कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] पंचम लम्बक ५९७
वह शक्तिवेग भी अब राजा बनकर अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्याधर-लोक की पताका के समान कनकपुरी में आ गया॥२८४॥ विद्याधराधिप वह शक्तिवेग मानों अत्यन्त ऊँची होने से नीचे गिरती हुई सूर्य-किरणों के समान सोने की रचना से चमचमाती हुई प्रासाद श्रृंखलाओंवाली कनकपुरी में उन चारों प्रियतमाओं के साथ रत्नजड़ित सीढ़ियोंवाली उद्यान-वावलियों में अत्यन्त मुग्ध और आनन्द लेने लगा॥२८५॥ वाक्पटु शक्तिवेग इस प्रकार अपना विचित्र चरित्र वत्सराज को सुनाकर फिर बोला-॥२८६॥ हे वत्स्य भूपाल वत्सराज तुम मुझ उसी शक्तिवेग को उत्पन्न हुए अपने नये चक्रवर्ती पुत्र के चरणकमलों के दर्शन का अधिकारी समझो॥२८७॥ इस प्रकार मनुष्य होकर भी मैंने शिवजी की कृपा से विद्याधरों की प्रभुता प्राप्त की है। अब मैं अपने स्थान को जाता हूँ। बाल-रामा का रक्षण कर लिया। आपका सर्वदा मंगल हो॥२८८॥ इस प्रकार प्रणाम कर जाने की आज्ञा प्राप्त करके चन्द्रमा के समान तेजस्वी शक्तिदेव के आकाश में उड़ जाने पर महारानियों मन्त्रियों और पिता के साथ वत्सराज ने अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया॥२८९॥ तृतीय तरङ्ग समाप्त चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक समाप्त