्रशस्तं जलं | ५४९ | १ | |||
| आन्तरिक्षजलगुणाः | ५४९ | ३ | |||
| देशभेदेन नदीगुणाः | ५४९ | ६ |
५७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| औद्भित्पदिजलगुणाः | ५४९ | ९ | नानाविधपशुपक्षिणां | ५५४ | २ |
| पानार्हं जलं | ५५० | १ | नानाविधजलचरमांसगुणाः | ५५६ | ३ |
| पानायोग्यं जलं | ५५० | ३ | मांसवर्गेषु श्रेष्ठाः प्राणिनः | ५५७ | ५ |
| भक्तादिमध्यान्तपीतजलगुणाः | ५५० | १२ | शरीरावयवेषु गुरुलघुत्वम् | ५५७ | ९ |
| शृतशीतजलगुणाः | ५५१ | १ | अवस्थाविशेषेण गुरुलघुत्वम् | ५५८ | १ |
| ऋतुभेदे पेयं जलं | ५५१ | ७ | शरीर-भोजन-देशादिविशेषेण | ५५८ | ४ |
| मांसगुणविशेषीयाध्यायः २२ । | देशसात्म्याध्यायः २३ । | ||||
| मांससामान्यगुणः | ५५२ | ३ | मध्यदेशः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ३ |
| मांसरसगुणाः | ५५२ | ८ | पूर्वदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ८ |
| संस्कारविशेषेण मांसगुणाः | ५५३ | ६ | दक्षिणदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५६० | ३ |
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॥ अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ॥
- अष्टाङ्गहृदयम्। अरुणदत्त कृत। सटिप्पण 'सर्वाङ्गसुन्दरी' तथा हेमाद्रिकृत 'आयुर्वेदरसायन' व्याख्या सहित। सम्पा. वैद्य हरिशास्त्र पराड़कर। (का. 315)
- सुश्रुत संहिता। श्रीडल्हणाचार्य विरचित निबन्धसंग्रहव्याख्या सहित। सम्पादक - यादवजीत्रिक्रमजी आचार्य (का. 316)
- चरक संहिता - महर्षि पुनर्वसुनोपदिष्टा, तच्छिष्येणाग्निवेशेन प्रणीता, चरकदृढ़बलाभ्यां प्रति संस्कृत श्री चक्रपाणिदत्त विरचितया आयुर्वेद दीपिका व्याख्या संवलिता। आचार्योपाह्वेन त्रिक्रमात्मजेन यादवशर्मणा संशोधिता (MIS 54)
- शार्ङ्गधर संहिता। शार्ङ्गधराचार्य प्रणीत। भिषग्वर आढमल्ल विरचित 'दिपिका' प. काशीनाथ वैद्य प्रणीत 'गूढार्थदीपिका' टीका एवं पण्डित परशुराम शास्त्री संशोधित। (MIS 44)
- माधवनिदानम्। माधवकर कृत। विजयरक्षित तथा कण्ठदत्त कृत 'मधुकोष' संस्कृत टीका तथा ब्रह्मशंकर शास्त्री कृत 'मनोरमा' हिन्दी टीका (का. 159)
- रसरत्नसमुच्चय। श्री वाग्भट्टाचार्य कृत। संस्कृत मूल, 'रसप्रभा' हिन्दी टीका, टिप्पणीयुक्त। डॉ. इन्द्रदेव त्रिपाठी। (चौ.सं.भ. 12)
- गदनिग्रहः। सोढ़ल कृत। इन्द्रदेव त्रिपाठी कृत 'विद्योतिनी' हिन्दी टीका। सं. गंगा सहाय पाण्डेय।
(1-3 भाग) सम्पूर्ण (का. 182) - गुणरत्नमाला। भावमिश्र कृत। डॉ. कैलाशपति पाण्डेय एवम् डॉ. अनुग्रह नारायण
सिंह कृत 'प्रकाश' हिन्दी व्याख्या व सम्पादन। प्राक्कथन आचार्य प्रियव्रत शर्मा कृत (चौ.सं.भ. 63) - चरक संहिता। अग्निवेश कृत। चरक एवं दृढ़बल संशोधित। 'चक्रपाणि दत्त' कृत 'आयुर्वेद दीपिका'
टीका तथा काशीनाथ शास्त्री कृत 'विद्योतिनी' हिन्दी टीका।
सं.-गंगासहाय पाण्डेय। प्रियव्रत शर्मा कृत भूमिका। (1-2 भाग) सम्पूर्ण (का. 194) - द्रव्यगुणसूत्रम्। (Aphorisms on Dravyaguna). डॉ. प्रियव्रत शर्मा कृत स्वोपज्ञभाष्य
(With English Translation) हिन्दी अनुवाद डॉ. सत्यदेव दूबे (चौ.सं.भ. 1) - वनौषधि चन्द्रोदय। चन्द्रराज भण्डारी कृत। (1-10) भाग 2 जिल्द में सम्पूर्ण (का. 161)
- सुश्रुत संहिता। महर्षि सुश्रुत कृत। अम्बिका दत्त शास्त्री आदि कृत 'आयुर्वेद तत्व
संदीपिका' हिन्दी टीकादि। पी. एम. मेहता कृत प्रस्तावना। (1-2 भाग) सम्पूर्ण (का. 156) - Encyclopaedic Dictionary of Ayurveda. by Dr. Kanjiv Lochan & Dr. P.S. Byadgi (MIS 36)
- Bhaisajya Ratnavali. Composed by Govinda Das Ji Bhisagratna. Commented upon Dr. Ambika Datta Shastri. Eng. Trans. Dr. Kanjiv lochan and Technically reviewed by Dr. Anand K. Choudhary (Vol. 1-3) Complete (C.S.B. 67)
- Rasendra Sara Sangrah of Sri Gopala Krishna Bhatt. Text with English Translation 'Parimita Bhodhini' Commentary & Appendix Dr. P. Suresh & Dr. D. Vinaya Kumari Dhannapuneni (C.S.B. 72)
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Vol. - I (Vikriti Vijnana) & Vol. - II (Roga Vijnana) (MIS 3)
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