कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ७४१
षष्ठ लम्बक ७४१ वासवदत्ता से पूर्वशिक्षित रानी पद्मावती ने भी उसी प्रकार बिना कोई विकार प्रकट किये राजा का स्वागत किया और पूछने पर उसी प्रकार का उत्तर दिया ॥१९॥ तब बाष्पामी विन दोनों रानियों के एक समान व्यवहार, एक समान हृदय और वचनों पर विचार करते हुए राजाने सब कुछ मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२० ॥ यौगन्धरायण ने भी राजा को धीरे-धीरे विचार में पड़े हुए देखकर और अवसर समझ कर इस प्रकार कहा—॥२१॥ 'मैं समझता हूँ कि यह इतना ही नहीं है। दोनों रानियों ने जो इस प्रकार कहा है, उसका आधार प्राणत्याग की दृढ़ भावना है ॥२२॥ सच्चरित्र स्त्रियाँ पति के दूसरी स्त्री पर आसक्त हो जाने पर या उसके स्वर्ग चले जाने पर, मरने का निश्चय करके धैर्यसहित एवं स्पृहाहीन हो जाती हैं ॥२३॥ सती स्त्रियों को गहरे प्रेम का टूटना असह्य हो जाता है। हे राजन् इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ सुनो ॥२४॥ राजा श्रुतसेन की कथा प्राचीनकाल में दक्षिण भूमि के मोकर्क नामक नगर में कुल का भूषण और विद्वान् श्रुतसेन नामक राजा था ॥२५॥ सभी प्रकार के वैभवों से परिपूर्ण उस राजा को बस एक ही चिन्ता थी कि उसे अपने अनुकूल भार्या नहीं मिली थी ॥२६॥ एकबार राजा किसी विषय की चर्चा कर रहा था कि उसी समय अग्निधर्मा नामक ब्राह्मण ने उससे कहा—॥२७॥ 'महाराज मैंने अपने जीवन में जो आश्चर्य देखे उनका वर्णन करता हूँ सुनो—मैं तीर्थ यात्रा के प्रसंग में उस पंचतीर्थों में गया जिसमें पाँच अप्सराएँ ऋषि के शाप से ग्राह (मगर) बनकर रहती थीं वहीं पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से आये हुए अर्जुन (पांडव) ने उन अप्सराओं का उद्धार किया था ॥२८-२९॥ उस तीर्थ में स्नान करके पांच रातों तक उपवास करनेवाले मनुष्य नारायण के पार्षद (अनुचर) बन जाते हैं ॥३० ॥ किसान की कथा जब मैं उस तीर्थ की ओर गया तब मैंने हल से जोती हुई भूमि को देखा और एक खेत के बीच में बैठे हुए किसान को गाते हुए देखा ॥३१॥ उस मार्ग से चलते हुए किसी संन्यासी ने उससे मार्ग पूछा किन्तु गाने में तल्लीन कृषक ने उसे सुना नहीं ॥३२॥
७५ कथासरित्सागर
७५ कथासरित्सागर ततः स तस्मै चुक्रोध परिव्राड्विधुरो ब्रुवन्। सोऽपि गीतं विमुच्याथ कार्पटिकस्तमभाषत ॥३३॥ अहो प्रव्राजकोऽसि त्वं धर्मस्वार्थं न वेत्स्यसि। मूर्खेणापि मया ज्ञातं सारं धर्मस्य यत्पुनः ॥३४॥ तच्छ्रुत्वा किं त्वया ज्ञातमिति तेन च कौतुकात्। प्रव्राजकेन पृष्टः सन्कार्पटिकः स जगाद तम् ॥३५॥ इहोपविश प्रच्छाये शृणु यावद् वदामि ते। अस्मिन्प्रदेशे विद्यन्ते ब्राह्मणा भ्रातरस्त्रयः ॥३६॥ ब्रह्मदत्तः सोमदत्तो विष्णुदत्तश्च पुण्यकृत्। येषां ज्येष्ठौ दारवन्तौ कनिष्ठस्त्वपरिग्रहः ॥३७॥ स तयोर्ज्येष्ठयोराज्ञां कुर्वन् कर्मकरो यथा। मया सहासीदुच्छिन्नग्रहः तेषां हि कार्पिकः ॥३८॥ तौ च ज्येष्ठौ व्यबुध्येतां मृदु सं धृतिवर्जितम्। साधुमप्यत्यन्तसं मार्गमृजुमायासवज्जितम् ॥३९॥ एकदा भ्रातृजायाभ्यां सकामाभ्यां रहोऽथितः। कनिष्ठो विश्वदत्तोऽथ मातृत्वत्ते निराकरोत् ॥४० ॥ ततस्ते निजयोर्भर्त्रोरग्रे गत्वा मृषोचतुः। वाञ्छत्यावां रहस्येष कनीयान्युवयोरिति ॥४१॥ तेनं त प्रति तौ ज्येष्ठौ सान्तःकोपौ बभूवतुः। सदसद् वा न विद्मस्तु कुस्त्रीवचनमोहितौ ॥४२॥ अथतौ भ्रातरौ जातु विश्वदत्तं तमूचतुः। गच्छ त्वं क्षेत्रमध्यस्थं वल्मीकं त समीकुरु ॥४३॥ तथेत्यागत्य वल्मीक कुद्दालेनाखनत् स तम्। मा मैवं कृष्णसर्पोऽत्र वसतीत्युदितो मया ॥४४॥ तच्छ्रुत्वापि स वल्मीकमखनद्दृढभवत्त्विति। पापैषिणोरप्यादेशं ज्येष्ठभ्रात्रोरलङ्घयन् ॥४५॥ खन्यमानात्तत प्राप कलश हेमपूरितम्। न कृष्णसर्पं धर्मो हि सान्निध्यं कुरुते सताम् ॥४६॥ तं च नीत्वा स कलशं भ्रातृभ्यां सर्वमर्पयत्। निवार्यमाणोऽपि मया ज्येष्ठाभ्यां दृढभक्तितः ॥४७॥
षष्ठ लम्बक ७५१
षष्ठ लम्बक ७५१ तब व्यर्थ अपशब्द का प्रयोग करते हुए उस साधु ने उस किसान पर शाप किया। यह देखकर वह किसान गाना बन्द करके संन्यासी से कहने लगा ॥३३॥ 'आश्चर्य है कि तुम संन्यासी हो धर्म को नहीं जानते और मूर्ख होकर भी मैंने धर्म का सार जान लिया है' ॥३४॥ यह सुनकर साधु कौतुक से बोला—'तुमने क्या जाना ?' उत्तर देते हुए किसान ने कहा—'यहाँ छाया में बैठो और सुनो। मैं तुम्हें बताता हूँ इस प्रदेश में तीन ब्राह्मण भाई थे।—ब्रह्मदत्त सोमदत्त और पुण्यात्मा विष्णुदत्त। उनमें दो बड़े विवाहित थे और तीसरा अविवाहित था ॥३५-३७॥ वह तीसरा छोटा भाई राजाओं के समान दोनों बड़े भाइयों का काम नौकरों के समान करता था। मैं उन्हीं ग्रामों का किसान हूँ ॥३८॥ अत्यन्त मृदु, सीधे-सादे सन्मार्गगामी सरल-हृदय और दम्भ-रहित उस छोटे भाई को वे दोनों बड़े भाई मूर्ख और बुद्धिहीन समझते थे ॥३९॥ एक बार, उसकी दोनों बड़ी भाभियां उस पर आसक्त हो गईं और उन्होंने उससे प्रार्थना की किन्तु छोटे भाई विष्णुदत्त ने उन्हें माता के समान समझते हुए छोड़ दिया ॥४० ॥ तब उन दोनों ने अपने पतियों के पास जाकर मिथ्या भाषण करते हुए कहा कि 'तुम दोनों का छोटा भाई हमलोगों को एकान्त में चाहता है' ॥४१॥ यह सुनकर वे दोनों बड़े भाई, छोटे भाई के प्रति मन-ही-मन जल-भुन गये। सच है दुष्ट स्त्री के वचन से मोहित व्यक्ति सच और झूठ पर विचार नहीं करते ॥४२॥ एक बार वे दोनों भाई विष्णुदत्त से बोले—'तुम जाओ। खेत के बीच वल्मीक (बाँबी) को खोदकर बराबर करो' ॥४३॥ 'अच्छा' कहकर वह जाकर हथियार से मिट्टी के ढेर को बराबर करने लगा तो मैंने उसे रोका कि 'इसमें काला साँप है' ॥४४॥ यह सुनकर भी वह काटने से न हटा क्योंकि वह उन पापी बड़े भाइयों की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहता था ॥४५॥ खोदे जाते हुए वल्मीक से उसने सोने के मुक्ताहारों से भरा हुआ घड़ा प्राप्त किया। किन्तु काला साँप नहीं मिला क्योंकि धर्म सद्व्यक्तियों का साथ देता है ॥४६॥ मेरे रोकने पर भी उसने गहरी भक्ति (प्रेम) के कारण उस घड़े को ले जाकर बड़े भाइयों को सौंप दिया ॥४७॥
७५२ कथासरित्सागर
७५२ कथासरित्सागर तौ पुनस्तत एवांशं दत्त्वा प्रेर्य च घातकान्। तस्याच्छेद्यतां पाणिपादं धनजिहीर्षया ॥४८॥ तथापि न स चुक्रोध निर्मत्सयुर्भ्रातरौ प्रति। तेन सत्येन तस्याथ हस्तपादमजायत ॥४९॥ तदा प्रभृति तद्वुद्ध्वा त्यक्तः क्रोधोऽखिलो मया। त्वया तु तापसेनापि क्रोधोऽद्यापि न मुच्यते ॥५०॥ अक्रोधेन जितं स्वर्गं पश्यैतदधुनैव भोः। इत्युक्त्वैव तनुं त्यक्त्वा क्षापिकः स दिवं गतः ॥५१॥ इदमाश्चर्यं मया दृष्टं द्वितीयं शृणु भूपते। इत्युक्त्वा श्रुतसेनं स नृपं विप्रोऽब्रवीत्पुनः ॥५२॥ विद्युद्द्योतायाः श्रुतसेननृपतेश्च कथा ततोऽपि तीर्थयात्रार्थं पर्यटन्नम्बुधेस्तटे। अह वसन्तसेनस्य राज्ञो राष्ट्रमवाप्तवान् ॥५३॥ सत्रं भोक्तुं प्रविष्टं मां राजसत्रेऽब्रुवन् द्विजाः। ब्रह्मन् पथामुना मा गाः स्थिता ह्यत्र नृपात्मजा ॥५४॥ विद्युद्द्योताभिधाना तां पश्येदपि मुनिर्यदि। स कामशरनिर्भिन्नः प्राप्योन्मादं न जीवति ॥५५॥ ततोऽहं प्रत्यवोचं तान्नैतच्चित्रं सदा ह्यहम्। पश्याम्यपरकन्दर्पं श्रुतसेनमहीपतिम् ॥५६॥ यात्रादौ निर्गते यस्मिन्नरक्षिभिर्दृष्टिगोचरात्। उत्सार्यन्ते सतीवृत्तमङ्गीकृत्या कुलाङ्गनाः ॥५७॥ इत्युक्तवन्तं विज्ञाय भावकं भोजनाय माम्। नृपान्तिकं नीतवन्तौ सत्राधिपपुरोहितौ ॥५८॥ तत्र सा राजतनया विद्युद्द्योता मयेक्षिता। कामस्येव जगन्मोहम प्रविद्या शरीरिणी ॥५९॥ चिरात्तद्दर्शनक्षोभं नियम्याहमचिन्तयम्। अस्मत्प्रभावेनेद् भार्यैयं भवेद्राज्यं स विस्मरेत् ॥६०॥ तथापि कथनीयोऽयमुदन्तः स्वामिने मया। उन्मादिनीभ्येसेनवृत्तान्तो ह्यन्यथा भवेत् ॥६१॥
उन दोनों ने उस धन को लेकर और कुछ भाग उसे देकर, कुछ गुंडों को उभाड़ा और उस धन को भी लेने की इच्छा से उसके हाथ-पैर कटवा दिये ॥४८॥ इतने अत्याचार करने पर भी वह अपने बड़े भाइयों पर क्रुद्ध नहीं हुआ। फलतः इस सत्य वाक्य के प्रभाव से उसके हाथ-पैर ठीक हो गये ॥४९॥ उसे देखकर तब से मैंने सारा क्रोध छोड़ दिया। पर तुमने तपस्वी होकर भी अभी तक क्रोध नहीं छोड़ा ॥५०॥ इस प्रभाव के कारण ही मैंने स्वयं पर विजय पाई है। अभी देखो'—ऐसा कहकर वह विप्र अपना चोला (शरीर) त्यागकर उसी समय स्वर्ग को चला गया ॥५१॥ एक आश्चर्य तो मैंने यह देखा—'हे राजन् अब दूसरा सुनो—ऐसा कहकर वह ब्राह्मण राजा श्रुतसेन से यह कहने लगा ॥५२॥ वहाँ से मैं तीर्थयात्रा के लिए समुद्र-तट पर भ्रमण करते हुए राजा बसन्तसेन के राज्य में गया ॥५३॥
विद्युत्प्रभा और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू)
वहाँ पर राजा के भोजन-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ब्राह्मण लोग मुझसे कहने लगे— 'ब्राह्मण इस मार्ग से न जाओ। आगे मार्ग में राजा की कन्या बैठी है ॥५४॥ उसका नाम विद्युत्प्रभा है। उसे यदि कोई संयमी मुनि भी देख ले तो वह कामबाण से आहत होकर बच नहीं सकता' ॥५५॥ तब मैंने उन्हें कहा 'कि यह कोई आश्चर्य नहीं है। मैं दूसरे कामदेव के समान श्रुतसेन राजा को प्रतिदिन देखता हूँ। जिस राजा के बाहर निकलने पर सैनिक गण कुलस्त्रियों का उनका सती चरित्र भंग होने के भय से मार्ग से हटा देते हैं' ॥५६-५७॥ ऐसा कहते हुए मुझे आपका कृपापात्र समझकर सत्र के व्यवस्थापक और पुरोहित राजा के समीप ले गये ॥५८॥ वहाँ मैंने राजपुत्री विद्युत्प्रभा को देखा है। वह मानों काम की शरीरधारिणी जग मोहिनी पराविद्या है। उसके दर्शन से होनेवाले क्षोभ को बहुत विलम्ब के पश्चात् नियन्त्रित करके मैंने यह सोचा—'यदि यह हमारे स्वामी की पत्नी हो जाय तो वह सारा राज्यकार्य भूल जाय' ॥५९-६०॥ फिर भी मुझे यह समाचार तो प्रभु (आप) से कहना ही चाहिए अन्यथा देवसेन और उन्मादिनी की-सी गति हो जायगी ॥६१॥ ९५
