कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक १४१
षष्ठ लम्बक १४१ वरण करने के लिए ही मानों नेत्रकमलों की माला उसके शरीर पर डालती हुई कन्या सुलोचना ने उसे प्रणाम किया ॥७९॥ सुर और असुरों के लिए भी असह्य कामदेव की आज्ञा से वश किये गये उसने भी पति को प्राप्त करो—ऐसे आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन किया ॥८० ॥ मुनि के असाधारण सौन्दर्य से सटी हुई अतएव लज्जा के कारण मुंह नीचे को हुई उस कन्या ने मुनि से इस प्रकार कहा—देव यदि यह आपकी सच्ची इच्छा है, हँसी या विनोद की बात नहीं है तो आज मेरे दाता पिता से मुझे मांगो ॥८१॥ इसके पश्चात् उसका कुल गोत्र परिचय आदि पूछकर उस मुनि ने जाकर उसके पिता नृपति से उसे माँगा ॥८२॥ उस राजा ने भी शरीर और तप से अत्यन्त उच्चकोटि पर पहुँचे हुए उस मुनिकुमार को देखकर उसका आतिथ्य-सत्कार करके कहा ॥८३॥ 'भगवन् ! यह मेरी कन्या रम्भा नामक अप्सरा से उत्पन्न हुई है। इसके विवाह से स्वर्ग में मेरा और रम्भा का पुनः समागम होगा ॥८४॥ स्वयं जाती हुई रम्भा ने ऐसा मुझसे कहा है—यह कैसे सम्भव हो इस पर आप विचार कीजिए' ॥८५॥ यह सुनकर मुनि क्षण-भर के लिए विचारमग्न हो गया और सोचने लगा। क्या पहले समय में मेनका से उत्पन्न अप्सरा प्रमद्वरा जब साँप के काटने से मर गई, तब रुरु ऋषि ने अपने आयुष्य का आधा भाग देकर उसे जीवित नहीं कर दिया था ? क्या विश्वामित्र ने चांडाल त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में नहीं पहुँचा दिया था ? तो क्या मैं अपने तप के कुछ भाग का व्यय करके यह कार्य नहीं कर सकता ? ऐसा सोचकर मुनि ने राजा से कहा—'यह कोई बड़ा भार नहीं है ॥८६-८७॥ 'हे देवगण यह राजा मेरे तप के अंश से रम्भा के साथ सम्भोग प्राप्त करने के लिए सशरीर स्वर्ग को जाय'॥ ॥ उस मुनि के ऐसा कहने पर और सारी सभा के सुनते रहने पर आकाशवाणी हुई— 'ऐसा ही हो' ॥ १॥ तब वह राजा उस सुलोचना नाम की कन्या को मुनि कश्य के लिए देकर स्वयं चला गया ॥ २॥ वहाँ देवत्व प्राप्त करके इन्द्र द्वारा नियत की गई प्रभावशालिनी रम्भा के साथ वह रमण करने लगा ॥ ३॥ ८१
कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर इत्थ कृतार्थतां देव ! सुषेणः प्राप कन्यया। कन्या युष्मादृशां गेहेष्वीदृश्याऽवतरन्ति हि ॥९४॥ तदषा कापि दिव्या ते जाता शापच्युता गृहे। कन्या नूनमतो मा गाः शुचं तज्जन्मना विभो ॥९५॥ इति श्रुत्वा कथां राजा गृहवृद्धाद्विजन्मनः। कलिङ्गदत्तं नृपतिर्जहौ चिन्तां सुतोष च ॥९६॥ तां स चक्रे निजसुता नयनानन्ददायिनीम्। नाम्ना कलिङ्गसेनेति बालामिन्दुकलोपमाम् ॥९७॥ सापि तस्य पितुर्गेहे राजपुत्री शनैः क्रमात्। कलिङ्गसेना ववृधे वयस्यामध्यवर्तिनी ॥९८॥ विजहार च हर्म्येषु सा गृहेषु वनेषु च। क्रीडारसमयस्येव लहरी शैशवाम्बुधेः ॥९९॥ कलिङ्गसेना सखित्वे सोमप्रभाया आगमनम् कदाचिदथ हर्म्यस्थां केलिसक्तां ददर्श ताम्। मयासुरसुता यान्ती व्योम्ना सोमप्रभाभिधा ॥१००॥ सा तामालोक्य रूपेण मुनिमानसमोहिनीम्। सोमप्रभा नभःस्थैव जातप्रीतिरचिन्तयत् ॥१०१॥ सेयं किमेन्दवी मूर्तिः कान्तिस्तस्या दिवा कुतः। रतिर्वा यदि कामः क्व कन्यका तदवैम्यहम् ॥१०२॥ अत्र राजगृहे कापि दिव्या शापच्युता भवेत्। जाने जन्मान्तरे चाभून्नूनं सख्यं ममैतया ॥१०३॥ एतद्धि मे यदस्यामस्तिस्नेहाह्वयं मनः। तद्युक्तं कत्तुमेतां मे स्वयवरसगीं पुनः ॥१०४॥ इति सञ्चिन्त्य याणायास्तस्या नेत्राभनन्दूया। सोमप्रभा सा गगनादङ्गणितमवातरत् ॥१०५॥ मनुष्यकन्यकाभावमाश्रित्येवाप्तकारणम् । सास्या कलिङ्गसेनायाः शनैरुपससर्प च ॥१०६॥ दृष्ट्वा राजसुता सापि स्वयमप्यद्भूताकृतिः। अमी गतागता पार्श्वमचितयं शशी मम ॥१ ०७॥ इति सहर्शनानेव विविस्मयोत्थाय चादरात्। वलिङ्गमवाप्यामिन्द्रसा तां सोमप्रभां तदा ॥१०८॥
षष्ठ लम्बक ६४३
षष्ठ लम्बक ६४३ इसी प्रकार वे दिव्य रमणियाँ तुम्हारे समान पुरुषों के घरों में अवतार लेती हैं ॥ ९४ ॥ 'हे देव सुषेण इसी प्रकार कन्या के कारण ही सफल हुआ। आपके समान उच्च महा पुरुषों के यहाँ ऐसी ही कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। अतः यह कन्या भी कोई दिव्य स्त्री है जो शापच्युत होकर तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है। इसलिए हे स्वामी ! चिन्ता न करो' ॥ ९५ ॥ इस प्रकार घर के वृद्ध ब्राह्मण द्वारा कही गई कथा को सुनकर राजा कलिङ्गदत्त चिन्ता छोड़कर प्रसन्न हुआ ॥ ९६॥ उस राजा ने चन्द्रकला के समान आँखों को आनन्द देनेवाली उस कन्या का नाम कलिङ्गसेना रखा ॥ ९७ ॥ वह राजकुमारी कलिङ्गसेना अपनी सखियों के साथ क्रमशः बड़ी होने लगी ॥ ९८ ॥ क्रीड़ा करते बालसमुदाय की लहरी के समान वह कन्या पिता के गृह में भवन में घरों में और उद्यानों में बिहार करती थी ॥ ९९ ॥ कलिङ्गसेना के पास सोमप्रभा का आगमन एक बार वह कलिङ्गसेना राजभवन की छत पर खेल रही थी। उसी समय आकाश- पथ से जाती हुई मायासुर की बेटी सोमप्रभा ने उसे उड़ते-उड़ते देखा और दूर से देखते ही उससे उसका प्रेम हो गया ॥ १ १ ॥ सोमप्रभा उसे देखकर सोचने लगी 'क्या यह चन्द्रकला है ? किन्तु दिन में उसकी इतनी कान्ति कहाँ ! यदि यह रति है, तो काम कहाँ है ? अतः यह अवश्य ही अभी कुमारी है ऐसा समझती हूँ ॥ १ २॥ सम्भव है कि कोई दिव्य स्त्री शाप से पतित होकर राजघराने में उत्पन्न हुई हो। मैं समझती हूँ कि पूर्वजन्म में इसकी और मेरी मित्रता रही है ॥ १ ३॥ क्योंकि अत्यन्त स्नेह से व्याकुल मेरा मन बरबस इसकी ओर खिंच रहा है। तो अब यह उचित है कि मैं इससे स्वयं मिलकर सखी के रूप में इसका वरण करूँ ॥ १ ४॥ सोमप्रभा यह सोचकर कि बालिका भयभीत न हो अप्रत्यक्ष रूप से नीचे उतर आई ॥ १ ५॥ उसके विश्वास के लिए वह मनुष्य-कन्या का रूप बनाकर धीरे-धीरे कलिङ्गसेना के पास पहुँची ॥ १ ६॥ 'दैवयोग से यह कोई अद्भुत रूपवाली राजकुमारी मेरे पास आ रही है यह मेरी सखी होने के योग्य है'—ऐसा सोचकर उसे देखते ही वह कलिङ्गसेना भी उठकर उससे लिपट गई ॥ १ ७-१ ८॥
ततः कथाक्रमेणैव वाचा सख्यमबध्यत।
उपवेश्य च पप्रच्छ क्षणादन्वयनामनी। वक्ष्यामि सखि तिष्ठेति तां च सोमप्रभाब्रवीत् ॥१०९॥ ततः कथाक्रमेणैव वाचा सख्यमबध्यत। ताभ्यामुभाभ्यामन्योन्यहस्तग्रहपुरःसरम् ॥११०॥ अथ सोमप्रभावादीत्सखि त्वं राजकन्यका। राजपुत्रैः समं सख्यं कृच्छ्रादप्यतिवाह्यते ॥१११॥ अल्पेनाप्यपराधेन ते हि कुप्यन्त्यमात्रया। राजपुत्रवणिग्पुत्रकथां शृण्वत्र वच्मि ते ॥११२॥
राजपुत्रवैश्यपुत्रयोः कथा
नगर्यां पुष्करावत्यां गूढसेनाभिधो नृपः। आसीत्तस्य च जातोऽभूदेक एव किलात्मजः ॥११३॥ स राजपुत्रो दृप्तः सन्नेकपुत्रतया भृशम्। अशुभं वापि यच्चक्रे पिता तस्यासहिष्ट तत् ॥११४॥ भ्राम्यन्नुपवने जातु दृष्टस्तेनैकपुत्रकः। वणिजो ब्रह्मदत्तस्य स्वतुल्यविभवाकृतिः ॥११५॥ दृष्ट्वा च सद्यः सोऽनेन स्वयंवृतसुहृत्कृतः। तयोश्च चैकरूपौ तौ जाता राजवणिग्सुतौ ॥११६॥ स्यातुं न शेकतुः क्षिप्रं तावन्योन्यमदर्शनम्। आशु बध्नाति हि प्रेम प्राग्जन्मान्तरसंस्तवः ॥११७॥ नोपभुङ्क्ते स्म तं भोगं राजपुत्रः कदाचन। वणिग्पुत्रस्य यस्तस्य नान्नेवोपकरिष्यतः ॥११८॥ एकदा सुहृदस्तस्य निश्चित्योद्वाहमादितः। अहिच्छत्रं विवाहाय स प्रतस्थे नृपात्मजः ॥११९॥ मित्रेण तेन सार्धं च गजारूढः ससैनिकः। गच्छन्विशमतीतीरं प्राप्य सायं समाससत् ॥१२०॥ तत्र चन्द्रोदये पानमासेव्य शयनं स्थितः। अर्थितो निजया धात्र्या कथां वक्तुं प्रचक्रमे ॥१२१॥ उपशान्तकथां जह्रौ धात्रीं मत्तश्च निद्रया। धात्री च तद्वत्सोऽप्यासीत् स्नेहाज्जाग्रद्वणिग्सुतः ॥१२२॥ ततः सुप्तेषु वार्येषु स्त्रीणामिव मिथः कथा। गगने शुश्रुवे तेन वणिग्पुत्रेण जाग्रता ॥१२३॥
षष्ठ लम्बकः ६४५
षष्ठ लम्बकः ६४५ तदनन्तर उसे अपने पास बैठाकर उससे उसका कुल और नाम आदि पूछने लगी। उत्तर में सोमप्रभा ने कहा 'सब कहती हूँ ठहरो। एवंक्रमेण उन दोनों की बात ही बात में मित्रता हो गई। यह मित्रता दोनों ने परस्पर हाथ से हाथ मिलाकर की॥११११॥ तब सोमप्रभा ने कहा—'सखि तुम तो राजकुमारी हो। राजसन्तानों के साथ मित्रता करना कठिन कार्य है। वे लोग छोटे-से ही अपराध से अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं। इस विषय में राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा कहती हूँ सुनो॥१११-११२॥ एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा पुष्करावती नगरी में गृहसेन नाम का राजा था। उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह घमंडी राजकुमार, जो भी भला या बुरा करता था राजा उसे सहन करता था क्योंकि वह उसका एकमात्र बालक था॥११३॥ किसी समय उद्यान में भ्रमण करते हुए राजकुमार ने अपने ही समान रूप और वयवाले उसे दत्त नामक बनिये के पुत्र को देखा। उसे देखते ही राजकुमार ने स्वयं वरण किया हुआ मित्र बना लिया तभी से राजपुत्र और वैश्यपुत्र दोनों एकरूप (अभिन्न मित्र) हो गये॥११४-११६॥ उन दोनों में एक दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकता था। पूर्व जन्म का संचित प्रेम शीघ्र ही बाँध लेता है॥११७॥ राजपुत्र ऐसी किसी भी वस्तु का उपभोग नहीं करता था जिसके कि एक भाग को वैश्य पुत्र के लिए नहीं रख लेता था॥११८॥ एक बार उस मित्र का विवाह पहले ही निश्चित करके वह राजकुमार अपने विवाह के लिए अहिच्छत्रा नगरी को चला॥११९॥ उस मित्र के साथ हाथी पर सवार सैनिकों से युक्त राजकुमार यात्रा करते हुए सायंकाल इक्षुमती नदी के तट पर ठहर गया॥१२०॥ वहाँ चन्द्रोदय होने पर मद्यपान करके शय्या पर लेटा हुआ राजकुमार, अपनी सेविका से प्रार्थना किये जाने पर कहानी सुनाने लगा॥१२१॥ मद्य से आक्रान्त राजकुमार कहानी प्रारम्भ करते ही निद्रामग्न हो गया। किन्तु सेविका और वह वैश्यपुत्र दोनों स्नेह के कारण जागते रह गये॥१२२॥ तदनन्तर सब के सो जाने पर वैश्यपुत्र जागता रह गया और उसने आकाश में स्त्रियों की धी बातें सुनी॥१२३॥
