भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५४९

सर्वाम्बु सद्यःपतितमप्रशस्तमनार्तवम् ।।
त ...................................... । ................................... रूदकम् ।।

सम्पूर्ण जल जो सद्यः पतित हों तथा बेमौसमी हों वे अप्रशस्त माने गये हैं। ..... वर्षा ऋतु के अतिरिक्त दूसरी ऋतुओं के आन्तरिक्ष जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी ऐसा कहा गया है॥

कफानिलकरं पित्ते हितं शीतातिकारकम्। रक्तापित्तहरं रूक्षमवश्यायोदकं लघु ।।
एतच्चतुर्विधं प्रोक्तं तत्त्वेनाम्भोऽन्तरिक्षजम्। सह .................................... ।।
............................................................... श्लेष्मप्रकोपनाः ।

अवश्याय (ओस) का जल, कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला है, पित्त में हितकर है, अत्यन्त शीतकारक है, रक्तपित्त को नष्ट करता है और रूक्ष तथा लघु है। यह आन्तरिक्ष जल चार प्रकार का कहा गया है। ........

वक्तव्य—यहां चार प्रकार के आन्तरिक्ष जलों में से केवल एक अवश्याय (ओस) जल का वर्णन मिलता है। शेष तीन का वर्णन उपलब्ध नहीं है। तत्संबंधी श्लोक खण्डित हैं अतः उनके विषय में निश्चय से कुछ नहीं कहा जा सकता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी चार प्रकार के आन्तरिक्ष जल का वर्णन मिलता है। कहा है—तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम्। तद्यथा—धारं कारं तौषारं हैममिति। अर्थात् जो धारारूप में वर्षा हो उसे ‘धार’ कहते हैं। यदि ओले गिरें तो उस जल को ‘कार’, ‘तुषार’ (Snow या ओस) के रूप में गिरने वाले जल को तौषार तथा हिम (बर्फ-Ice) के रूप में गिरने वाले जल को ‘हैम’ जल कहते हैं॥

क्षारोदाः प्राक्सृता नद्यः कफघ्नाः पित्तकोपनाः ।।
लघूदकाः प्रतीचीगा वातलाः कफनाशनाः । क्षारं ताभ्यस्तु सामुद्रं मधुरं गुरु पच्यते ।।
...................................................... । ........................ लवणं जलम् ।।

पूर्व की ओर बहने वाली नदियों का जल क्षारयुक्त होता है तथा वह कफनाशक और पित्तप्रकोपक होता है। पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के जल लघु, वातकारक तथा कफनाशक होते हैं। सामुद्रजल क्षारयुक्त, मधुर, गुरु ....... एवं लवणयुक्त होता है।

वक्तव्य—यहां भिन्न २ दिशाओं की ओर बहने वाली नदियों के जलों के गुण दिये गये हैं। चरक (सू. अ. २७), सुश्रुत (सू. अ. ४५), अष्टाङ्ग हृदय आदि ग्रन्थों में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है॥

साभिष्यन्दि स्वादुपाकि शीतं पित्तघ्नमौद्भिदम्।
सत्त्वक्लेदमलाद् दुष्टं पल्बलाम्बु गुरु स्मृतम् ।।
कषायमधुरं स्वादु विमलं सारसं जलम्। कौपं पि ................................ ।।
.................................................... । इत्यष्टधा जलं प्रोक्तं भूमिजं वृद्धजीवक ! ।।

औद्भिद जल के गुण—औद्भिद जल अभिष्यन्दि, स्वादुपाकी (मधुर विपाक वाला), शीतल तथा पित्तनाशक होता है। पल्वल का जल-पल्वल का जल सत्त्व, क्लेद तथा मल के कारण दूषित होता है तथा गुरु होता है। सरोवर का जल—सरोवर का जल कषाय, मधुर, स्वादु तथा निर्मल होता है। कूप का जल.... (खारा, पित्तकारक, कफनाशक, दीप लघु होता है—सुश्रुत के आधार पर यह अर्थ किया गया है) हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह आठ तरह का भौमजल कहा गया है।