भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ४४५ इसलिए तू समस्त विश्व के रत्न-स्वरूप एकमात्र वत्सराज को समर्पित अपनी आत्मा की रक्षा कर। यह तेरी निजी उन्नति है ॥१९२॥ हे सखि अब मैं तेरे पास नहीं आऊँगी क्योंकि अब तू पति के घर में आ गई है। अच्छी स्त्रियाँ सहेलियों के पतियों के घरों में नहीं जातीं और मेरे पति ने आज मुझे रोक भी दिया है ॥१९३॥ तेरे अत्यन्त स्नेह के कारण मेरा गुप्त रूप से आना भी सम्भव नहीं है क्योंकि मेरा पति दिव्यदृष्टि है, इसलिए वह सब जान जायगा। आज तो मैं किसी प्रकार उसकी आज्ञा लेकर आई हूँ ॥१९४॥ यदि मुझे पति की आज्ञा प्राप्त हुई तो फिर भी लज्जा का त्यागकर तुम्हारे पास आऊँगी ॥१९५॥ असुरराज की पुत्री सोमप्रभा आँसुओं से धुंधले हुए मुँहवाली राजपुत्री कलिङ्गसेना को रोती हुई इस प्रकार कहकर सायंकाल होने पर आकाश-मार्ग से अपने घर चली गई ॥१९६॥ छठा तरंग समाप्त सातवाँ तरंग वत्सराज उदयन और कलिङ्गसेना की कथा (चालू) अपने वेश और बन्धु-बान्धव आदि को छोड़कर आई हुई कलिङ्गसेना गई हुई सखी सोमप्रभा को स्मरण करती हुई उदास होकर बैठी रही ॥१॥ सुरेन्द्रकन्या कलिङ्गसेना कौशाम्बी में वत्सराज के पाणिग्रहण-महोत्सव में विलम्ब होने के कारण जंगल से बाहर आकर व्याकुल हरिणी के समान हो रही थी ॥२॥ इधर कलिङ्गसेना के विवाह में विलम्ब करनेवाले वत्सराज भी ज्यातिषियों के प्रति क्रुद्ध रहते रहे ॥३॥ ९४