१४६ कथासरित्सागर
१४६ कथासरित्सागर अनाख्याय कथां सुप्तः पापोऽयं तञ्छपाम्यहम्। परिदृश्यत्यसौ हारं प्रातस्तं चेद् ग्रहीष्यति॥१२४॥ कण्ठलग्नेन तेनैष तत्क्षणं मृत्युमाप्स्यति। इत्युक्त्वा विररामैका द्वितीया च ततोऽब्रवीत्॥१२५॥ अतो यद्ययमुत्तीर्णस्तद्व्रक्ष्यत्याग्रपादपम्। बियोक्ष्यते फलान्यस्य सद्यः प्राणैर्विमोक्ष्यते॥१२६॥ इत्युक्त्वा व्यरमत्सापि तृतीयाभिबधे ततः। यद्येतदपि तीर्णोऽस्य तद्विवाहकृते गृहम्॥१२७॥ प्रविशन्नेतदेवास्त्य हस्तु पृष्ठे पतिष्यति। उक्तेति न्यवृत्तसापि चतुर्थी व्याहरत्ततः॥१२८॥ अतोऽपि यदि निस्तीर्णस्तद्भक्तं वासवेश्मनि। प्रविष्टः शतकृत्वोऽयं क्षुतं सद्यः करिष्यति॥१२९॥ शतकृत्वोऽपि यद्यस्य जीवेति न वदिष्यति। कश्चिदत्र ततश्चैव मृत्योर्वशमुपैष्यति॥१३०॥ येन चैव श्रुतं सोऽस्य रक्षार्थं यदि वक्ष्यति। तस्यापि भविता मृत्युरित्युक्त्वा सा न्यवर्त्तत॥१३१॥ वणिक्सुतश्च तत्सर्वं श्रुत्वा निर्घातदारुणम्। स तस्य राजपुत्रस्य स्नेहोद्विग्नो व्यचिन्तयत् ॥१३२॥ उपक्रन्तामनाख्यातां धिक्कथां यद्यरुक्षिताः। देवताः श्रोतुमायाताः सपन्त्यस्तु कुतूहलात्॥१३३॥ स्रवेत्तस्मिन्मृते राजसुते कोऽर्थो ममासुभिः। अतोऽयं रक्षणीयो मे युक्त्या प्राणसमः सुहृत्॥१३४॥ वृत्तान्तोऽपि न वाच्योऽस्य मा भूद्द्रोषो ममाप्यतः। इत्यालोच्य निशां निन्ये स कृच्छ्रेण वणिक्सुतः॥१३५॥ राजपुत्रोऽपि स प्रातः प्रस्थितस्तत्सखः पथि। ददर्श पुरतो हारं तमादातुमिषेष च॥१३६॥ ततोऽब्रवीद् वणिक्पुत्रो हारं मास्म ग्रहीः सखे। मायैयमन्यथा नैते पदयेयुः सैनिकाः क्वचित्॥१३७॥
षष्ठ लम्बक १४७
षष्ठ लम्बक १४७ 'यह दुष्ट राजपुत्र कहानी कहे बिना ही सो गया। अतः मैं इसे शाप देती हूँ कि यह प्रातःकाल एक हार देखेगा उसे देखकर यदि ले लेगा तो गले में डालते ही इसकी मृत्यु हो जायगी। इतना कहकर एक स्त्री चुप हो गई और दूसरी कहने लगी ॥१२४-१२५॥ 'इससे भी यदि बच जाय तो आगे जाकर आम के एक वृक्ष को देखेगा यदि उसके फल तोड़ेगा तो इसके प्राण निकल जायेंगे। ॥१२६॥ ऐसा कहकर जब दूसरी स्त्री चुप हो गई तब तीसरी ने कहना प्रारम्भ किया—'यदि इससे भी बच जाय तो जब यह विवाह के लिए घर में प्रवेश करेगा तब घर गिर जायगा और यह दब कर मर जायगा। तीसरी के इस प्रकार कहने पर चौथी बोली—॥१२७-१२८॥ 'यदि इससे भी बच गया तो रात को शयनागार में जाकर यह सौ बार छींकेगा। उतनी ही बार हर छींक पर यदि कोई व्यक्ति 'जीवो' नहीं कहेगा तो यह मर जायगा। और, जिसने हमारी ये बातें सुनी हों तथा जो उसकी रक्षा के लिए उससे कह देगा उसकी भी मृत्यु हो जायगी। इतना कह लेने पर वह भी चुप हो गई ॥१२९-१३१॥ बनिये के पुत्र ने वज्रपात के समान भीषण ये बातें सुनीं और राजकुमार के स्नेह से व्याकुल होकर वह सोचने लगा ॥१३२॥ प्रारम्भ की गई और पूरी न कही गई ऐसी कहानी को धिक्कार है जिसे सुनने के लिए देवियाँ भी आईं और शाप देती हैं ॥१३३॥ तो मुझे इस राजपुत्र के मर जाने पर इन प्राणों से क्या प्रयोजन ? इसलिए किसी भी उपाय से प्राणों के समान इस मित्र की रक्षा करनी चाहिए ॥१३४॥ उसे यह समाचार भी नहीं कहना है कि जिससे मेरी ही मृत्यु हो जाय। ऐसा सोचते सोचते वैश्यपुत्र ने रात्रि व्यतीत की ॥१३५॥ राजपुत्र भी प्रातःकाल उठकर उसके साथ मार्ग में चला। उसने सामने पड़े हुए हार को देखा और उसे लेने की इच्छा की ॥१३६॥ तब वैश्यपुत्र बोला—मित्र इसे मत लो। यह केवल मायाजाल है। नहीं तो इसे ये सैनिक क्यों नहीं देखते? ॥१३७॥
१४८ कथासरित्सागर
