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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक १४५

सप्तम लम्बक १४५ और, उसी सुरंग के रास्ते उस युवा पुरुष को भू-गृह में लेजाकर रख दिया और सुरंग को बन्द कर दिया ।।६२।। बेरोक-टोक मौका पाकर दुष्ट बुद्धिवाले नीच पुरुष मूर्ख व्यक्तियों पर कौन-सा साहसिक कुकर्म नहीं कर डालते ? ।।६३।। ऐसा प्रबन्ध करके दूसरे दिन प्रातःकाल वैद्य ने सभी राज-कर्मचारियों से कहा कि मैंने राजा का बुढ़ापा छह् महीनों में दूर कर दिया । अब वह जवान हो गया है। शेष दो महीनों में उसका दूसरा ही रूप हो जायगा। इसलिए, आप लोग दूर से ही अब उसे अपने को दिखाओ ।।६४-६५।। ऐसा कहकर वह एक-एक राज-कर्मचारी को भू-गृह के दरवाजे पर ले जाकर उनका नाम और पद बतलाकर दिखाने लगा ।।६६।। इस प्रकार, दो महीनों तक उसने रानियों तक को ले जाकर उस युवा पुरुष का परिचय कराया ।।६७।। आठ मास पूरे होनेपर खा-पीकर मुटाये हुए उस पुरुष को भू-गृह से निकालकर उसने घोषणा कर दी कि यह वही राजा ओषधि के प्रभाव से युवा और बुढ़ापे से रहित हो गया है इस घोषणा से प्रसन्न प्रजाओं ने भी उस युवा को ही राजा मान लिया। तदनन्तर उस युवा पुरुष को स्नान कराके मन्त्रियों ने साथ उसका राज्याभिषेक उत्सव किया ।।६८-७० ।। तब से वह युवा राजा अजर इस नाम से विख्यात होकर रानियों के साथ क्रीड़ा करता और राज्य का भोग करता हुआ सुख से रहने लगा ।।७१।। राजभवन के सभी व्यक्ति इस असम्भव काम करने वाले वैद्य की विद्या के चमत्कार पर विश्वास करके उसे ही पुराना राजा मानकर और अपना स्वामी समझकर उसकी सेवा करने लगे ।।७२।। वह युवक भी अपने प्रेम से प्रजा और राज-कर्मचारियों को तथा महाराणी कनकप्रभा को प्रसन्न करके राजोचित व्यवहार करता हुआ मन्त्रियों के साथ प्रसन्नता से राज-कार्य करने लगा ।।७३।। और अपने अनन्य एवं प्राचीन मित्र मेघचन्द्र और पद्मदशन को हाथी घोड़े एवं ग्राम आदि प्रदान कर उनके साथ विशेष प्रीति रखने लगा ।।७४।। किन्तु तरुणचन्द्र वैद्य को केवल व्यावहारिक दृष्टि से मानता था। किन्तु, सत्यधर्म से घिरी हुई आत्मावाला उस पर विश्वास नहीं करता था ।।७५।। एकबार उस वैद्य तरुणचन्द्र ने एकान्त में राजासे कहा कि तू मुझे कुछ न समझकर स्वतन्त्र रूप से काम क्यों करता है ? ।।७६।।

