भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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[Page Header] षष्ठ लम्बक १८१

[Text] राजा भी अपने मस्तक से निकले हुए उन कीड़ों को देखकर स्वस्थ हुआ-सा सोचने लगा और प्रसन्न हुआ। उसने अपना पुनर्जन्म माना ॥१७४॥ तदनन्तर उत्सव करके स्नान किये हुए राजा ने कीर्तिसेना की पूजा की। भेंट में आधा राज्य लेने से इन्कार कर देने पर कीर्तिसेना को राजा ने गाँव हाथी घोड़े और सोने आदि से सन्तुष्ट किया ॥१७५॥ महारानी और मन्त्रियों ने अपनी-अपनी ओर से स्वर्ण और वस्त्रों के उपहारों के ढेर लगा दिये क्योंकि वह उनके प्रभु को प्राणदान करनेवाला पूज्य वैद्य था ॥१७६॥ पति की प्रतीक्षा करती हुई कीर्तिसेना ने उनके दिए हुए उपहारों को उन्हें ही लौटाते हुए कहा कि मैं अभी व्रत में हूँ इसलिए अभी न लूँगी ॥१७७॥ इस प्रकार सभी से सम्मानित वह कीर्तिसेना पुरुष के वेष में कुछ समय तक वहीं ठहर गई ॥१७८॥ वहाँ ठहरे हुए उसने लोगों से सुना कि उसका पति व्यापारी देवसेन बल्भी से उसी मार्ग होकर आ गया ॥१७९॥ उस व्यापारिक-दल को नगरी में आया हुआ जानकर वह दल की ओर गई। मयूरी जैसे मेघ को देखती है, उसी प्रकार उसने उस दल में अपने पति को देखा ॥१८०॥ चिरकालीन उत्कण्ठा के मन्मथ से गिरते हुए आँसुओं का अर्घ्य देकर वह पति के चरणों में गिर पड़ी ॥१८१॥ उस (पति) ने भी उसे देखा और पुरुष के वेष में छिपी हुई उसे उसी प्रकार पहचाना जिस प्रकार चन्द्रमा दिन में सूर्य की किरणों से दृष्टिगोचर होता है ॥१८२॥ कीर्तिसेना के मुखचन्द्र को देखकर चन्द्रकान्त के समान देवसेन का हृदय पिघल नहीं गया यही आश्चर्य है ॥१८३॥ तदनन्तर कीर्तिसेना के इस प्रकार स्वरूप को प्रकट कर देने पर उसके पतिदेव देवसेन के आश्चर्य-चकित हो जाने पर और व्यापारियों के दल के भी यह जानकर विस्मित हो जाने पर सहित राजा बहुदल भी नृत्य करने सा लगा ॥१८४-१८५॥ राजा से पूछी गई कीर्तिसेना ने पति के सामने ही सास की दुश्चरित्रता के अपने सारे वृत्तान्त को कह सुनाया ॥१८६॥ उधर पति देवसेन यह सब सुनकर क्रोध आश्चर्य तथा विस्मय और हर्ष से भरा हुआ अपनी भार्या से लिपट गया ॥१८७॥ जिसने पतिव्रत-रूपी रक्षा कर रखी हुई शक्ति रूपी कलत्र में गुण एवं धर्म-रूपी रत्नों के भण्डारे कीर्तिसेना रूप में स्थित प्राप्त करली ॥१८८॥ २४