काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| अजीर्णत्रिलक्षणम् | ४६ | ४ | विषूचिकाया लक्षणानि | ५१ | ६ |
| अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः | ४७ | १ | अलसकस्य लक्षणानि | ५१ | ७ |
| आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि | ४७ | २ | नेत्रामयानां लक्षणानि | ५२ | १ |
| कण्ड्वाः लक्षणानि | ५२ | २ | |||
| अजीर्णानां सामान्यलक्षणम् | ४७ | ३ | आमस्य पूर्वरूपाणि | ५२ | ४ |
| अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः | ४७ | ४ | पाण्डुरोगस्य लक्षणानि | ५२ | ६ |
| अजीर्णानां चिकित्सा | ४७ | ७ | कामलायाः लक्षणानि | ५२ | ७ |
| सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः | ४८ | ३ | मदात्ययस्य लक्षणानि | ५२ | ८ |
| वेदनाध्यायः २५ । | उरोघातस्य लक्षणानि | ५३ | १ | ||
| अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४८ | ८ | जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि | ५३ | ३ |
| ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि | ५३ | ४ | |||
| कश्यपस्योत्तरम् | ४९ | १ | बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि | ५३ | १३ |
| शिरोरुजाया लक्षणम् | ४९ | २ | बालरोगाणामुपक्रमाः | ५४ | ३ |
| कर्णवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ३ | चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ । | ||
| मुखामयस्य लक्षणम् | ४९ | ४ | चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः | ५४ | ६ |
| कण्ठवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ५ | भिषजो गुणाः | ५५ | ३ |
| अधिजिह्विकायाः लक्षणम् | ४९ | ६ | भेषजसंपत् | ५५ | ७ |
| गलग्रहस्य लक्षणम् | ४९ | ७ | आतुरसंपत् | ५६ | १ |
| कण्ठश्वयथोः लक्षणम् | ४९ | ७ | परिचारकसंपत् | ५६ | ४ |
| ज्वरपूर्वरूपाणि | ४९ | ८ | चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम् | ५७ | १ |
| अतिसारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | २ | रोगाध्यायः २७ । | ||
| शूलिनो बालस्य लक्षणानि | ५० | ३ | रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि | ५८ | ३ |
| छर्देः पूर्वरूपाणि | ५० | ४ | रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः | ५८ | ९ |
| श्वासस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | रोगाणां अधिष्ठानद्वयम् | ५८ | १० |
| हिक्कायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम् | ५८ | ११ |
| तृष्णायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ६ | रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः | ५९ | २ |
| आनाहस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ७ | वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि | ५९ | ३ |
| अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ८ | निजागन्तुरोगयोर्विशेषः | ६० | १ |
| उन्मादस्य रूपाणि | ५० | ८ | ओजसः स्वरूपम् | ६० | ३ |
| मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि | ५० | ९ | ओजसो वर्धनानि | ६१ | १ |
| प्रमेहस्य रूपाणि | ५१ | १ | वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम् | ६१ | २ |
| अर्शसां रूपाणि | ५१ | ३ | आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम् | ६१ | ३ |
| अश्मर्याः रूपाणि | ५१ | ४ | अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः | ६१ | ४ |
| विसर्पस्य पूर्वरूपाणि | ५१ | ५ | वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च | ६३ | १ |