७५४ कथासरित्सागर
७५४ कथासरित्सागर उन्मादिन्याः देवसेननृपतेश्च कथा देवसेनस्य नृपते पुरा राष्ट्रे वणिक्सुता। उन्मादिनीतमभूत्कन्या जगदुन्मादकारिणी ॥६२॥ आवेदितापि सा पित्रा न तेनात्ता महीभृता। विप्रैः कुलक्षणैरयुक्ता तस्य व्यसनरक्षिभिः ॥६३॥ परिणीता तदीयेन मन्त्रिमूर्येन सा ततः। वातायनात्प्रादारत्मानं राज्ञेऽस्मै आत्मवर्शयत ॥६४॥ तया मुनरुया राजेन्द्रो दूराद्दृष्टिविपाहतः। मुहुर्मुमूच्छे न रतिं लेभे नाहारमाहरत् ॥६५॥ प्राषितोऽपि च सद्मन्तं प्रमुखे सोऽथ मन्त्रिभिः। धार्मिकस्तां न जग्राह तत्सक्तश्च जहावसूनू ॥६६॥ तदीवृक्षे प्रमादेऽत्र कृते द्रोहः कृतो भवेत्। इत्यालोच्य मयोक्तं ते चित्रमेत्य ततोऽद्य तत् ॥६७॥ श्रुत्वैतत्स द्विजात्तस्मान्मदनाज्ञानिभ वचः। विद्युद्द्योताहृतमनाः श्रुतसेननृपोऽभवत् ॥६८॥ छद्माणं च विसृज्यैव तत्र विप्रं तमेव सः। तश्चाकरोद्यथानीयं शीघ्रं तां परिणीतवान् ॥६९॥ ततः सा नृपतेस्तस्य विद्युद्द्योता नृपात्मजा। शरीराभ्यतिरिक्तासीद् भास्करस्य प्रभा यथा ॥७०॥ अथ स्वयंवरोपागात् नृपं रूपगर्विता। कन्यका मानुदत्ताख्या महाधनवणिक्कता ॥७१॥ अधर्मभीत्या जग्राह स गजा तां वणिक्सुताम्। विद्युद्द्योताम तद्बुद्धया हृत्स्फोटम् व्यपद्यत ॥७२॥ राजाप्यागत्य तां कान्तां पश्यन्नेव तथागताम्। अङ्क कृत्वा रु विरपन् राज्ञ प्राणवियुज्यत ॥७३॥ ततो वणिक्सुता वह्निं भानुदत्ता विवेश सा। इत्थं प्रणष्टे गर्वं तन्पि राष्ट्रं सराजकम् ॥७४॥ अतो गजन् पृष्टस्य भङ्ग प्रेम्ण भूत्सद्द। वियोगेन मनस्विन्या दम्या पागवन्तपा ॥७५॥
षष्ठ लम्बक ४५५
षष्ठ लम्बक ४५५ उन्मादिनी और राजा देवसेन की कथा प्राचीन काल में राजा देवसेन के राष्ट्र में समस्त संसार को उन्मत्त बनाने वाली उन्मादिनी नाम की एक वैश्य-कन्या थी ॥६२॥ उसके पिता की प्रार्थना पर भी राजा ने ब्राह्मणों के उसे कुलक्षणा बताने के कारण ग्रहण नहीं किया ॥६३॥ उस कन्या को राजा के प्रधान मन्त्री ने ब्याह लिया। किसी समय उन्मादिनी ने खिड़की से अपना स्वरूप राजा को दिखा दिया। उसकी दृष्टि के विष से राजा बार-बार मूर्च्छित होने लगा और उसका मन भोजन पान तथा शयन आदि किसी कार्य में नहीं लगा ॥६४-६५॥ तदनन्तर उन्मादिनी के पति प्रधान-मन्त्री द्वारा राजा से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना किए जाने पर भी राजा ने धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उसे स्वीकार न किया और उसकी आसक्ति में अपने प्राण दे दिये ॥६६॥ इस प्रकार के प्रमाद के यहाँ होने पर स्वामी-द्रोह हो सकता है, यही सोचकर यह आश्चर्य मैंने आपसे कह दिया ॥६७॥ वह राजा श्रुतसेन कामदेव की आज्ञा के समान उस ब्राह्मण से यह वृत्तान्त सुनकर विद्युत्प्रभा पर हृदय से आसक्त हो गया ॥६८॥ तदनन्तर उस राजा ने उसी क्षण ब्राह्मण को विदा करके ऐसा प्रबन्ध किया कि विद्युत्प्रभा से उसका विवाह हो गया। विवाह हो जाने पर वह राजपुत्री विद्युत्प्रभा राजा श्रुतसेन से उसी प्रकार अभिन्न थी जैसे सूर्य की प्रभा सूर्य से अभिन्न होती है ॥६९-७०॥ कुछ समय के पश्चात् राजा श्रुतसेन के पास किसी महाधनी वैश्य की रूपगर्विता कन्या भानुदत्ता स्वयंवर के लिए आई ॥७१॥ अधर्म के भय से राजा ने वैश्यकन्या को ग्रहण कर लिया। यह जानकर राजा की पहली रानी विद्युत्प्रभा का हृदय विदीर्ण हो गया और वह मर गई ॥७२॥ राजा ने आकर जब अपनी पहली रानी को मरा हुआ देखा तब उसने उसे अपनी गोद में रख लिया और शोक में रीता हुआ वह भी उसी क्षण मर गया। उसके बाद वैश्य कन्या भानुदत्ता भी आग में कूद कर जल मरी। इस प्रकार, सारे राज्य का ही सत्यानाश हो गया ॥७३-७४॥ इसलिए महाराज उच्चकोटि के गहरे प्रेम जानकर मानिनी रानी वासवदत्ता के प्रेम का भंग अत्यन्त कष्टप्रद है ॥७५॥
४५६ कथासरित्सागर
