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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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सप्तम लम्बक १४५ और, उसी सुरंग के रास्ते उस युवा पुरुष को भू-गृह में लेजाकर रख दिया और सुरंग को बन्द कर दिया ।।६२।। बेरोक-टोक मौका पाकर दुष्ट बुद्धिवाले नीच पुरुष मूर्ख व्यक्तियों पर कौन-सा साहसिक कुकर्म नहीं कर डालते ? ।।६३।। ऐसा प्रबन्ध करके दूसरे दिन प्रातःकाल वैद्य ने सभी राज-कर्मचारियों से कहा कि मैंने राजा का बुढ़ापा छह् महीनों में दूर कर दिया । अब वह जवान हो गया है। शेष दो महीनों में उसका दूसरा ही रूप हो जायगा। इसलिए, आप लोग दूर से ही अब उसे अपने को दिखाओ ।।६४-६५।। ऐसा कहकर वह एक-एक राज-कर्मचारी को भू-गृह के दरवाजे पर ले जाकर उनका नाम और पद बतलाकर दिखाने लगा ।।६६।। इस प्रकार, दो महीनों तक उसने रानियों तक को ले जाकर उस युवा पुरुष का परिचय कराया ।।६७।। आठ मास पूरे होनेपर खा-पीकर मुटाये हुए उस पुरुष को भू-गृह से निकालकर उसने घोषणा कर दी कि यह वही राजा ओषधि के प्रभाव से युवा और बुढ़ापे से रहित हो गया है इस घोषणा से प्रसन्न प्रजाओं ने भी उस युवा को ही राजा मान लिया। तदनन्तर उस युवा पुरुष को स्नान कराके मन्त्रियों ने साथ उसका राज्याभिषेक उत्सव किया ।।६८-७० ।। तब से वह युवा राजा अजर इस नाम से विख्यात होकर रानियों के साथ क्रीड़ा करता और राज्य का भोग करता हुआ सुख से रहने लगा ।।७१।। राजभवन के सभी व्यक्ति इस असम्भव काम करने वाले वैद्य की विद्या के चमत्कार पर विश्वास करके उसे ही पुराना राजा मानकर और अपना स्वामी समझकर उसकी सेवा करने लगे ।।७२।। वह युवक भी अपने प्रेम से प्रजा और राज-कर्मचारियों को तथा महाराणी कनकप्रभा को प्रसन्न करके राजोचित व्यवहार करता हुआ मन्त्रियों के साथ प्रसन्नता से राज-कार्य करने लगा ।।७३।। और अपने अनन्य एवं प्राचीन मित्र मेघचन्द्र और पद्मदशन को हाथी घोड़े एवं ग्राम आदि प्रदान कर उनके साथ विशेष प्रीति रखने लगा ।।७४।। किन्तु तरुणचन्द्र वैद्य को केवल व्यावहारिक दृष्टि से मानता था। किन्तु, सत्यधर्म से घिरी हुई आत्मावाला उस पर विश्वास नहीं करता था ।।७५।। एकबार उस वैद्य तरुणचन्द्र ने एकान्त में राजासे कहा कि तू मुझे कुछ न समझकर स्वतन्त्र रूप से काम क्यों करता है ? ।।७६।।