१४४ कथासरित्सागर

१४४ कथासरित्सागर तद्विस्मृतं यदा राजा भवानिह मया कृतः। तच्छ्रुत्वा स राजा समजरो वैद्यमभ्यधात् ॥७७॥ अहो मूर्खोऽसि कः कस्य कर्ता दातापि वा पुमान्। प्राक्तनं कर्म हि सर्वं करोति च ददाति च ॥७८॥ अतस्त्वं मा कृथा दर्पं तपःसिद्धमिदं हि मे। एतच्च दर्शयिष्यामि प्रत्यक्षमचिरेण ते ॥७९॥ इत्युक्तस्तेन स ग्रस्त इव वैद्यो व्यचिन्तयत्। अहो किमप्यधृष्टोऽयं धीरो ज्ञानीव भाषते ॥८०॥ यद्वहस्त्यान्तरङ्गत्वं स्वामिसंबन्धनं परम्। तदपि क्षमते नास्मिन्ननुवर्त्यस्तथैव मे ॥८१॥ पश्यामि तावत् किमय साक्षान्म दर्शयिष्यति। इत्यालोच्य तथैत्येव भिषक् तूष्णीं बभूव सः ॥८२॥ अन्येद्युश्चामरो राजा परिभ्रान्तुं स निर्ययौ। क्रीडस्तरुणचन्द्राख्यं सेव्यमानः सुहृत्सखः ॥८३॥ भ्राम्यन् प्राप्तो नदीतीरं यस्या मध्ये ददर्श सः। प्रवाहे वहदायातं सौवर्णं पद्मपञ्चकम् ॥८४॥ वानाययच्च भृत्यैस्तद् गृहीत्वा प्रविलोक्य च। वैद्यं तरुणचन्द्रं स जगाद निकटस्थितम् ॥८५॥ नदीतीरेण गच्छ त्वमुपरिष्टादितोऽमुना। उत्पत्तिस्थानमेतेषां पङ्कजानां गवेषय ॥८६॥ तच्च दृष्ट्वा त्वमागच्छ सुमहत्कौतुकं हि मे। अद्भुतेष्वेपु पद्मेशु त्वं च दक्षः सुहृन्मम ॥८७॥ इत्युक्त्वा प्रहितस्तेन राज्ञा स विवशो भिषक्। यथादिष्टेन मार्गेण तथेति प्रययौ सतः ॥८८॥ राजाप्यासीत् स्वपुरं स च गच्छन् भिषक क्रमात्। प्रापदायतनं शैवं नद्यास्तस्यास्तटस्थितम् ॥८९॥ तदग्रे तत्सरित्तीर्थे सट वनमहातरुम्। अपश्यत्स्यन्दमानं च तस्मिन् नरवरद्वपुम् ॥९०॥ तत्र श्रान्तः कृतस्नानो देवमभ्यर्च्य तत्र सः। यावत्तिष्ठति मधोऽत्र तावदागत्य पृच्छताम् ॥९१॥

सप्तम लम्बक १४५

सप्तम लम्बक १४५ क्या तुम यह भूल गये कि उस समय मैंने ही तुझे राजा बनाया था। यह सुनकर वह राजा वज्र उस वैद्य से बोला ॥७७॥ अरे ! तू बड़ा ही मूर्ख है। कौन किसका बनाता या बिगाड़ता है ? पूर्वजन्म के कर्म ही देते और बनाते हैं। इसलिए तू घमण्ड न कर । यह राज्य तो मेरे तप से प्राप्त हुआ है। यह मैं शीघ्र ही तुझे प्रत्यक्ष दिखलाऊँगा' ॥७८-७९॥ राजा से इस प्रकार फटकारा गया वैद्य तरणचन्द्र सोचने लगा कि यह मेरे साथ डिठाई नहीं कर रहा है और वीरता के साथ ज्ञानी के समान बातें कर रहा है ॥८० ॥ रहस्य की बातों में अन्तरंग बनना और वह भी इसमें सम्भव नहीं है तो भी मुझे इसके पीछे-पीछे ही चलना चाहिए। यह भी देखता हूँ कि यह मुझे प्रत्यक्ष क्या दिखलायेगा ? यह सोचकर वैद्य उसकी बात मानकर चुप हो गया ॥८१-८२॥ किसी दूसरे दिन राजा वज्र, टहलने के लिए तरणचन्द्र आदि मित्रों के साथ बाहर निकला ॥८३॥ टहलते-टहलते वह नदी के किनारे पहुँचा और उसने नदी के बीच धारा में बहते हुए सोने के पाँच कमल देखे ॥८४॥ राजा ने नौकरों से उन कमलों को मँगवाकर हाथ में रखकर और देखकर पास में खड़े तरणचन्द्र वैद्य से कहा — तुम अभी नदी के किनारे-किनारे ऊपर की ओर जाओ और इन सोने के कमलों का उत्पत्ति-स्थान खोजो ॥८५-८६॥ उसे देखकर तुम मेरे पास आओ मुझे उन सोने के कमलों के लिए बहुत उत्सुकता हो रही है। और तुम मेरे चतुर मित्र हो ॥८७॥ ऐसा कहकर राजा से भेजा गया वह विप्र वैद्य की आज्ञा तथा कहकर राजा के बताये मार्ग से चला गया और राजा अपने महल में लौट आया। कमलों को खोजता हुआ वह वैद्य नदी के तट पर स्थित एक शिव-मन्दिर में पहुँचा ॥८८-८९॥ वैद्य ने नदी के उद्गम-स्थान पर सरोवर के किनारे एक पत्र-बहुल वट को देखा और उसने उस पर लटकते हुए नरकंकाल को भी देखा ॥ ९० ॥ वैद्य उस नरकंकाल को प्रणाम करके देवता का पूजन करके जैसे ही जल से ... ९