४५६ कथासरित्सागर महामन्त्रिणो यौगन्धरायणस्य राजनैतिकः प्रपञ्चः (पूर्वानुवर्ती) तस्मात्कलिङ्गसेनेयं परिणीता यदि त्वया। देवी वासवदत्ता तत्तत्प्राणाञ्जह्यान्न संशयः ॥७६॥ देवी पद्मावती तद्वत्तयोरेकं हि जीवितम्। नरवाहनदत्तश्च पुत्रस्ते स्यात्कथं ततः ॥७७॥ तच्च देवस्य हृदयं सोढुं ज्ञाने न शक्नुयात्। एवमेकपदे सर्वमिदं नश्येन्महीपते ॥७८॥ देव्योर्यच्छोक्तिगाम्भीर्यं तदेव कथयत्यलम्। हृदयं जीवितत्यागगाढनिश्चितनिःस्पृहम् ॥७९॥ तत्स्वार्थो रक्षणीयस्ते तिर्यञ्चोऽपि हि जानते। स्वरक्षां किं पुनर्देव बुद्धिमन्तो भवादृशाः ॥८०॥ इति मन्त्रिवराच्छ्रुत्वा स्वैरं यौगन्धरायणात्। सम्यग्विवेकपदवीं प्राप्य वत्सेश्वरोऽब्रवीत् ॥८१॥ एवमेतन्न सन्देहो नश्येत्सर्वमिदं मम। तस्मात्कलिङ्गसेनायाः शोच्यं परिणयेन मे ॥८२॥ उक्तो सम्बन्ध दूरे यसद्युक्तं गणकै इतम्। स्वयंवरागतान्यागाद्धर्मो वा कियान्भवेत् ॥८३॥ इत्युक्तो वत्सराजेन हृष्टो यौगन्धरायणः। चिन्तयामास कार्यं न सिद्धप्रायं यथेप्सितम् ॥८४॥ उपायसरससिक्ता देशकालोपबृंहिता। सेयं नीतिमहावल्ली किं नाम न फलेत्फलम् ॥८५॥ इति सञ्चिन्त्य स ध्यायन् देशकालौ प्रणम्य तम्। राजानं प्रययौ मन्त्री गृहं यौगन्धरायणः ॥८६॥ राजापि रचितातिथ्यगताकारामुपेत्य सः। देवी वासवदत्तां तां सान्त्वयन्नेवमब्रवीत् ॥८७॥ किमर्थं वच्मि जानासि त्वमत्र हरिणाक्षि यत्। वारि वारिरुहस्येव त्वत्प्रेम मम जीवितम् ॥८८॥ मामापि हि किमन्यस्या ग्रहीतुमहमुत्सहे। कलिङ्गसेना तु हठादुपायाता गृहं मम ॥८९॥
षष्ठ लम्बक ७५७
षष्ठ लम्बक ७५७ मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपञ्च (चालू) अतः यदि तुमने कलिङ्गसेना का परिणय किया तो वासवदत्ता अवश्य प्राण-त्याग क्रमशः कर देगी इसमें संदेह नहीं ॥७६॥ रानी पद्मावती भी इसी प्रकार प्राण त्याग देगी क्योंकि दोनों एक प्राण हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की क्या स्थिति होगी ? ॥७७॥ यह सब अनर्थ आपका हृदय सहन कर सकेगा या नहीं यह मैं नहीं जानता किन्तु यह सब एक बार में ही नष्ट हो जायगा ॥७८॥ दोनों रानियों की बातों में जो गम्भीरता है वह इस बात की ओर स्पष्ट इंगित करती है कि उनका जीवन प्राण-त्याग के दृढ़ निश्चय से निःस्पृह है। जो भी हो तुम्हें अपने स्वार्थ की रक्षा करनी चाहिए यह बात तो पशु-पक्षी भी जानते हैं फिर आपके ऐसे बुद्धिमानों की बात ही क्या है ॥७९-८०॥ मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण से इस प्रकार सुनकर भली भाँति विचार-विमर्श करके वत्सेश्वर ने कहा—॥८१॥ 'ठीक है इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकार मेरा सारा संसार ही नष्ट हो जायगा। इसलिए अब कलिङ्गसेना के परिणय से मेरा कोई प्रयोजन नहीं ॥८२॥ गणकों (ज्योतिषियों) ने भी लग्न का दूर समय देकर अच्छा ही किया। स्वयंवरा स्त्री का त्याग करने से ही इतना अभय होगा' ॥८३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर प्रसन्न हुए यौगन्धरायण ने सोचा कि कार्य तो जैसा हम चाहते थे वैसा सिद्ध हो गया। उपाय-रूपी जल से सींची हुई और देश-काल के अनुसार बढ़ी हुई नीति-रूपी यह लता समय पर फल क्यों न देगी ? ॥८४-८५॥ ऐसा सोचकर और देश-काल का ध्यान करता हुआ मन्त्री राजा को प्रणाम करता हुआ घर चला गया ॥८६॥ राजा भी कृत्रिम शिष्टाचार से अपने भाव को छिपाते हुए रानी वासवदत्ता को सान्त्वना देता हुआ कहने लगा—॥८७॥ 'हे मृगनयने मैं किसलिए कह रहा हूँ यह तुम जानती हो ? कमल के लिए जल के समान तुम्हारा प्रेम ही मेरा जीवन है ॥८८॥ मैं किसी दूसरी स्त्री का नाम लेने का भी साहस नहीं करता। किन्तु कलिङ्गसेना तो हठ- पूर्वक मेरे घर आ गई ॥८९॥
७५८ कथासरित्सागर
७५८ कथासरित्सागर प्रसिद्धं भ्राम मद्गम्भा तपःस्थेन निराकृता। पार्थेन षण्ढताशापं ददौ तस्यै रुष्टागता ॥९०॥ स शापस्तिष्ठता तेन वर्षे वैराटवेश्मनि। स्त्रीवेषेण महाश्चर्यरूपेणाप्यतिवाहितः ॥९१॥ अत कलिङ्गसेनापा निषिद्धा न तदा मया। विना स्वदिच्छयाह सु न किञ्चिद् वक्तुमुत्सहे ॥९२॥ इत्याश्वास्योपसङ्गम्याथ हृदयेनेव रागिणा। मुखार्पितेन मद्येन सत्यं नूनं सवाद्ययम् ॥९३॥ तयैव सह रात्रि तां राज्ञा वासभवसया। मधिमुख्यमतिप्रीतिदुष्टो वत्सेश्वरोऽवसत् ॥९४॥ अत्रान्तरे च य पूर्व दिवारात्रौ प्रयुक्तवान्। कलिङ्गसेनावृत्तान्तमपश्यं योगन्धरयणः ॥९५॥ स ब्रह्मराक्षसोऽभ्येत्य सहूद्यागेश्वराभिधः। तस्यामेव निशि स्वैरं तं मन्त्रिवरमम्यभात् ॥९६॥ कलिङ्गसेगासदने स्थितोऽस्म्यन्तर्धहि सदा। दिव्यानां मानुषाणां वा पश्यामि न समागमम् ॥९७॥ अद्याभ्यस्तो मया कश्च धूतोऽकस्मात्नभस्तले। प्रच्छन्नेनात्र हर्म्याग्रसन्निकर्षे निशामुखे ॥९८॥ प्रभावं तस्य विज्ञातु प्रयुक्तापि तदा मम। विद्या न प्राभवत्तेन विमुद्याहमचिन्तयम् ॥९९॥ अय दिव्यप्रभावस्य कस्य कस्यापि निश्चितम्। कलिङ्गसेनाभावव्यालुब्धस्य भ्रमतोऽम्बरे ॥१००॥ येन न गम्यते विद्या तद्वीक्षे किञ्चिदन्तरम्। न दुष्प्रापं परच्छिद्रं जाग्रद्भिर्निपुणैर्येस ॥१०१॥ दिव्यानां नान्तिछुतैरपि प्रोक्तं मन्त्रिवरेण च। सोमप्रभा सखी याम्या वदन्त्येतन्मया श्रुता ॥१०२॥ इति निश्चित्य तत्तुभ्यमिहाहं वक्तुमागतः। इदं प्रमन्तात्पृच्छामि तन्मे तावत्ख्याप्यताम् ॥१०३॥ सिद्ध्यन्तोऽपि हि शंसन्ति स्यात्मानमिति यद्वथा। उक्तो राजा तदर्थोप योगादहमुपस्थित ॥१०४॥
षष्ठ लम्बक ७५९
