भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 608

विष्णुदत्त से इस प्रकार एकान्त रात्रि में परम कथा सुनकर उस शक्तिदेव ने हृदय में कनकपुरी देखने की अभिलाषा रखते हुए धैर्य के साथ वह रात्रि व्यतीत की ॥२९८॥ द्वितीय तरंग समाप्त

तृतीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान तदनन्तर उस उत्स्थल द्वीप के मठ में ठहरे हुए शक्तिदेव के समीप नाविकों का सरदार सत्यव्रत आया ॥१॥ उसने पहले ही शक्तिदेव से कनकपुरी का पता लगाने की प्रतिज्ञा की थी। इसीलिए उसने आकर शक्तिदेव से कहा—'हे ब्राह्मणदेव मैने तुम्हारी इष्ट-सिद्धि का एक उपाय सोचा है ॥२॥ समुद्र के मध्य रत्नकूट नाम का एक द्वीप है। उसमें समुद्र में भगवान् विष्णु की स्थापना की है॥३॥ आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को वहाँ यात्रा का मेला लगता है। उस अवसर पर भगवान् विष्णु के पूजन के लिए सभी द्वीपों से यात्री आते हैं ॥४॥ वहाँ जाने पर सम्भव है कि किसी यात्री से उस कनकपुरी का पता लग सके। इसलिए चलो वहीं चलें। वह तिथि (द्वादशी) भी समीप ही है॥५॥ सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव ठीक है ऐसा कहकर चलने को उद्यत हुआ और विष्णुदत्त द्वारा बनाया गया पाथेय उसने साथ ले लिया ॥६॥ तदनन्तर वह सत्यव्रत के चलाए हुए जहाज में उसी के साथ शीघ्र ही समुद्री मार्ग से चला गया ॥७॥ टापुओं के समान बड़े-बड़े मत्स्यों से भरे हुए और आश्चर्यों के भवन उस समुद्र में जाते हुए उसने नाव को ले जाते हुए सत्यव्रत से पूछा कि 'यहाँ से दूर पर महँगा निकला हुआ पक्ष-सहित पर्वत के समान वह क्या दीख रहा है? ॥८-९॥