१४८ | कथासरित्सागर

१४८ | कथासरित्सागर

तदेतद्दर्शितं तुभ्यं युक्त्या प्रत्यक्षतो मया। भवत्क्षिप्तोऽस्मि संसक्तात् साभिज्ञानं च वर्णितम् ॥१०७॥ तस्मात्तुभ्यं मया राज्यमदायीति मम त्वया। अहङ्कारो न कर्त्तव्यः स्थाप्यं चेतो न कुत्सितम् ॥१०८॥ विना हि प्राक्तनं कर्म न दाता कोऽपि कस्यचित् । आगर्भाज्जन्मसुख्याति पूर्वकर्मतरोः फलम् ॥१०९॥ इत्युक्तः स भिषक तेन राज्ञा दृष्ट्वा तथैव तत् । ससन्तोषः पुनर्नैव तत्सेवासुस्थितोऽप्यगात् ॥११०॥ सोऽपि राजाऽथ नातिस्मरस्तं भिषजं ततः । सम्मान्यार्थप्रदानेन यथोचितमुदारधीः ॥१११॥ अन्तःपुरैः सुहृद्भिश्च साकं नयजितां महीम्। भुञ्जानः सुकृतप्राप्तां सुखमास्तामकण्टकाम् ॥११२॥ एवं भवति लोकेऽस्मिन् द्वैधं सर्वस्य सर्वदा। प्राक्कर्मोपार्जितं जन्तोः सर्वमेव शुभाशुभम् ॥११३॥ तस्मात्त्वमपि न स्वामी मय्येवामान्तराजितः। संसृज्यत्वेवमस्माकं प्रसन्नोऽस्यन्यथा कथम् ॥११४॥ इत्यपूर्वरमणीयविचित्रां कान्तया सह हसन्कथञ्चित्। संनिशम्य स कथामुपतिष्ठत् स्नातुमत्र नरवाहनदत्तः ॥११५॥ कृतस्नानो गत्वा निकटमथ वत्सेशनृपतेः पितुर्मुञ्चन् मातुर्मुहुरमृतवर्षं नयनयोः । कृताहारस्ताभ्यां सह सममितो मन्त्रिसहितः सुखैरापानाद्यैर्दिनमगमयेत्तां च रजनीम् ॥११६॥

इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके षष्ठस्तरङ्गः ।

सप्तमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता)

ततश्च रत्नप्रभया समं सद्भावबन्द्धनि । स्थितोऽन्येषु कथां कुर्वन्तास्ताः स सचिवैः सह ॥१॥ नरवाहनदत्तोऽथ मन्दिरप्राङ्गणे बहिः । अपश्यत्तुङ्गमभ्रंलेहं शुकायातत्विपञ्जरम् ॥२॥

यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये मर्कटकांस के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी नहीं करना चाहिए ॥१७-१८॥ पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१ ९॥ उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तपनचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥११ ॥ उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥ और, स्वयं मित्रों एव रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥ इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा 'स्वामी ! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपन-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥ इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥ स्नान करके पिता और माता की आँखों मे अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरितसागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मणिवेश्म मे विविध बातें करते हुए नरवाहन- दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१ २॥