१४८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा तं परित्यज्य गच्छन्नग्रे ददर्श सः । आम्रवृक्षं फलायस्य भोक्तुं चैच्छन्नृपात्मजः ॥१३८॥ वणिक्पुत्रेण च प्राप्तस्ततोऽपि स निवारितः । सान्तःस्वेदं शनैर्गच्छन्नाप श्वशुरवेश्म तत् ॥१३९॥ तत्रोद्वाहकृते वेश्म विशन्द्धाराधिवर्त्तितः । तैनेव सख्या यावच्च तावत्पतितं गृहम् ॥१४०॥ ततः कथञ्चिदुत्तीर्णः किञ्चित्सम्प्रत्ययो निधिः । निवासके विवेशान्ये राजपुत्रो वधूसखः ॥१४१॥ तत्र तस्मिन्वणिक्पुत्रे प्रविश्यारक्षितस्थिते । ससङ्करवं क्षुतं चक्रे शयनीयाश्रितोऽप्यसौ ॥१४२॥ शतकृत्वोऽपि तस्मान्न नीचैर्जीवेत्युदीर्य सः । कृतकार्यो वणिक्पुत्रो हृष्टः स्वैरं वहिर्ययौ ॥१४३॥ निर्यान्तं तमपश्यच्च राजपुत्रो वधूसखः । ईर्ष्याविस्मृततत्स्नेहः क्रुद्धो द्वाःस्थानुवाच च ॥१४४॥ पापात्मायं रहस्यस्य प्रविष्टोऽन्तःपुरं मम । तद्बद्ध्वा स्थाप्यतां यावत्प्रभातेऽसौ निगृह्यते ॥१४५॥ तदुक्त्वा रक्षिभिर्बद्धो निशां निन्ये वणिक्सुतः । प्रातर्वध्यभुवं तैश्च नीयमानोऽब्रवीत्स तान् ॥१४६॥ आदौ नयत मां तावद्राजपुत्रान्तिकं यतः । वक्ष्यामि कारणं किञ्चित्ततः कुरुत मे वधम् ॥१४७॥ इत्युक्तैस्तेन तैर्गत्वा विज्ञप्तः स नृपात्मजः । सचिवैर्योषितश्चान्यैस्तस्यानयनमाविशत् ॥१४८॥ आनीतः सोऽब्रवीत्तस्मै वृत्तान्तं राजसूनवे । प्रत्ययाद्गृहपालोत्थाम्मेमे सत्यं च सोऽपि तत् ॥१४९॥ ततस्तुष्टः समं सख्या वधमुक्तेन तेन सः । आययौ राजतनयः कृतदारो निजां पुरीम् ॥१५०॥ तत्र सोऽपि सुहृत्तस्य कृतदारो वणिक्सुतः । स्तूयमानगुणः सर्वजनैरासीद्यथामुदम् ॥१५१॥ एवमप्यदृढदृशा मूर्खाः स्वमिमन्तप्रमाथिनः । राजपुत्रा न मन्यन्ते हितं भर्ता गजा इव ॥१५२॥
षष्ठ लम्बक ६४९
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यह सुनकर आगे जाने पर उसने आम का वृक्ष देखा और उसके फल खाने की इच्छा प्रकट की। वैश्यपुत्र ने पहले के ही समान उसे रोका। उससे मन-ही-मन खिन्न हुआ राजकुमार धीरे-धीरे रङ्गपुर-गृह में पहुँचा। वहाँ पर विवाह के लिए निर्मित गृह में प्रवेश करते हुए राजकुमार को वैश्यपुत्र ने रोक दिया। उसके रोकते ही वह मकान गिर गया॥१३८-१४०॥
वहाँ से किसी प्रकार बचकर निकला और कुछ विश्वस्त हुआ राजपुत्र रात को पत्नी के साथ दूसरे घर में गया। वहाँ भी वह वैश्यपुत्र छिपकर जा बैठा। राजकुमार पलँग पर बैठते ही छींकने लगा और सौ बार पलँग के नीचे छिपा हुआ वैश्यपुत्र सौ बार 'जीओ जीओ' कहता रहा! इस प्रकार अपना कार्य समाप्त कर के प्रसन्न वह वैश्यपुत्र धीरे से बाहर निकला॥१४१-१४३॥
बाहर जाते हुए उसे वधू के साथ राजपुत्र ने देख लिया। फलतः ईर्ष्या से स्नेह को भुला कर कोपावेश में उसने द्वारपालों से कहा ॥१४४॥
'यह पापी एकान्त में मेरे शयनागार में घुस आया। इसलिए इसे रात भर बाँधकर रखो। प्रातःकाल इसे फाँसी दी जायगी' ॥१४५॥
यह सुनकर पहरेदारों द्वारा बाँधे हुए उस वैश्यपुत्र ने रात व्यतीत की। प्रातःकाल फाँसी पर ले जाये जाते हुए उसने सिपाहियों से कहा ॥१४६॥
'पहले मुझे उस राजपुत्र के समीप ले चलो मैं उसे कुछ कारण बताऊंगा तब मेरा वध करना' ॥१४७॥
उनसे इस प्रकार कहे गये सिपाहियों मन्त्रियों एवं अन्य लोगों द्वारा समझाये जाने पर राजपुत्र ने उसे लाने की आज्ञा दी ॥१४८॥
वहाँ लाये गये बनिये के पुत्र ने राजकुमार से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। विवाहवाले घर के गिर जाने की घटना से विश्वास करके राजपुत्र ने उसकी बात सच मान ली॥१४९॥
तब वध से मुक्त उस वैश्यपुत्र के साथ राजपुत्र अपनी पत्नी-सहित प्रसन्न चित्त से अपनी नगरी को लौट आया। वहाँ आकर वैश्यपुत्र भी विवाह करके सभी जनों से प्रशंसा किया जाता हुआ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५०-१५१॥
इसी प्रकार राजपुत्र मदोन्मत्त हाथी के समान अपने नियन्ता (महावत) की बातें न मान पर उसे भी मार डालते हैं और अपना हित नहीं समझते ॥१५२॥ ८२
३५० कथासरित्सागर
३५० कथासरित्सागर वेतालैस्तैश्च का मैत्री ये विहस्य हरन्त्यसून। तद्राजपुत्रि सख्यं मे मा स्म व्यभिचर सदा ॥१५३॥ इति श्रुत्वा कथामेतां हर्म्ये सोमप्रमामुखात्। कलिङ्गसेना सस्नेहं तां सखीं प्रत्यभाषत ॥१५४॥ एते पिशाचा न त्वेते राजपुत्रा मया सखि। पिशाचदुग्रहकथामहमाख्यामि ते श्रृणु ॥१५५॥ पिशाचब्राह्मणयोः कथा यज्ञस्थलारव्ये कोऽप्यासीदग्रहारे पुरा द्विजः। स जातु दुर्गसः काष्ठा न्यायाहुतुमटवीं ययौ ॥१५६॥ तत्र काष्ठं कुठारेण पाटद्यमानं द्विधेर्वधात्। व्यापत्य तस्य जङ्घायां भित्त्वान्तः प्रविवेश खत् ॥१५७॥ ततः स प्रस्रवद्रक्तो दृष्ट्वा केनापि मूर्च्छितः। उत्क्षिप्यानीयत गृहं पुंसा प्रत्यभिजानता ॥१५८॥ तत्र विह्वलया पत्न्या तस्य प्रक्षाल्य शोणितम्। आश्वास्य तस्य जङ्घायां निबद्धो व्रणपट्टकः ॥१५९॥ छतश्चिकित्स्यमानः सन् प्रशस्तस्य दिने दिने। न परं न रुरोहैव यावन्नाडीत्वमाययौ ॥१६०॥ ततो नाडीव्रणात् खिन्नो दरिद्रो मरणोद्यतः। अभ्येत्य सख्या विप्रेण केनापि जगदे रहः ॥१६१॥ सखा मे यज्ञदत्ताख्यश्चिरं भूत्वातितुर्गतः। पिशाचसाधनं कृत्वा धनं प्राप्य सुखी स्थितः ॥१६२॥ तच्च तत्साधनं तेन ममाप्युक्तं त्वमप्यतः। पिशाचं साधय सखे स ते रोषयिता व्रणम् ॥१६३॥ इत्युक्त्वारव्यातमग्नोऽथाबुवाचास्य क्रियामिमाम्। उत्थाय पश्चिमे यामे मुक्तकेशो दिगम्बरः ॥१६४॥ अनाचान्तश्च मुष्टी द्वे तण्डुलानां यथाक्रमम्। द्वाभ्यामादाय हस्ताभ्यां जपन् गच्छेदचतुष्पथम् ॥१६५॥ तत्र तण्डुलमुष्टी द्वे स्थापयित्वा ततः सखे। मौनेनैव त्वमागच्छेर्मा वीक्षिष्ठाश्च पृष्ठतः ॥१६६॥
