भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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पंचम लम्बक ५०१

बीच-बीच में उस पेटी का खोलकर माधव पुरोहित के मन को इस प्रकार ललचाता रहा जैसे घास दिखा-दिखाकर पशु को ललचाया जाता है ॥१३४॥

कुछ दिनों पश्चात् पुरोहित के विश्वस्त होजाने पर माधव ने भोजन कम करके अपने को जान-बूझकर अत्यन्त दुर्बल बना लिया ॥१३५॥

कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार उसकी शय्या के पास बैठे हुए पुरोहित को धूर्तराज माधव ने क्षीण स्वर में कहा—॥१३६॥

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरे शरीर की दशा दिनानुदिन बिगड़ती जा रही है। इसलिए तुम किसी अच्छे सत्पात्र ब्राह्मण को लाओ ॥१३७॥

जिस मैं इहलोक और परलोक के कल्याणार्थ अपना सब कुछ दान कर दूँ। महान् व्यक्ति इस अस्थिर जीवन में धन के प्रति श्रद्धा या प्रेम नहीं रखते ॥१३८॥

दान से जीविन रहनेवाला लालची पुरोहित माधव के इस प्रकार कहने पर उससे बोला कि 'ऐसा ही करूँगा'।—पुरोहित के ऐसा कहने पर वह धूर्त माधव उसके पैरों पर गिर पड़ा ॥१३९॥

तदनन्तर पुरोहित जिस-जिस ब्राह्मण को उसके पास लाता उसे माधव किसी विशेष कारण से अयोग्य बता देता ॥१४०॥

यह देखकर माधव के पास बैठा हुआ उसका साथी एक धूर्त उस पुरोहित से बोला— 'इनको साधारण ब्राह्मण पसन्द नहीं आते। इसलिए शिप्रा नदी के किनारे शिव नाम का एक ब्राह्मण आजकल रहता है। वह इन्हें भाता है या नहीं देखो। यह सुनकर दुःखी मुँह बनाकर माधव पुरोहित से बोला— 'हाँ हाँ कृपा करके उसी ब्राह्मण को ले आओ। उसके समान ब्राह्मण दूसरा नहीं है' ॥१४१—१४३॥

माधव से इस प्रकार कहा गया राजपुरोहित शिव के पास गया और वहाँ उसने शिव को कपट ध्यान-मुद्रा में निश्चल बैठा देखा ॥१४४॥

यह देखकर पुरोहित उसकी प्रदक्षिणा करके उसके आगे नम्र होकर बैठ गया। उस धूर्त शिव ने भी धीरे-धीरे आँखें खोलकर उसकी ओर देखा ॥१४५॥

तब पुरोहित ने झुककर प्रणाम किया और कहा—'हे प्रभु, यदि आप क्रोध न करें, तो कुछ निवेदन करूँ' ॥१४६॥

पुरोहित से यह सुनकर शिव ने अपने ओठों को उठाकर संकेत करते हुए उसे कहने की आज्ञा दी। तदनन्तर पुरोहित इस प्रकार कहने लगा—॥१४७॥