भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 876 में से

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द्वितीय लम्बक १२९ पुत्र के उत्पन्न होते ही मृगावती के चित्त को आश्चर्य और हर्ष देनेवाली आकाशवाणी हुई—'यह उदयन नाम का महायशस्वी राजा उत्पन्न हुआ है। इस (रानी) का बालक समस्त विद्याधरों का राजा होगा' ॥६९-७०॥ तब वह बालक उदयन उस तपोवन में अपने साथ उत्पन्न हुए मित्रों के समान सद्गुणों के साथ-साथ बढ़ने लगा ॥७१॥ जमदग्नि ऋषि ने उसके सभी क्षत्रियोचित संस्कार करने के अनन्तर उसे सभी विद्याओं में और धनुर्वेद (शस्त्रविद्या) में शिक्षित किया ॥७२॥ उसकी माता मृगावती ने स्नेह के कारण सहस्रानीक के नाम से अंकित कंकण (हाथ के कड़े) को अपने हाथ से निकालकर उसके हाथ में पहना दिया ॥७३॥ किसी समय हिरण के शिकार के प्रसंग में घूमते हुए उदयन ने जंगल में एक शबर¹ (एक भील) के द्वारा बलपूर्वक पकड़े हुए सर्प को देखा ॥७४॥ उस सुन्दर सर्प पर दयालु होकर उदयन ने किरात (शबर) से कहा—'मेरे कहने से तुम इस साँप को छोड़ दो' ॥७५॥ तब उस जंगली ने कहा—'स्वामी यह मेरी जीविका का साधन है। मैं अत्यन्त निर्धन व्यक्ति हूँ। 'साँपों को खेलाता हुआ जीवित रहता हूँ ॥७६॥ पहले सर्प के मर जाने के कारण मैंने सारे जंगल में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बड़ी कठिनाई और मन्त्र तथा ओषधि के बल से इसे पाया और पकड़ा है' ॥७७॥ सँपेरे की बात सुनकर त्यागी उदयन ने माता का दिया हुआ कड़ा सँपेरे को (साँप के बदले में) दे दिया और उसने साँप को छोड़ दिया ॥७८॥ कंकण लेकर सँपेरे के चले जाने पर प्रसन्न वह सर्प उदयन के सम्मुख मनुष्य-रूप में खड़ा होकर प्रणाम करके कहने लगा ॥७९॥ 'मैं वसुनेमि नामक नाग वासुकि नाग का बड़ा भाई हूँ तुमने मेरी रक्षा की है अतः मुझसे अत्यन्त रमणीय स्वरवाली और श्रुतिमात्रों से विभक्त यह वीणा ग्रहण करो। साथ ही कभी न कुम्हलानेवाली यह माला तथा तिलक-युक्ति के साथ कभी न सूखनेवाली यह पान की लता भी ग्रहण करो ॥८०-८१॥ उदयन उस वीणा को लिये हुए माता की आँखों में मानों अमृत बरसाते हुए जमदग्नि के आश्रम में आया ॥८२॥ इस बीच वह सँपेरा भी जंगल में घूमता-घामता दैवयोग से उदयन द्वारा प्राप्त उस सुन्दर कंकण को बाजार में बेचता हुआ पकड़ा गया ॥८३॥ १ 'शबर' एक प्रकार की जाति है, जिसे सँपेरा भी कहते हैं। १७

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