षष्ठ लम्बक १५१
षष्ठ लम्बक १५१ उन वैतालों के साथ क्या मित्रता जो हँसते-हँसते प्राण ले लेते हैं। इसलिए हे राजपुत्री मेरी मित्रता में ऐसा विघ्न न करना ।। १५३।। भवन की छत पर सोमप्रभा से इस प्रकार की कथा सुनकर कलिङ्गसेना स्नेह के साथ सखी से कहने लगी ।। १५४।। सखि ये राजपुत्र पिशाच हैं राजपुत्र नहीं। इनको वश में रखना कठिन कार्य है। पिशाच को कठिनता से वश में रखने की एक कथा मैं तुम्हे सुनाती हूँ सुनो ।। १५५।। पिशाच और ब्राह्मण की कथा पूर्वकाल में मङ्गलस्थल नामक ग्राम में एक ब्राह्मण रहता था। वह कभी दुर्दशाग्रस्त होकर लकड़ियाँ लेने जंगल में गया ।। १५६।। वहाँ पर दैववश कुल्हाड़े से फाड़ी जाती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उसकी जाँघ के भीतर घुस गया। रक्त निकल जाने के कारण बेहोश पड़े हुए उसे किसी परिचित व्यक्ति ने उठाकर घर पर लाकर रख दिया ।। १५७-१५८ ।। घर पर घबराई हुई उसकी पत्नी ने उसका रक्त धोकर उसकी जाँघ पर पट्टी बाँध दी। उसकी निरन्तर चिकित्सा करने पर भी वह घाव दिनों दिन बढ़ता ही गया और वह नाड़ी-व्रण (नासूर) बन गया ।। १५९-१६० ।। नाड़ीव्रण हो जाने के कारण खिन्न वह दरिद्र ब्राह्मण मरण को तैयार हो गया। तब उसके किसी मित्र ब्राह्मण ने आकर एकान्त में उससे कहा—'यज्ञदत्त नामक मेरा मित्र अत्यन्त निर्धन होकर भी पिशाच की साधना से धन प्राप्त करके सुखी हो गया। इस साधना को उसने मुझे भी बताया है। अतः तुम भी पिशाच की साधना करो वह तुम्हारे इस व्रण को भर देगा ।। १६१-१६३।। ऐसा कहकर उसने उसे मन्त्र बता दिया और उसकी साधना-क्रिया भी इस प्रकार बताई— 'रात के पिछले पहर में उठकर केशों को खोलकर नंगे होकर, बिना स्नान किये ही दो मुट्ठी चावल दोनों हाथों में लेकर मन्त्र का जप करते हुए चौराहा पर जाना। वहाँ पर दो मुट्ठी चावल रखकर मौन होकर लौट आना और लौटते हुए पीछे नहीं देखना ।। १६४-१६६।।
३५२ कथासरित्सागर
३५२ कथासरित्सागर एवं कुरु सदा यावत् पिशाचो व्यक्ततां गतः । अह हि हन्मि ते व्याधिमिति त्वा वक्ष्यति स्वयम् ॥१६७॥ ततोऽभिनन्देस्तं साध्यं तव रोगं हरिष्यति । इत्युक्तस्तेन मित्रेण स द्विजस्तत्तथाकरोत् ॥१६८॥ ततः सिद्धं पिशाचं स तस्यार्तस्य महौषधीः । हिमाचलेन्द्रादानीय रोपयामास तं व्रणम् ॥१६९॥ जगाद च प्रहृष्टं तं सोऽथ रुग्णग्रहो द्विजम् । देहि व्रणं द्वितीयं मे यावत् रोपयाम्यहम् ॥१७०॥ न चेदुत्सृजाम्यन्यं ते शरीरं संहरामि वा । तच्छ्रुत्वा स द्विजो भीतः सद्यो मुक्त्यर्थं तमभ्यधात् ॥१७१॥ व्रणं द्वितीयं दास्यामि सप्तभिस्ते दिनैरिति । ततस्तेनोज्झितः सोऽभून्निराशो जीविते द्विजः ॥१७२॥ इत्युक्त्वा विरता मध्यादशखीलाख्यानसञ्ज्ञया । कलिङ्गसेना भूयः सावादीत्सोमप्रभामित्थम् ॥ १७ ॥ ततो व्रणान्तराभावादार्तं विप्रमुवाच तम् । दृष्ट्वा पृष्ट्वा च दुहिता विवन्धा मृतभर्तृका ॥१७४॥ वञ्चयेदहं पिशाचं तं गच्छ त्वं ब्रूहि तं पुनः । नाडीव्रणो मद्धुहितुर्भर्वतारोप्यतामिति ॥१७५॥ तच्छ्रुत्वा मुदितो गत्वा तथैवोक्त्वा च स द्विजः । अनेषीद्दुहितुस्तस्याः पिशाचं तं ततोऽन्तिकम् ॥१७६॥ सा च तस्य पिशाचस्य वराङ्गं स्वमदर्शयत् । रोपयेमं व्रणं भद्र ममेति ब्रुवती रहः ॥१७७॥ स च मूढः पिशाचोऽस्या वराङ्गे सततं ददौ । पिण्डीलेपादि न स्वासीत्स तं रोपयितुं क्षमः ॥१७८॥ त्रिदिनं विश्रस्तस्याः स कृत्वा जङ्घे निरामयां । किस्विन्न गह्वरीयं मे तद्वराङ्गं व्यलोकयत् ॥१७९॥ यावद्द्वितीयं तस्याथ स पायुव्रणमैक्षत । तं दृष्ट्वैव च सम्भ्रान्तः स पिशाचो व्यचिन्तयत् ॥१८०॥
षष्ठ लम्बक ६५३
षष्ठ लम्बक ६५३ जबतक पिशाच प्रकट होकर स्वयं यह न कहे कि मैं तुम्हारे घाव को अच्छा कर देता हूँ तबतक बोलना नहीं। उसके कहने पर उसका अभिनन्दन करना वह तुम्हारा रोग अच्छा कर देगा'। मित्र के कहने पर उस ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। फलतः वह पिशाच सिद्ध हो गया। तदनन्तर उसने हिमाचल से औषधि लाकर उससे उस नाड़ीव्रण (नासूर) को अच्छा कर दिया। घाव के अच्छे हो जाने पर ग्रह के समान लगा हुआ वह पिशाच कहने लगा—'मुझे दूसरा घाव दो तो मैं उसे अच्छा करूँ॥१६७—१६९॥ अन्यथा मैं कोई अनर्थ कर डालूँगा या तुम्हें मार डालूँगा'। यह सुनकर उस भयभीत ब्राह्मण ने शीघ्र ही पीछा छुड़ाने के लिए कहा—'मैं सात दिनों में तुम्हें दूसरा घाव दूँगा'। इस प्रकार पिशाच से मुक्त वह ब्राह्मण जीवन के प्रति निराश हो गया॥