भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम लम्बक ५५५ यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—वह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनेवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाल उस स्थान को छोड़कर चलते हैं, क्योंकि उस भँवर म पड़ हुए लोग फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत ने शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है । ॥१३॥ क्योकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्य-मुख के समान इस गहरे भँवर म पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्य का दुख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है ? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही उस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यस्वामी सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक बड़ी शाखा पकड़ ली ॥१९-२ ०॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से वडवानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐस अवसर पर धीरप्रवर सत्यव्रत को भी खो दिया। मर्त्य के सिर पर पैर रखकर गई अविभव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