कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक १४१ वरण करने के लिए ही मानों नेत्रकमलों की माला उसके शरीर पर डालती हुई कन्या सुलोचना ने उसे प्रणाम किया ॥७९॥ सुर और असुरों के लिए भी असह्य कामदेव की आज्ञा से वश किये गये उसने भी पति को प्राप्त करो—ऐसे आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन किया ॥८० ॥ मुनि के असाधारण सौन्दर्य से सटी हुई अतएव लज्जा के कारण मुंह नीचे को हुई उस कन्या ने मुनि से इस प्रकार कहा—देव यदि यह आपकी सच्ची इच्छा है, हँसी या विनोद की बात नहीं है तो आज मेरे दाता पिता से मुझे मांगो ॥८१॥ इसके पश्चात् उसका कुल गोत्र परिचय आदि पूछकर उस मुनि ने जाकर उसके पिता नृपति से उसे माँगा ॥८२॥ उस राजा ने भी शरीर और तप से अत्यन्त उच्चकोटि पर पहुँचे हुए उस मुनिकुमार को देखकर उसका आतिथ्य-सत्कार करके कहा ॥८३॥ 'भगवन् ! यह मेरी कन्या रम्भा नामक अप्सरा से उत्पन्न हुई है। इसके विवाह से स्वर्ग में मेरा और रम्भा का पुनः समागम होगा ॥८४॥ स्वयं जाती हुई रम्भा ने ऐसा मुझसे कहा है—यह कैसे सम्भव हो इस पर आप विचार कीजिए' ॥८५॥ यह सुनकर मुनि क्षण-भर के लिए विचारमग्न हो गया और सोचने लगा। क्या पहले समय में मेनका से उत्पन्न अप्सरा प्रमद्वरा जब साँप के काटने से मर गई, तब रुरु ऋषि ने अपने आयुष्य का आधा भाग देकर उसे जीवित नहीं कर दिया था ? क्या विश्वामित्र ने चांडाल त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में नहीं पहुँचा दिया था ? तो क्या मैं अपने तप के कुछ भाग का व्यय करके यह कार्य नहीं कर सकता ? ऐसा सोचकर मुनि ने राजा से कहा—'यह कोई बड़ा भार नहीं है ॥८६-८७॥ 'हे देवगण यह राजा मेरे तप के अंश से रम्भा के साथ सम्भोग प्राप्त करने के लिए सशरीर स्वर्ग को जाय'॥ ॥ उस मुनि के ऐसा कहने पर और सारी सभा के सुनते रहने पर आकाशवाणी हुई— 'ऐसा ही हो' ॥ १॥ तब वह राजा उस सुलोचना नाम की कन्या को मुनि कश्य के लिए देकर स्वयं चला गया ॥ २॥ वहाँ देवत्व प्राप्त करके इन्द्र द्वारा नियत की गई प्रभावशालिनी रम्भा के साथ वह रमण करने लगा ॥ ३॥ ८१