१७०—१७२॥ इतना कहकर कलिङ्गसेना मध्य में ही अभीष्ट कथा आन के कारण लज्जा से चुप हो गई और सोमप्रभा से फिर कहने लगी॥१७३॥ दूसरा व्रण (घाव) मिलने न अत्यन्त पीड़ित अपने पिता को देखकर ब्राह्मण की चतुर और विपश्चा कन्या सब सब बात जानकर इससे बोली—'मैं उस पिशाच को ठग लूँगी। तुम उससे जाकर कह दो कि मेरी कन्या को नाड़ीव्रण (नासूर) है उसे भर दो'॥१७४-१७५॥ यह सुनकर प्रसन्न ब्राह्मण पिशाच के जाकर उसी प्रकार बोला और उसे अपनी कन्या के पास ले आया॥१७६॥ उस कन्या ने उस पिशाच को एकान्त में अपना गुह्याङ्ग (जननन्द्रिय) दिखाते हुए कहा इसे भर दो॥१७७॥ उस मूर्ख पिशाच ने उसके गुह्याङ्ग पर औषधि रस आदि अनेक प्रयोग किये किन्तु वह उसे भर न कर पाया॥१७८॥ कुछ दिनों के पश्चात् वह आकर उसने उस कन्या के स्तनों पर कण्ठ का गहना उसे भली भाँति देखना चाहा था कि वह व्रण क्यों नहीं भर रहा है इतने में ही उसे उसका दूसरा व्रण (स्तनद्वय) दिखाई पड़ा। उसे देखकर घबड़ाया हुआ मूर्ख पिशाच सोचने लगा॥१७९-१८०॥
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर
एको न रोपितो यावदुत्पन्नोऽस्य व्रणोऽपर। सत्यं प्रवादो यच्छिद्रेष्वनर्था यान्ति भूरिताम् ॥१८१॥ प्रभवन्ति यतो लोकाः प्रलयं यान्ति येन च। ससार वर्त्म विवृतं कः पिधातुं तदीश्वरः ॥१८२॥ इत्यालोच्य विरुद्धाथेसिद्धया मन्त्रनश्वयुया। स पिशाचस्ततो मूर्खं पलाय्यावर्शनं ययौ ॥१८३॥ एवं च बद्धमित्वा तं पिशाचं मोषितस्तया। दुहित्रा स द्विजस्तस्मै रोगोत्तीर्णो यथासुखम् ॥१८४॥ इत्य पिशाचास्तत्तुत्या बाला राजसुताश्च ये। ते सिद्धा अप्यनर्थाय सखि रक्ष्यास्तु बुद्धिभि ॥१८५॥ राजपुत्र्यः कुलीनास्तु नैतादृश्यः श्रुता क्वचित्। अतोऽन्यथा न भव्यं ते सखि मत्संगतं प्रति ॥१८६॥ एवं कलिङ्गसेनाया मुखाच्छ्रुत्वा यथाक्रमम्। सहासाचित्रमधुर सोर्प सोमप्रभा ययौ ॥१८७॥ इतो मे षष्टियोजन्यां गृहं याति च वासरः। चिरं स्थितास्मि सतन्वि यामीत्यैतामुवाच च ॥१८८॥ गतोऽस्तगिरिशेखरं व्रजति वासरोशे धर्न सखीं पुनरुपागमत्क्षणमिनी समापृच्छ्य ताम्। क्षण अनितविस्मया गगनमार्गमुत्पत्य सा जगाम वसतिं निजां प्रसभमत्र सोमप्रभा ॥१८९॥ विलोक्य च तदद्भुतं बहुवितर्कमत्यद्भुतम् प्रविद्य समचिन्तयत् किम कलिङ्गसेना च सा। न वेद्मि किमसावहो मम सखी हि सिद्धाङ्गना भवत्यथवाप्सराः किमथवापि विद्याधरी ॥१९०॥ दिव्या तावदियं मवरयवितथं व्योमाप्रमच्छासिणी दिव्या यान्ति च मानुषीभिरसमस्नेहानुसा सङ्गतिम्। भेजे किं नृपते पृथोस्तनयया सख्यं न सारून्धती तत्क्षीरण्या पृथुरानिगाय सुरभि स्वर्गाप्र किं भूतले ॥१९१॥ तत्क्षीरपानतो न किं पुनरसौ भ्रष्टोऽपि यातो दिवं सम्भूताश्च तत प्रभृत्यविवणा गायो न किं भूतले। तद्भाग्यास्मि शुभोदयादुपगता दिव्या मतीयं मम प्रातः स्वान्वयनामनी मुनिपुणं प्रक्ष्यामि तामागताम् ॥१९२॥
षष्ठ लम्बक १५५
षष्ठ लम्बक १५५ अभी तक एक घाव तो भरा नहीं तबतक यह दूसरा घाव उत्पन्न हो गया। यह कहावत सच है कि छिद्रों में अधिक अनर्थ होते हैं। जिस संसार-मार्ग से लोग जाते हैं और नष्ट होते हैं भला उस संसार-मार्ग को कौन बन्द कर सकता है। ऐसा सोचकर और उल्टा अपराध पड़ने और पकड़े जाने की शंका से वह मूर्ख पिशाच भागकर अन्तर्धान हो गया ॥१८६-१८७॥ इस प्रकार कन्या द्वारा ठगकर उस पिशाच से छुड़ाया हुआ वह नीरोग ब्राह्मण सुख पूर्वक रहने लगा ॥१८४॥ पिशाच ऐसे होते हैं। इसी प्रकार बालक राजपुत्र भी होते हैं। वे सिद्ध होकर भी अनर्थकारी होते हैं। उनसे बचने के लिए बुद्धि द्वारा अपनी रक्षा करनी चाहिए। किन्तु कुलीन राजपुत्रियाँ ऐसी कही सुनी नहीं गईं। इसलिए हे सखि मेरी संगति (मैत्री) के सम्बन्ध में तुम ऐसी कुछ विरुद्ध बात न समझना ॥१८६-१८६॥ कलिंगसेना के मुंह से हास्य अद्भुत और मधुर रस से पूर्ण इस प्रकार की कहानी सुनकर सोमप्रभा प्रसन्न हुई ॥१८७॥ और कहने लगी सखि ! मेरा घर यहाँ से साठ योजन (२४ कोश) पर है। दिन छिप रहा है। बहुत देर तक यहाँ रुक गई। अतः अब जाती हूँ ॥१८८॥ धीरे-धीरे सूर्य के अस्ताचल पर्वत शिखर की ओर जाने पर, फिर आने की उत्कंठा रखती हुई सखी कलिङ्गसेना को पुचकार क्षण-भर के लिए व्यथित करती हुई वह सोमप्रभा अपने घर को चली गई ॥१८९॥ इधर वह कलिङ्गसेना भी घर के कमरे में जाकर सोमप्रभा के आश्चर्य और विविध कौतुक पूर्ण सम्बन्ध में सोचने लगीं कि म सूझ रही यह मेरी सखी सोमप्रभा क्या कोई सिद्ध नारी है वा अप्सरा है अथवा विद्याधरी है॥१९ ॥ आकाश में सञ्चरण करनेवाली यह अवश्य ही कोई दिव्य स्त्री है। दिव्य स्त्रियाँ भी मानव-स्त्रियों के साथ असाधारण स्नेह और मित्रता रखती हैं। क्या पूर्व समय में राजा पृथु की कन्या के साथ दिव्य अरुन्धती की मित्रता नहीं थी उसी के प्रेम से राजा पृथु कामधेनु गौ को पृथ्वी पर नहीं लाया ? ॥१९१॥ उस कामधेनु का दूध पीने से ही क्या पृथु राजा भ्रष्ट होने पर भी फिर स्वर्ग नहीं गया ? तब से लेकर पृथ्वी पर निरन्तर गायों की सृष्टि नहीं हुई ? इसलिए मैं भी धन्य हूँ। किसी भार्य शुभ फल के लिए ही यह दिव्य कन्या मेरी सखी बनी है। अब प्रातःकाल उसके आने पर भली-भाँति उसके कुल नाम आदि का पता मालूम करूँगी ॥१९२॥