षष्ठ लम्बक ७५९ यह बात प्रसिद्ध है कि तपस्या में बैठे हुए अर्जुन ने हठपूर्वक आई हुई रम्भा को दूर कर दिया था और उसने अर्जुन को षण्ढ (नपुंसक) होने का शाप दिया था ॥९१॥ उस शाप के समय को अर्जुन ने आश्चर्यमय रूप से स्त्रीवेष धारण करके विराट् के भवन में व्यतीत किया था ॥९२॥ इसीलिए मैंने उसी समय कलिङ्गसेना का निषेध नहीं किया क्योंकि तुम्हारी इच्छा के बिना कुछ भी कहने का साहस नहीं कर सकता' ॥९२॥ इस प्रकार आश्वासन देकर मानो प्रेमपूर्ण हृदय के समान उसके मुंह में लगाये हुए मद्य से उसके दृष्ट भाव को समझकर मुख्यमन्त्री की प्रौढ़ बुद्धि से सन्तुष्ट राजा उस दिन रात को वासवदत्ता के साथ वहीं रह गया ॥९३-९४॥ इसी बीच यौगन्धरायण ने कलिङ्गसेना का समाचार जानने के लिए जिसे दिन-रात के लिए नियुक्त किया था वह योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस उसी रात को यौगन्धरायण के पास आया और कहने लगा— मैं कलिङ्गसेना के भवन में बाहर और भीतर सदा उपस्थित रहता हूँ किन्तु वहाँ दिव्य या मानव किसी भी व्यक्ति का आगमन मैंने नहीं देखा ॥९५-९७॥ आज छिपे हुए मैंने भवन की ऊपरी छत के पास सायंकाल के समय आकाश में अकस्मात् शब्द सुना ॥९८॥ उस शब्द की उत्पत्ति का स्थान जानने के लिए मैंने अपनी विद्या का प्रयोग भी किया किन्तु विद्या का कुछ प्रभाव न देखकर मैंने सोचा कि निश्चय ही कलिङ्गसेना के लावण्यलोभी किसी दिव्य प्रभाववाले आकाशचारी व्यक्ति का यह शब्द है ॥ ९९ ॥ इसीलिए मेरी विद्या काम नहीं कर रही है क्योंकि सावधान और चतुर व्यक्ति के लिए दूसरे का छिद्र दुष्प्राप्य नहीं होता ॥१००॥ यह कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों में चाही जा रही है यह बात (मन्त्रिवर) आपने भी कही थी और मैंने भी उसकी सखी सोमप्रभा को ऐसा कहते हुए सुना है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके मैं आपको कहने के लिए यहाँ आया हूँ और प्रसंगवश मैं यह पूछता हूँ बताइए ॥१०२॥ आपकी आज्ञा से यह कहते हुए मैंने छिपकर सुन लिया कि पद्मावती भी अपनी रक्षा करके ॥१०३॥
४६० कथासरित्सागर
४६० कथासरित्सागर निदर्शनं चेदत्रास्ति तन्मे कथय सम्मते। इति योगेश्वरेणोक्त स्माह यौगन्धरायणः ॥१०५॥ उत्सन्ननकुलमूषकमार्जारणां कथा अस्ति मित्र तथा चात्र कथामाख्यामि ते श्रृणु। विदिशानगरीबाह्ये न्यग्रोधोऽभूत्पुरा महान् ॥१०६॥ चत्वारः प्राणिनस्तत्र वसन्ति स्म महातरौ। नकुलालूकमार्जारमूषकाः पृथगालयाः ॥१०७॥ भिन्ने भिन्ने बिले मूल आस्तां नकुलमूषकौ। मार्जारो मध्यभागस्थे तरोर्महति कोटरे ॥१०८॥ उलूकस्तु शिरोभागे नान्यलभ्ये लतास्ये। मूषकोऽत्र त्रिभिर्वध्यो मार्जारिण त्रयोऽपरे ॥१०९॥ अभ्याय मार्जारभयान्मूषको नकुलस्तथा। स्वभावेनाप्युलूकश्च परिभ्रेमुर्निशि त्रयः ॥११०॥ मार्जारश्च दिवारात्रौ निर्भयः प्रभ्रमन्मसौ। तत्रासन्ने यवक्षेत्रे सदा मूषकलिप्सया ॥१११॥ येऽप्येऽपि युवतया जग्मुस्तत्स्वकालेऽन्नाभिवाञ्छया। एकदा लुब्धकस्तत्र चण्डालः कश्चिदाययौ ॥११२॥ स मार्जारपदश्रेणिं दृष्ट्वा तत्क्षेत्रगामिनीम्। तद्वधायामितः क्षेत्रं पाशान् वत्त्वा ततो ययौ ॥११३॥ तत्र रात्रौ च मार्जारः स मूषकजिघांसया। एत्य प्रविष्टस्तत्पाशैः क्षेत्रे तस्मिन्नबध्यत ॥११४॥ मूषकोऽपि ततोऽन्नार्थी स तत्र निभृतागतः। बद्धं तं वीक्ष्य मार्जारं जहर्ष च ननर्त च ॥११५॥ यावद् विशति तत्क्षेत्रं दूरादेवैष तर्र्तमा। तत्र तौ तावदायातावृलूकनकुलावपि ॥११६॥ दृष्टमार्जारबन्धौ च मूषकं लब्धुमैच्छताम्। मूषकोऽपि च तद्दृष्ट्वा दूराद् खिन्नो व्यचिन्तयत् ॥११७॥ नकुलोलूकभयदं मार्जारं सन्धये यदि। बद्धोऽप्येकप्रहारेण शत्रुममिमं मारयेत् ॥११८॥
दीप्तप्रसन्न ने कहा—'मित्र इसका उदाहरण है। सुनो इस विषय की एक कथा
षष्ठ स्तबक ७६१ इस विषय में कोई उदाहरण है तो मुझे बताइए। मोयोद्धर के इस प्रकार कहने पर दीप्तप्रसन्न ने कहा—'मित्र इसका उदाहरण है। सुनो इस विषय की एक कथा कहता हूँ॥१५॥
उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा
प्राचीन समय में विदिशा नगरी के बाहर बहुत विशाल एक वटवृक्ष था॥१६॥ उस वृक्ष में नेवला, उल्लू, बिल्ली और चूहा ये चार प्राणी अपना पृथक्-पृथक् स्थान बनाकर रहते थे। वृक्ष की जड़ में पृथक्-पृथक् बिलों में चूहा और नेवला रहा करते तथा बिल्ली वृक्ष के बीच के एक कोटर (खोलसे) में और उल्लू सबसे ऊपर लता से घिरी हुई डाली में रहता था जहाँ किसी की पहुँच न थी। इनमें चूहा तीनों के लिए बध्य था और शेष तीनों बिल्ली के लिए बध्य थे॥१७-१९॥
उनमें चूहा और नेवला बिल्ली से भयभीत होकर अन्न के लिए तथा उल्लू स्वभाव से भोजन के लिए, ये तीनों ही रात में घूमा करते थे॥११॥ और बिल्ली निर्भय होकर दिन-रात चूहे की खोज में जौ के खेत में चक्कर लगाया करती थी॥१२१॥
