भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक १६५ प्रदोषकाल में उसने द्वार के छिद्र से झाँककर देखा कि एक भीषण राक्षसी छोटे-छोटे बच्चों के साथ आई ॥ १२८॥ उसे देखकर कीत्तिसेना जैसे ही यह सोचने लगी कि अन्यान्य सभी विपत्तियों से पार हो मात्र मैं इससे खाई जाऊँगी इतने में ही वह राक्षसी वृक्ष पर चढ़ गई ॥ १२९॥ उसके बच्चे भी उसके पीछे चढ़ गये और माँ से कहने लगे— 'हम लोगों को कुछ भोजन दो' ॥ १३० ॥ तब वह राक्षसी उन छोटे बच्चों से बोली— 'बेटा ! मैंने महाश्मशान में जाकर भी आज कुछ भोजन नहीं पाया। डाकिनियों के दल से भी माँगा। इस दुःख से मैंने भैरव से भी प्रार्थना की ॥ १३१ १३२॥ उस भैरव ने मेरा नाम-गोत्र पूछकर यह आज्ञा दी कि 'हे भयंकरि, तू करङ्कषण के वंश में उत्पन्न हुई और कुलीन है। अतः यहाँ से समीप-स्थित वसुदत्तपुर को जा। वहाँ वसुदत्त नाम का महा धार्मिक राजा है, जो इस जंगल के पास रहकर इस सारे जंगल की रक्षा करता है, मार्ग-शुल्क लेता है और चोरों को पकड़ता है ॥ १३३-१३५॥ एक बार शिकार खेलने की थकावट से वह जंगल में सो गया। उस समय अज्ञात अवस्था में एक गोजर (कनखजूरा मादा) उसके कान में शीघ्रता से घुस गया ॥ १३६॥ उसने बहुत दिनों के बाद राजा के सिर के भीतर प्रसव किया। इस रोग से गलते-गलते उस राजा की केवल हड्डियाँ और नसें ही शेष रह गई हैं, अर्थात् शीघ्र ही मरने वाला है ॥ १३७॥ वैद्य उसके रोग को नहीं जानते। यदि और भी कोई उसे न जानेगा तो राजा शीघ्र ही मर जायगा ॥ १३८॥ तुम उस मरे हुए राजा का मांस अपनी माया से प्राप्त करके खाना। उसके खाने से छह महीनों तक तृप्त रहोगी भूख न लगेगी ॥ १३९॥ इस प्रकार भैरव ने भी मुझे शाप दिया। लेकिन वह लम्बी अवधि का है। तो बताओ बेटा आज मैं क्या करूँ ? ॥ १४० ॥ राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वे बच्चे कहने लगे— 'माता ! क्या उस रोग को जान लेने पर और उसके दूर हो जाने पर राजा जीवित रहेगा ? ॥ १४१॥ और यह भी बताओ कि राजा का ऐसा रोग कैसे दूर हो सकता है। तब वह राक्षसी बच्चों से कहने लगी— 'रोग को जानकर उसे दूर कर देने पर राजा अवश्य जी जायगा। यह भी सुनो कि यह महारोग कैसे दूर होगा ॥ १४२-१४३॥