६५६ कथासरित्सागर
६५६ कथासरित्सागर इत्यादि राजतनया हृदि चिन्तयन्ती तां यामिनीमनयद्यत्र कलिङ्गसेना । सोमप्रभा च निजवेश्मनि भूय एव तद्दर्शनोत्सुकमना रजनीं निनाय ॥१९३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे । मदनमञ्चुकालम्बके द्वितीयस्तरङ्गः । तृतीयस्तरङ्गः कलिङ्गसेनायाः कथा (पूर्वतोऽनुवृत्ता) ततः सोमप्रभा प्रातस्तद्विनोदोपपादिनीम् । न्यस्तदारुमयानेकमायायन्त्रपुत्रिकाम् ॥१॥ करण्डिकां समादाय सा नभस्तलचारिणी । सख्याः कलिङ्गसेनाया निकटं पुनराययौ ॥२॥ कलिङ्गसेनाप्यालोक्य तांमानन्दाश्रुनिर्भरा । उत्थाय कण्ठे जग्राह पार्श्वसीनामुवाच च ॥३॥ त्वदीयमुखपूर्णेन्दुदर्शनेन विना सखि ! तमोमयी त्रियामाद्य शतयामेव मे गता ॥४॥ सज्जन्मान्तरसम्बन्धः कीदृशः स्यात्सख्या मम । यस्यायं परिणामोऽद्य त्वं देवि ! वेत्सि चेद् वद ॥५॥ तच्छ्रुत्वा राजपुत्रीं तामेवं सोमप्रमाब्रवीत् । ईदृशं मे नास्ति विज्ञानं नहि जातिं स्मराम्यहम् ॥६॥ न चात्र मनसोऽभिज्ञा बोधितं यदि जानते । तौ कृतं तादृशं पूर्वे परतस्त्वविदश्च त ॥७॥ एवमुक्तवतीं भूयः प्रेमचिह्नम्प्रणश्यलम् । कलिङ्गसेना पप्रच्छ विह्वले तां सुरारिपुम् ॥८॥ ब्रूहि मे सखि कस्येह देवजातेः पितुस्त्वया । जन्मनाऽलङ्कृतो वंशो मुक्तयेव सुवृत्तया ॥९॥ जगत्कर्णामृतं किं च तव नाम ससद्गुणे । करण्डिका किमर्थेयमस्यामस्ति च वस्तु किम् ॥११॥
मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त
वह राजकुमारी कलिङ्गसेना इस प्रकार की विविध बातें सोचती-सोचती कठिनाई से रात व्यतीत कर सकी। उधर सोमप्रभा ने भी राजकुमारी के पुनर्सङ्गम की लालसा में उत्कण्ठित रहकर रात बिताई॥१९३॥
मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त
तीसरा तरंग कलिङ्गसेना का वृत्तान्त क्रमशः
तदनन्तर प्रातः काल होते ही सोमप्रभा ने सखी के मनोविनोद के लिए एक डोलची में सरकी की पुतलियों तथा विविध प्रकार के यन्त्रमय खिलौनों को सजाया और उसे साथ लेकर आकाश में विहार करती हुई वह राजकुमारी कलिङ्गसेना के घर पर पहुँची ॥१-२॥
कलिङ्गसेना भी उसे आती हुई देखकर आनन्द के आँसुओं से भरी हुई उठकर उसके पास गई और उसे गले लगाकर पास में बैठाकर कहने लगी—'हे सखि ! तुम्हारे मुख-रूपी पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के बिना आज की मेरी सारी त्रियामा (तीन प्रहरोंवाली रात) शतयामा (सौ प्रहरोंवाली रात) के समान व्यतीत हुई ॥३-४॥
न जाने तुम्हारे साथ मेरा पूर्वजन्म का कौन-सा सम्बन्ध है जिसका कि यह परिणाम है। हे देवि यदि जानती हो तो कहो' ॥५॥
यह सुनकर सोमप्रभा उस राजपुत्री से इस प्रकार कहने लगी—'मुझे इसका ज्ञान नहीं है। मैं पूर्वजन्म को स्मरण करनेवाली नहीं हूँ ॥६॥
इस विषय को मुनि लोग भी नहीं जानते जो जानते भी हैं तो उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा ही पुण्य किया होता है कि जिससे वे दूसरों के पूर्वजन्म की बात जानते हैं ॥७॥
इस प्रकार प्रेम और विश्वास से सोमप्रभा को मधुर कहती हुई कलिङ्गसेना ने एकान्त में कौतुक के साथ पूछा ॥८॥
'हे गुणरूप हे सखि यह तो बता कि सुन्दर चरित्रवाली तूने अपने जन्म से किस देवआदि के वंश को मोती के समान धन्य किया है। संसार के कानों के लिए सुनने में अमृत के समान तेरा नाम क्या है? इस बाँस की डोलची को क्यों लाई है और इनमें क्या वस्तु है ॥९-१०॥ ८३
१६० कथासरित्सागर