एक बार जबकि भोजन की खोज में वन्य जानवर भी इधर-उधर गये हुए थे तब इसी पर वहाँ एक बहेलिया चांडाल आ गया॥१२२॥ वह वहाँ पर बिलाव (बिल्ली) के पैरों के चिह्नों को खेत की ओर जाते देखकर, खेत में चारों ओर जाल बाँधकर चला गया॥११३॥ उस खेत में रात को बिलाव चूहे को मारने की इच्छा से घुसा और वहीं वह जाल में फँस गया॥११४॥ अन्न खाने के लालच से धीरे-धीरे और चुपचाप चूहा भी उस खेत में आया और वहाँ बिलाव को बँधा देखकर प्रसन्न होकर नाचने लगा॥११५॥ जब चूहा एक मार्ग से उस खेत में घुसा तभी नेवला और उल्लू भी दूसरे मार्ग से उसी स्थान पर आ गये॥११६॥ बिलाव को बँधा देखकर वे दोनों चूहे को ढूंढने लगे। चूहा दूर से ही उनकी गतिविधि को देखकर घबराकर सोचने लगा—॥११७॥ 'यदि मैं नेवले और उल्लू को भय देनेवाला बिलाव का आश्रय (शरण) लूँ तो जाल में बँधा हुआ भी यह शत्रु मुझे एक ही प्रहार में मार देगा॥११८॥ ९६
७६२ कथासरित्सागर
७६२ कथासरित्सागर मार्जाराद्दूरगं हन्यादुलूको नकुलश्च माम्। तच्छत्रुसङ्कटगतः क्व गच्छामि करोमि किम् ॥११९॥ हन्त ! मार्जारमेवेह श्रयाम्यापद्गतो ह्ययम्। आत्मत्राणाय मां रक्षोत्पाशच्छेदोपयोगिनम् ॥१२०॥ इत्यालोच्य शनैर्गत्वा मार्जारं मूषकोऽब्रवीत्। बदे त्वम्ववितुर्श मे तत्ते पाशं छिनद्म्यहम् ॥१२१॥ ऋजूनां जायते स्नेहः सहवासाद्विपुष्वपि। किं तु मे नास्ति विश्वासस्तव चित्तमजानतः ॥१२२॥ तच्छ्रुत्वोवाच मार्जारो भद्र विश्वस्यतां मया। अद्य प्रभृति मे मित्रं भवान् प्राणप्रदायकः ॥१२३॥ इति श्रुत्वैव मार्जारातस्योत्सङ्गे स शिश्रिये। तद्दृष्ट्वा नकुलोलूकौ निराशौ ययतुस्ततः ॥१२४॥ ततो जगाद मार्जारो मूषकं पाशपीडितः। गतप्राया निशा मित्र ! तत्पाशाच्छिन्धि मे द्रुतम् ॥१२५॥ मूषकोऽपि शनैश्छिन्दल्लुब्धकागमनोन्मुखः। मुधा कटकटायद्भिर्दशनैरकरोद्चिरम् ॥१२६॥ क्षणान्नात्रौ प्रभातायां लुब्धके निकटमागते। मार्जारैर्दूर्यमाने द्राक्पाशांश्छिच्छेद मूषकः ॥१२७॥ छिन्नपाशोऽथ मार्जारे रभ्यस्त्रासविद्रुते। मूषको मृत्युमुक्तः सम्प्लाव्य प्राविशद् बिलम् ॥१२८॥ नावसत् पुनराहूतो मार्जारेण जगाद च। कालयुक्त्या ह्यरिर्मित्रं जायते न च सर्वदा ॥१२९॥ एवं बहुभ्यः शत्रुभ्यः प्रज्ञयात्माभिरक्षितः। मूषकेन तिरश्चापि किं पुनर्मानुषेषु यत् ॥१३०॥ एतदुक्तस्तदा राजा मया यत्तन्मया श्रुतम्। धृत्या कार्यं निजं रक्षेद्वेबीसरक्षणादिति ॥१३१॥ बुद्धिनां च सर्वत्र मुख्यं मित्रं न पीड्यम्। योगेश्वर तथा चैतामत्रापि त्वं कथां शृणु ॥१३२॥ १ इयं कथा महाभारतस्य शान्त्य पर्वणि पञ्च तन्त्र चोपलभ्यते।
पञ्च स्तबक ७६१ बिलाव से दूर रहने पर तो उल्लू और नवला दोनों ही मुझे मार देंगे। इसलिए इस प्रकार शत्रुओं के संकट में पड़ा हुआ मैं कहाँ जाऊँ ॥११०॥ अच्छा हो कि विपत्ति में पड़ा हुआ मैं बिलाव की ही शरण में जाऊँ। मुझे जाल काटने में ज्ञानी जानकर सम्भव है वह अपनी रक्षा के लिए मेरी भी रक्षा करे ॥११२ ॥ ऐसा सोचकर और धीरे-२ उसके पास जाकर चूहा उससे कहने लगा — तुम्हारे बंधन से मुझे अत्यन्त दुःख है। इसलिए मैं तुम्हारा जाल काटता हूँ ॥१२१॥ सरस व्यक्तियों का साथ रहने के कारण शत्रुओं पर भी प्रेम हो जाता है। किन्तु, तुम्हारे प्रेम को न जाननेवाले मुझे तुम पर विश्वास नहीं है ॥१२२॥ यह सुनकर बिलाव कहने लगा 'भद्र ! तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए। आज से मेरे प्राण बचानेवाले तुम मेरे मित्र हुए ॥१२३॥ बिलाव से ऐसा सुनकर चूहा उसकी गोद में जा छिपा। यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों निराश होकर वहाँ से चल गये ॥१२४॥ तब जाल से बँधा हुआ बिलाव चूहे से कहने लगा 'मित्र ! रात बीतती गई है। इसलिए मेरे बंधनों को शीघ्र काटो ॥१२५॥ बहेलिये के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हुआ चूहा झूठे ही दाँत फटफटाता हुआ बन्धनों को काटने में विलम्ब करने लगा ॥१२६॥ प्रातःकाल होने और बहेलिये के निकट आ जाने पर और बिलाव के दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर, चूहे ने तुरन्त जाल के बंधन काट डाले ॥१२७॥ जाल काटने के पश्चात् बहेलिये के भय से बिल्ली के भाग जाने पर मृत्यु से छूटा हुआ चूहा भी भागकर बिल में घुस गया ॥१२८॥ बिलाव द्वारा फिर विश्वास दिलाकर बुलाने पर भी उसने उसका विश्वास नहीं किया और कहने लगा— 'समय आने पर ही शत्रु मित्र बनता है सदा नहीं ॥१२९॥ इस प्रकार चूहे ने और भी बहुत-से पशुओं ने अपने शत्रुओं से बुद्धिमानी के साथ आत्म रक्षा की मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥१३ ० ॥ जो तुमने मुझसे सुना है वही मुझसे कहा गया राजा अपनी बुद्धि से महारानी की रक्षा करते हुए अपने कार्य की भी रक्षा कर सकता है ॥१३१॥ बुद्धि ही सर्वत्र प्रधान मित्र है पुरुषार्थ नहीं। हे योगेश्वर ! इस कथा को भी सुनो ॥१३२। १ यह कथा महाभारत के १२वें पर्व में तथा पंचतंत्र में भी मिलती है।—अनु
