कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७४१ वासवदत्ता से पूर्वशिक्षित रानी पद्मावती ने भी उसी प्रकार बिना कोई विकार प्रकट किये राजा का स्वागत किया और पूछने पर उसी प्रकार का उत्तर दिया ॥१९॥ तब बाष्पामी विन दोनों रानियों के एक समान व्यवहार, एक समान हृदय और वचनों पर विचार करते हुए राजाने सब कुछ मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२० ॥ यौगन्धरायण ने भी राजा को धीरे-धीरे विचार में पड़े हुए देखकर और अवसर समझ कर इस प्रकार कहा—॥२१॥ 'मैं समझता हूँ कि यह इतना ही नहीं है। दोनों रानियों ने जो इस प्रकार कहा है, उसका आधार प्राणत्याग की दृढ़ भावना है ॥२२॥ सच्चरित्र स्त्रियाँ पति के दूसरी स्त्री पर आसक्त हो जाने पर या उसके स्वर्ग चले जाने पर, मरने का निश्चय करके धैर्यसहित एवं स्पृहाहीन हो जाती हैं ॥२३॥ सती स्त्रियों को गहरे प्रेम का टूटना असह्य हो जाता है। हे राजन् इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ सुनो ॥२४॥ राजा श्रुतसेन की कथा प्राचीनकाल में दक्षिण भूमि के मोकर्क नामक नगर में कुल का भूषण और विद्वान् श्रुतसेन नामक राजा था ॥२५॥ सभी प्रकार के वैभवों से परिपूर्ण उस राजा को बस एक ही चिन्ता थी कि उसे अपने अनुकूल भार्या नहीं मिली थी ॥२६॥ एकबार राजा किसी विषय की चर्चा कर रहा था कि उसी समय अग्निधर्मा नामक ब्राह्मण ने उससे कहा—॥२७॥ 'महाराज मैंने अपने जीवन में जो आश्चर्य देखे उनका वर्णन करता हूँ सुनो—मैं तीर्थ यात्रा के प्रसंग में उस पंचतीर्थों में गया जिसमें पाँच अप्सराएँ ऋषि के शाप से ग्राह (मगर) बनकर रहती थीं वहीं पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से आये हुए अर्जुन (पांडव) ने उन अप्सराओं का उद्धार किया था ॥२८-२९॥ उस तीर्थ में स्नान करके पांच रातों तक उपवास करनेवाले मनुष्य नारायण के पार्षद (अनुचर) बन जाते हैं ॥३० ॥ किसान की कथा जब मैं उस तीर्थ की ओर गया तब मैंने हल से जोती हुई भूमि को देखा और एक खेत के बीच में बैठे हुए किसान को गाते हुए देखा ॥३१॥ उस मार्ग से चलते हुए किसी संन्यासी ने उससे मार्ग पूछा किन्तु गाने में तल्लीन कृषक ने उसे सुना नहीं ॥३२॥