१६० कथासरित्सागर तद्दृष्ट्वा च ततस्तस्या जननी रोगशङ्किनी। आनन्दास्येन भिषजा निरूप्याविकलोदिता ॥२४॥ कुतोऽपि हेतोर्हर्षेण नष्टास्याः क्षुन्न रोगतः। उत्फुल्लनेत्रं वक्त्र्येतदस्या हसदिवाननम् ॥२५॥ इत्युक्ता भिषजा हर्षहेतुं सञ्जननी च सा। पप्रच्छ तां यथावृत्तं सापि तस्यै तदब्रवीत् ॥२६॥ सतः श्लाघ्यसखीसङ्गहृष्टा मत्वाभिनन्द्य च। आहारं कारयामास जननी तां यथोचितम् ॥२७॥ अथान्येद्युरुपागत्य विदितार्था क्रमेण सा। कलिङ्गसेनां तामेव रह सोमप्रभाम्यधात् ॥२८॥ मया स्वसख्यमावेद्य त्वत्पाश्र्वौगमनोऽवहम्। अनुज्ञा ज्ञानिनो भर्तुर्गृहीता विदिताथतः ॥२९॥ तस्मात्त्वमप्यनुज्ञासा पितृभ्यां भव साम्प्रतम्। येन स्वैरं मया साकं निःशङ्का विहरिष्यसि ॥३०॥ एवमुक्तवती हस्ते तो गृहीत्वैव तत्क्षणम्। कलिङ्गसेना स्वपितुर्मातुश्च निकटं ययौ ॥३१॥ तत्र नामान्वयाख्यानपूर्व चैतामवर्णयत्। पित्रे कलिङ्गदत्ताय राज्ञे सोमप्रभां सखीम् ॥३२॥ मात्रे च तारादत्तायै सर्ववैतामवर्णयत्। तौ च दृष्ट्वा यथास्यानमेनामभिननन्दतुः ॥३३॥ ऊचतुश्चाकृतिप्रीती दम्पती साधुभो दृढ। सस्कृत्य दुहितृस्नेहात्तां महासुरसुन्दरीम् ॥३४॥ वत्स कलिङ्गसेनेयं हस्ते तव समर्पिता। तदिदानीं यथाकाममुभे विहरतां युवाम् ॥३५॥ एतत्तयोर्वचो द्वे साप्यभिनन्द्य निर्ययुः। समं कलिङ्गसेना च सा च सोमप्रभा ततः ॥३६॥ जग्मतुश्च विहाराय बिहारं राजनिनिर्मितम्। आनिन्यतुश्च तां तत्र मायायन्त्रकरण्डिकाम् ॥३७॥ ततो यन्त्रमयं यक्षं गृहीत्वा प्राहिणोत्तदा। सोमप्रभा स्वप्रयोगाद् बुद्धावनियताय सा ॥३८॥ स यक्षो नभसा गत्वा दूरमम्लानमानसः। आदाय मुक्तासङ्गलहमाम्बुरुहमञ्जरम् ॥३९॥
षष्ठ लम्बक ६६१
षष्ठ लम्बक ६६१ यह देखकर उसकी माता ने रोग की शंका से उसे आनन्द नामक वैद्य को दिखाया और आनन्द ने उसकी भली भाँति परीक्षा करके बताया ॥२४॥ 'किसी अत्यन्त हर्ष के कारण इसकी भूख नष्ट हो गई, रोग से नहीं। विकसित नयनों- वाला हँसता हुआ इसका मुख भी यही बताता है ॥२५॥ ऐसा सुनकर उसकी माता ने उससे हर्ष का कारण पूछा तो उसने सारी घटना अपनी माता को सुना दी ॥२६॥ तदनन्तर अच्छी सहेली की मित्रता से प्रसन्न कलिंगसेना का अभिनन्दन करके माता ने समयानुकूल भोजन कराया ॥२७॥ अनन्तर एक दिन इस घटना को जाननेवाली सोमप्रभा एकान्त में कलिंगसेना से मिलकर कहने लगी ॥२८॥ मैंने अपने सर्वज्ञ पति से तेरा सारा वृत्तान्त सुनाकर प्रति दिन तेरे पास आने की आज्ञा ले ली है ॥२९॥ इसलिए तू भी अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर मेरे यहाँ चलने की तैयारी कर। ऐसा होने पर तू भी मेरे साथ स्वच्छन्दतापूर्वक भ्रमण कर सकेगी ॥३०॥ ऐसा कहती हुई सोमप्रभा कलिंगसेना का हाथ पकड़कर उसे अपने माता-पिता के पास ले गई ॥३१॥ वहाँ जाकर उसने अपनी सहेली सोमप्रभा के नाम और कुल आदि का परिचय देते हुए अपने माता-पिता को दिखलाया ॥३२॥ माता तारादत्ता को भी उसे दिखाया और वे दोनों कलिंगसेना के कथनानुसार सोमप्रभा को देखकर प्रसन्न हुए ॥३३॥ सोमप्रभा की आकृति से प्रसन्न वे दोनों अत्यन्त स्नेह से सोमप्रभा का स्वागत-सत्कार करके बोले—'बेटी ! इस कलिंगसेना को हमने तुम्हारे हाथ सौंप दिया है। अब तुम दोनों अपनी इच्छानुसार खेलो' ॥३४-३५॥ उनके वचनों से प्रसन्न होकर सोमप्रभा और कलिंगसेना वहाँ से निकली ॥३६॥ तदनन्तर वह राजा द्वारा बनवाये गये विहार का विहार (सैर) करने चली और मायामय यन्त्रों की डोलची भी लाई। वहाँ विहार में सोमप्रभा ने यन्त्र के बने यक्ष को बुद्ध की पूजा का सामान लाने की आज्ञा दी। वह यन्त्र सोमप्रभा के आज्ञानुसार लम्बा रास्ता तय करके रत्न, मोती और सोने के कमल आदि लेकर आ गया ॥३७-३९॥
तेनाभिपूज्य सुगता मासमाभास तत्र सा। सोमप्रभा सनिख्यान्सर्वाश्चर्यप्रदायिना ॥४०॥ तद्बुद्ध्वागत्य दृष्ट्वा च विस्मितो महिषीसखः। राजा कलिङ्गदत्तस्तामपृच्छत्तच्चेष्टितम् ॥४१॥ सत सोमप्रभावादीद्भाजन्नेतान्यनेकधा। मायायन्त्रादिशिल्पानि पित्रा सृष्टानि मे पुरा ॥४२॥ यथा चेद जगद्यन्त्रं पञ्चभूतात्मक तथा। यन्त्राण्येतानि सर्वाणि शृणु तानि पृथक् पृथक् ॥४३॥ पृथ्वीप्रधान यन्त्र यद्द्वारादि विवक्षाति तत्। विहित तेन शक्नोति न चोद्घाटयितु पर ॥४४॥ आकारस्तोयमन्त्रोत्थः सजीव इव दृश्यते। तेजोमय तु यद्यन्त्र तज्ज्वाला परिमुञ्चति ॥४५॥ वातयन्त्रं च कुरुते चेष्टागत्यागमाविकाः। व्यक्तीकरोति चालाप यन्त्रमाकाशसम्भवम् ॥४६॥ मया चैतान्यवाप्तानि तातात् किं त्वमृतस्य यत्। रक्षक चक्रमन्त्रं धत्तातौ जानाति नापर ॥४७॥ इति तस्या वदन्त्यास्तद्वचः श्रद्दधतामिव। मध्याह्न पूर्यमाणानां शङ्खानामुदभूद्ध्वनिः ॥४८॥ तत स्वोधितमाहार वातु विज्ञाप्य तं नृपम्। प्राप्यानुज्ञां विमाने तां सामुर्गा यन्त्रनिर्मिते ॥४९॥ कलिङ्गसेनामादाय प्रतस्थे गगनेन सा। सोमप्रभा पितृगृहं ज्येष्ठाया स्वसुरन्तिकम् ॥५०॥ क्षणाच्च प्राप्य विन्ध्याद्रिवर्ति तत्पितृमन्दिरम्। रम्या स्वयंप्रभायाश्च पार्श्वं सानयत्स्वस ॥५१॥ तत्रापश्यज्जटाजूटभासिनीं तां स्वयंप्रभाम्। कलिङ्गसेना रुद्राक्षमार्ला सा ब्रह्मचारिणीम् ॥५२॥ सुसिताम्बरसवीता हसन्तीमिव पार्वतीम्। कामभोगमहाभोगगृहीतोन्नतप श्रियाम् ॥५३॥ सापि सोमप्रभाख्यातो प्रणतो तो नृपात्मजाम्। स्वयंप्रभा गृहातिथ्या संविभेजे फलाशन ॥५४॥