श्रावस्तीत्यस्ति नगरी तस्यां पूर्वं प्रसेनजित्। राजाभूत्तत्र चाभ्यागात्कोऽप्यपूर्वो द्विजः पुरि॥१३३॥ सोऽशूद्राश्रमगुप्तेन धनिना गुणवानिति। ब्राह्मणस्य गृहे तत्र कस्यचित्स्थापितो द्विजः॥१३४॥ तत्रैव तेन शुष्कान्नदक्षिणादिभिरन्वहम्। आपूर्यत ततोऽन्यैश्च धनेर्वृद्ध्वा वणिग्वरैः॥१३५॥ तेनासौ हेमदीनारसहस्रं कृपणः क्रमात्। सञ्चित्य गत्वारण्ये तन्निखत्य क्षिप्तवान् भुवि॥१३६॥ एकाकी प्रत्यहं गत्वा तच्च स्थानमवैक्षत। एकदा हेमशून्यं तत्खातं व्यक्तं च दृष्टवान्॥१३७॥ शून्यं तत्खातकं तस्य पश्यतो हृतचेतसः। न परं हृदि संक्रान्ता चित्रं दिक्ष्वपि शून्यता॥१३८॥ अथोपागाच्च विलपंस्तं विप्रं यद्गृहे स्थितः। पृष्टस्तं च स्ववृत्तान्तं तस्मै सर्वं न्यवेदयत्॥१३९॥ गत्वा तीर्थमभुञ्जानः प्राणांस्त्यक्तुमियेय च। बुबुध्वा च सोऽन्नदातास्य वणिगन्यै सहायिनौ॥१४०॥ स तं जगाद किं ब्रह्मन् ! वित्तहेतोर्मुमूर्षसि। अकारुणेभवद् वित्तमकस्मादेति याति च॥१४१॥ इत्यायुक्तोऽपि तेनासौ न जहौ मरणग्रहम्। प्राणेभ्योऽप्यर्थमात्रा हि कृपणस्य गरीयसी॥१४२॥ ततश्च मृत्यवे तीर्थं गच्छतोऽस्य द्विजन्मनः। स्वयं प्रसेनजिद्राजा तद्बुद्धवान्तिकमाययौ॥१४३॥ पप्रच्छ चैनं किं किञ्चिद्वेत्सि तत्राप्तसंज्ञकम्। यत्र भूमौ निखातस्ते दीनारा ब्राह्मण! त्वया॥१४४॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीदस्ति क्षुद्रोऽत्र पादपः। अटव्यां देव तन्मूले निखातं तन्मया धनम्॥१४५॥ इत्याकर्ण्याब्रवीद्राजा दास्याम्यन्विष्य तत्तव। धनं स्वकोषादथवा मा त्याक्षीर्जीवितं द्विज॥१४६॥ इत्युक्त्वा मरणोद्योगात्निवार्य विनिधाय च। द्विजं तं वणिजो हस्ते स राजाभ्यन्तरं ययौ॥१४७॥
षष्ठ लम्बक ७६५
षष्ठ लम्बक ७६५ श्रावस्ती नाम की एक नगरी है। उसमें पहले प्रसेनजित् नाम का राजा राज्य करता था। वहाँ एक बार एक कोई अनूक्त ब्राह्मण आया ॥१३३॥ वह शूद्र का अन्न नहीं खाता था। इसलिए एक वैश्य ने उसे तपस्वी समझकर किसी ब्राह्मण के घर ठहरा दिया ॥१३४॥ धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि होने पर उस ब्राह्मण के घर को अन्यान्य वैश्यों ने मूले अन्न और धन से भरपूर कर दिया ॥१३५॥ उस संग्रह से उस कंजूस ब्राह्मण ने एक सहस्र मुद्राएँ एकत्र कर लीं और जङ्गल में जाकर भूमि खोदकर उन्हें गाड़ दिया ॥१३६॥ और, प्रतिदिन वहाँ अकेला जाकर उस स्थान को वह देख आता था। एक दिन उसने उस स्थान को खुदा हुआ और मुद्रारून्य पाया ॥१३७॥ उस गड्ढे को मुद्रा-रहित देखकर हताश उस ब्राह्मण के हृदय में ही नहीं प्रत्युत दिशाओं में भी शून्यता फैल गई अर्थात् उसे सभी ओर अँधेरा दीखने लगा ॥१३८॥ तदनन्तर रोता विलाप करता हुआ वह ब्राह्मण वहाँ आया जहाँ ठहरा हुआ था। वहाँ के गृहस्वामी ब्राह्मण द्वारा पूछे जाने पर अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया ॥१३९॥ और, वह अनशन करके तीर्थ में प्राण देने की इच्छा प्रकट करने लगा। यह जानकर वह उसका अन्नदाता वैश्य भी अन्य बनियों के साथ वहाँ आया ॥१४०॥ आकर उस ब्राह्मण से वह कहने लगा हे ब्रह्मन् ! धन के लिए क्या मरना चाहता है ? बलाहक-मेघ के समान धन आता है और चला जाता है ॥१४१॥ इस प्रकार अनेक बातों से सान्त्वना देने पर भी उस ब्राह्मण ने मरने का आग्रह न छोड़ा क्योंकि कंजूस के लिए धन की माया प्राणों से भी प्यारी और भारी होती है ॥१४२॥ तदनन्तर मरने के लिए तीर्थयात्रा करनेवाले उस ब्राह्मण को सुनकर प्रसेनजित् स्वयं उसके पास आया ॥१४३॥ और पूछा कि 'जहाँ तुमने मुहरें गाड़ी थीं वहाँ पर कोई चिह्न भी है' १४४॥ यह सुनकर उस ब्राह्मण ने कहा—'वहाँ पर एक छोटा-सा स्तूप (पेड़) है सम्भवत उसी की जड़ में मैंने वह धन गाड़ दिया था ॥१४५॥ यह सुनकर राजा ने उससे कहा—'मैं उस दैववश मुहरें दे दूंगा अथवा अपने कोष से तुम्हें दे दूंगा। इसलिए तुम प्राण न छोड़ो ॥१४६॥ ऐसा कहकर ब्राह्मण को मरने के प्रयत्न से रोककर और उस वैश्य के हाथ सौंपकर राजा अपने महल को चला गया ॥१४७॥
४६६ कथासरित्सागर
