काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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५६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषयः | पृ. | पं. | विषयः | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| वातगुल्मे षट्पलं घृतम् | १६८ | ६ | मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातगुल्मे शैशुकं घृतम् | १६९ | १ | मूत्रकृच्छ्रस्य संप्राप्तिः | १७७ | १ |
| गुल्मे संशोधनं | १६९ | ३ | दोषभेदेन मूत्रकृच्छ्रस्य लक्षणानि | १७७ | २ |
| गुल्मे भोजनम् | १६९ | ४ | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोर्विशेषः | १७८ | ८ |
| गुल्मे पिप्पल्यादिवटकाः | १६९ | ६ | मूत्रकृच्छ्रे कतिपययोगाः | १७९ | १ |
| वातगुल्मे हितमन्नपानम् | १६९ | १० | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोश्चिकित्सायां विशेषः | १७९ | ११ |
| वातगुल्मे बस्तिः | १६९ | १२ | सरक्ते मूत्रकृच्छ्रे ऊषकादियोगः | १७९ | १४ |
| वातगुल्मे हरीतकीप्रयोगः | १६९ | १३ | मूत्रकृच्छ्रेऽन्ये कतिपययोगाः | १८० | ३ |
| कुष्ठचिकित्साध्यायः ? । | शर्कराश्मर्योर्लक्षणं चिकित्सा च | १८० | १३ | ||
| कुष्ठपूर्वरूपाणि | १७१ | १ | द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातपित्तकफसन्निपातोत्तराणां कुष्ठानां लिङ्गानि | १७२ | १ | व्रणविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १८२ | ४ |
| दोषविशेषैः कुष्ठविशेषोत्पत्तिः | १७२ | ५ | कश्यपस्योत्तरम् | १८२ | ५ |
| कुष्ठेषु साध्यासाध्यविभागः | १७२ | ९ | निजागन्तुभेदेन व्रणस्य द्वैविध्यम् | १८३ | १ |
| कुष्ठानामाश्रयभूता धातवः | १७२ | १० | दोषभेदेन व्रणानां लिङ्गानि | १८३ | ४ |
| सिध्मस्य लक्षणम् | १७२ | ११ | व्रणानां नवविध उपक्रमः | १८४ | २ |
| विचर्चिकायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | दोषभेदेन व्रणोपक्रमाः | १८४ | ४ |
| पामायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणबन्धनविधिः | १८५ | १ |
| दद्रोः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणे कल्कदानम् | १८५ | ५ |
| किटिभस्य लक्षणम् | १७२ | १३ | पच्यमानव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| कपालस्य लक्षणम् | १७२ | १४ | पक्वव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| महारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १५ | तत्र चिकित्सा | १८६ | ४ |
| मण्डलस्य लक्षणम् | १७२ | १६ | व्रणे सवर्णकरणो योगः | १८७ | १ |
| विषजस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | व्रणे रोमसंजननो योगः | १८७ | ३ |
| पौण्डरीकस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | बालानामष्टौ पिडकाः | १८७ | ५ |
| श्वित्रस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | तासां नामानि | १८७ | ६ |
| ऋष्यजिह्वस्य लक्षणम् | १७२ | १८ | शराविका-कच्छपिका-जालिनी-सर्षपिकाऽ-लजीविनतानां लक्षणानि | १८७ | ७ |
| शतारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | विद्रध्याः लक्षणानि | १८७ | १० |
| औदुम्बरस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | अरुंषिकायाः लक्षणानि | १८७ | ११ |
| काकणस्य लक्षणम् | १७२ | २० | पिडकानां चिकित्सासूत्रम् | १८९ | २ |
| चर्मदलस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरुंषिकाणां चिकित्सा | १८९ | ३ |
| एककुष्ठस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरकीलिकाय लक्षणं चिकित्सा च | १९० | २ |
| विपादिकायाः लक्षणम् | १७२ | २१ | बालानामागन्तुव्रणचिकित्सा | १९१ | ७ |
| कुष्ठेषु दोषविशेषेण चिकित्सा | १७२ | २२ | बालानां दद्रोर्निदानं चिकित्सा च | १९१ | १२ |