भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम स्तम्बक ५५ विवाह होने के तीसरे दिन पुरोहित द्विज को कपट से बीमार बने हुए माधव के पास ले गया ॥१६२॥ 'बहुश्रुत तप करनेवाले आपको प्रणाम करता हूँ'—इन शब्दों से माधव ने द्विज का अभिवादन करके और उठकर उसके चरणों का स्पर्श किया ॥१६३॥ और पुरोहित ने स्वयं खजाने से निकालकर मरकती माणिक आदि रत्नों के आभूषणों और रत्नों से भरी हुई पेटी उसे दे दी ॥१६४॥ द्विज ने भी उसे लेकर पुनः पुरोहित को सौंप दिया और पुरोहित ने भी यह कहकर उसे ले लिया कि 'यह तो मैंने पहले ही स्वीकार कर लिया है तुम्हें इसकी क्या चिन्ता है' इस प्रकार आशीर्वाद देकर द्विज के अपने शयनागार में चले जाने पर पुरोहित ने उस रत्नपेटी को तुरन्त अपने खजाने में रख दिया ॥१६५-१६७॥ दूसरे दिन माधव भी अपनी दुर्बलता को छोड़कर महादान के प्रभाव से स्वस्थ होने का ढोंग रचने लगा ॥१६८॥ 'तुमने मेरे धर्म-कार्य में सहायता देकर मेरा बहुत बड़ा उपकार किया'—इस प्रकार रात में आये हुये पुरोहित की प्रशंसा करने लगा ॥१६९॥ 'द्विज जैसे तपस्वी के प्रभाव से मेरा शरीर स्वस्थ हो गया। मैं बच गया' इस प्रकार कहकर उसने द्विज के साथ प्रकट रूप से मित्रता कर ली ॥१७०॥ कुछ दिनों के पश्चात् द्विज ने भी पुरोहित से कहा—'मैं इस प्रकार कितने दिनों तक तुम्हारे यहाँ भोजन करता रहूँगा इसलिए तुम ही दान में दिये माल का मूल्य चुकाकर उन आभूषणों और रत्नों को क्यों नहीं ले लेते। यदि माल अधिक द्रव्य का हो तो यथासंभव इस समय जो दे सकते हो वही देदो' ॥१७१॥-॥१७२॥ यह सुनकर और उस माल को बहुमूल्य या अमूल्य समझकर पुरोहित ने उस माल का कुछ मूल्य दे दिया ॥१७३॥ और इसकी दृढ़ता के लिए द्विज से हस्ताक्षर कराकर उसका प्रमाण-पत्र भी राज- पुरोहित ने ले लिया। इस प्रकार, पुरोहित ने उसके धन से अपने धन को बढ़ा लिया ॥१७४॥ इसी प्रकार दोनों ने परस्पर लिखित रूप से धन ले-देकर प्रमाणपत्र लिख दिये और अलग-अलग हो गये। द्विज ने भी अपना अलग घर बसा लिया ॥१७५॥ १४