४६६ कथासरित्सागर तत्रादिश्य प्रतीहारं शिरोऽर्त्तिव्यपदेशतः । वैद्यानानाययत्सर्वान् दत्त्वा पटहघोषणाम् ॥१४८॥ आतुरास्ते कियन्तोऽत्र कस्यादः किं स्वमौषधम् । इत्युपानीय पप्रच्छ तानेकैकं विविक्तगः ॥१४९॥ तत्रेपि तस्म त्त्वेकैकं सर्वमूचुर्महीपते । एकाऽथ वैद्यस्तन्मध्यात् क्रमपृष्टोऽब्रवीदिदम् ॥१५०॥ वणिजो मातुलत्तस्य देव नागबला गया। अस्वस्थस्योपदिष्टाद्य द्वितीय दिनमोषधिः ॥१५१॥ तच्छ्रुत्वा स तमाहूय राजा वणिजमभ्यधात्। ननु नागबला केन तवानीतोच्यतामिति ॥१५२॥ देव कर्मकरेणेति तेनोक्ते वणिजा ततः। क्षिप्रमानाय्य तं राजा स कर्मकरमब्रवीत् ॥१५३॥ त्वया नागबलाहेतोः खनता क्षितितस्तलम् । दीनारजातं यल्लब्धं ब्रह्मस्वं तत्समर्पय ॥१५४॥ इत्युक्तो भूभृता भीतः प्रतिपद्यैव तत्क्षणम् । स तानानीय दीनारांस्तत्र कर्मकरो जहौ ॥१५५॥ राजाऽप्युपोषितायास्मै द्विजायहूय तान् ददौ । दीनारान् हारितप्राप्तान् प्राणानिव बहिश्चरान् ॥१५६॥ एवं स लब्धवान् बुद्ध्या भीत मुक्तात्तातरो । द्विजार्थ भूपतिर्ज्ञान्नोपधिं तां तदुद्भवम् ॥१५७॥ तदेवं सर्वदा बुद्धेः प्राधान्यं जितपौरुषम्। ईदृशेषु च कार्येषु किं विदध्यात् पराक्रमः ॥१५८॥ तद्योगेश्वर कुर्वीथास्त्वमपि प्रज्ञया तथा। यथा कलिङ्गसेनाया दोषो ज्ञायेत कश्चन ॥१५९॥ अस्ति चैतद्यथा तस्यां लम्पन्तीह सुरासुराः । तथा च दिवि कन्यापि निशि द्याभ्यः श्रुतस्त्वया ॥१६०॥ सम्प्रेक्ष्य दोषे कस्याञ्च भवेदङ्कुशता न न । नोपयच्छेत तां राजा न चाधर्म कृतो भवेत् ॥१६१॥ इत्युदारधियः श्रुत्वा सर्वं यौगन्धरायणात् । योगेश्वरस्तं सन्तुष्य जगाद प्रह्वराक्षसः ॥१६२॥
षष्ठ लम्बक ४१७
षष्ठ लम्बक ४१७ यहाँ आकर शिरःपीड़ा का बहाना करके द्वारपाल द्वारा नगाड़े पर घोषणा कराकर राजा ने नगर के सभी वैद्यों को बुलवाया ॥१४८॥ और, एक-एक वैद्य को अलग-अलग बुलवाकर पूछने लगा कि तुम्हारे कितने रोगी हैं और तुमने किसे-किसे कौन-कौन-सी दवा दी है? ॥१४९॥ उन वैद्यों ने भी एक-एक करके अपना-अपना विवरण राजा को सुनाया। उनमें से एक वैद्य ने क्रमशः अपनी बारी आने पर राजा से यह कहा ॥१५०॥ 'महाराज रोगी मातुलत्त नामक वैश्य को मैंने नागबला नाम की औषधि बताई थी आज दूसरा दिन है। यह सुनकर राजा ने मातुलत्त वैश्य को बुलवाकर कहा-'तुम्हारे लिए नागबला कौन लाया था? बताओ' ॥१५१-१५२॥ 'महाराज मेरा भृत्य (नौकर) लाया था। बनिये के ऐसा उत्तर देने पर राजा ने उस भृत्य को बुलवाकर कहा 'तू ने नागबला के लिए भूमि खोदते हुए जो मुहरों की राशि प्राप्त की है वह ब्राह्मण का धन है, उसे दे दे' ॥१५३-१५४॥ राजा के ऐसा कहने पर भयभीत नौकर ने उसी समय मुहरें लाकर वहीं रख दीं ॥१५५॥ तदनन्तर राजा ने अनुग्रह करते हुए ब्राह्मण को बुलवाकर, उस कंजूस ब्राह्मण के बाहरी प्राणों के समान चोरी होकर मिली हुई मुहरें उसे दे दीं ॥१५६॥ इस प्रकार राजा ने वृक्ष के नीचे से ले जाये गये धन को बुद्धिबल से ब्राह्मण को प्राप्त करा दिया, क्योंकि वहाँ उत्पन्न हुई ओषधि का वह जानता था ॥१५७॥ अतएव पुरुषार्थ के ऊपर सदा बुद्धि की प्रधानता रहती है। शुभ कार्यों में पौरुष क्या कर सकता है? ॥१५८॥ इसलिए हे प्राणेश्वर ! तुम भी बुद्धिबल से कुछ ऐसा करना जिससे कलिङ्गसेना का सोच दोष टाला जा सके ॥१५९॥ यह बात तो है कि उस कलिङ्गसेना पर दया और मधुर संगीतकला दोनों हैं और रात में तुमने ऐसा कुछ शब्द भी सुना है ॥१६०॥ उसका दोष मिलने पर उसका और हमारा कल्याण न होगा। राजा आगे विवाह न करेगा इसलिए अधर्म भी नहीं होगा ॥१६१॥ उधर बन्दिवाले यौगन्धरायण के पद सुनकर वत्सनरेश दोषदण्ड उत्तप्त होकर बोला-॥१६२॥
७६८ कथासरित्सागर
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कस्त्वया सदृशो नीतावन्यो देवाद् बृहस्पते। अमृतसेकोऽप्य रक्षन्मन्त्रो राज्यशासिनः॥१६३॥ सोऽहं कलिङ्गसेनाया जिज्ञासिष्ये गतिं सदा। बुद्ध्या शक्त्यापि चेत्युक्त्वा ततो योगेश्वरो ययौ॥१६४॥ तत्कालं सा च हर्म्याग्रं पर्यटन्तं स्वहर्म्यगा। कलिङ्गसेना वत्सशं दृष्ट्वा दृष्ट्वा स्म साम्यति॥१६५॥ तन्मनाः स्मरसन्तप्ता मृणालाङ्कुरहारिणी। सा श्रीखण्डाङ्गरागा च न लेभे निर्वृतिं क्वचित्॥१६६॥ अत्रान्तरे स सो पूर्वं दृष्ट्वा विद्याधराधिपः। तस्थौ मदनवेगाख्यो गाढानङ्गशरादितः॥१६७॥ सम्प्राप्तमे तपः कृत्वा वरे शम्भोर्निशाचरात्। सान्यासक्ताप्यवेक्षस्था सुतं प्राप्स्यस्य नामवत्॥१६८॥ यतस्तेनान्तरं लब्धुमसो विद्याधराधिपः। रजनीषु दिवि भ्राम्यन्नासीत्तन्मन्दिरोपरि॥१६९॥ संस्मृत्य तु तमादेशं तपस्तुष्टस्य धूर्जटेः। एकस्या निशि वत्सेशरुपं चक्रे स्वविद्यया॥१७०॥ तद्रूपश्च विवेशास्य मन्दिरं द्राग्यवन्तिनः। कालक्षेपाक्षमो गुप्तं मन्त्रिणां स इवागतः॥१७१॥ कलिङ्गसेनाप्युत्तस्थौ तं दृष्ट्वोत्कम्पविह्वला। न सोऽयमिति सा रात्रेर्वार्यमाणेव भूयणे॥१७२॥ ततो वत्सेशरूपेण क्रमाद् विश्वास्य तेन सा। भार्या मदनवेगेन गान्धर्वेविधिना कृता॥१७३॥ सत्कार्ल च प्रविष्टस्तद्दृष्ट्वा योगावलक्षितः। योगेश्वरो विषण्णोऽभूद् वत्सेशालोकनभ्रमात्॥१७४॥ योगन्धरायणाद्येषाद् गत्वोक्तवा तन्निवेशतं। युक्त्या कामव्यवस्थाया वत्सशं वीक्ष्य पार्श्वगम्॥१७५॥ बुञ्जे मन्त्रिवरोक्त्यैव रूपं सुप्तस्य भेदितुम्। कलिङ्गसेना प्रच्छन्नशायिनं सोऽन्यमत्युत॥१७६॥ गत्वा कलिङ्गसेनायाः सुप्तायाः शयनीयके। सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपे स्थितमैक्षत॥१७७॥