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर मघामिवृष्टात्तस्माच्च वटशाखावलम्बिनः। मानुपास्थिकरङ्काद्ये न्यपतस्तोयबिन्दवः ॥९२॥ नद्यास्तीर्थजले तस्यास्त्वभ्यस्तानि ददर्श सः। जायमानानि पद्मानि सौवर्णानि क्षणाद् भिषक ॥९३॥ अहो किमिदमाश्चर्यं क पृच्छाम्यजन वन। यदि वा वद कः सर्ग बह्वाश्चर्यमय विधेः ॥९४॥ दृष्टस्तावन्मया सोऽथ कनकाम्भोरुहाकरः। तदेतत् प्रक्षिपाम्यत्र तीर्थे नरकलेवरम् ॥९५॥ धर्मोऽस्तु यत्पुष्ठे व जायन्तामम्बुजानि वा। इत्यालोच्य स वृक्षाग्रात् ततं कङ्कालमक्षिपत् ॥९६॥ नीत्वा च तद्दिनं तत्र सिद्धकार्योऽपरेऽहनि। प्रत्यावत्तिष्ट स ततो भिषग्देशं निजं प्रति ॥९७॥ दिनै कतिपयै प्राप तद्विलासपुरं च सः। तस्याज्रस्य निकटं राज्ञोऽम्बुकुशभूसुरः ॥९८॥ द्वाःस्थेनावेदितो यावत्प्रविश्य धरणीनतः। स पृष्टकुशलो राज्ञा वृत्तान्तं वक्ति स भिषक ॥९९॥ तावत्स विजनं कृत्वा राजा तं स्वयमभ्यधात्। दृष्टं हुमाम्बुजोत्पत्तिस्थानं तद्वभवता सखे ॥१००॥ तत्क्षेत्रमुत्तमं चैव तत्र दृष्टस्त्वया च सः। करङ्को वटवृक्षे तां प्राक्तनीं विद्धि मे तनुम् ॥१०१॥ तदूर्ध्वपादेन मया लम्बमानेन कुर्वता। तपस्तत्र पुरा त्यक्तमुपशोध्य कलेवरम् ॥१०२॥ तपसस्तस्य माहात्म्यात्करङ्कात् प्रच्युतैस्ततः। मघाम्बुभिस्ते जायन्ते पद्मास्तत्र हिरण्मयाः ॥१०३॥ स करङ्कश्च यत्क्षिप्तस्तीर्थे तत्र मम त्वया। युक्तं तद्विहितं त्वं हि मित्रं मे पूर्वजन्मनि ॥१०४॥ एष भेषजचन्द्रश्च तथाऽसौ पद्मदर्शनः। एतावपि च तज्जन्मसङ्गतौ सुहृदौ मम ॥१०५॥ यत्तस्य तपसो मित्र प्राक्तनस्य प्रभावतः। जातिस्मरत्वं ज्ञानं च राज्यं चोपगतं मम ॥१०६॥

सप्तम लम्बक २४७

सप्तम लम्बक २४७ बादल के बरसने के कारण उस वटवृक्ष के लटकते हुए नर-कंकाल पर से जो बूँदें गिरीं उनको उसने नदी के सरोवर में आकर सोने के कमल रूप में परिवर्तित होते देखा ॥९२-९३॥ वैद्य सोचने लगा—'ओह ! यह क्या आश्चर्य है ! इस निर्जन वन में किससे पूछूँ ? विधाता की आश्चर्य भरी सृष्टि का रहस्य कौन जानता है? ॥९४॥ मैंने सोने के कमलों का यह उत्पत्ति-स्थान तो देख लिया अब इस नर-कंकाल को काटकर इस तीर्थ-जल में फेंक देता हूँ। या तो मुझे इसकी सद्गति करने का पुण्य मिलेगा अथवा धर्म होगा'। ऐसा सोचकर उसने उसके बन्धन काटकर उसी सरोवर में फेंक दिया ॥९५ ९६॥ इस प्रकार, उस दिन को वहीं व्यतीत कर कार्य सिद्ध करके वह वैद्य दूसरे दिन अपने घर की ओर लौटा। और, कुछ ही दिनों में विलासपुर में उस राजा अमर के समीप आया। उस समय वह मार्ग की धूल से भरा हुआ था ॥९७-९८॥ द्वारपाल से सूचित किये गये राजा के चरणों पर गिरे हुए राजा से कुशल पूछे जाने पर वैद्य ने सारा समाचार जैसा-का-तैसा उसे सुना दिया ॥९९॥ तब राजा ने वहाँ से अन्य लोगों को हटाकर एकान्त में स्वयं कहा-'मित्र ! तुमने सोने के कमलों का वह उत्पत्ति-स्थान देखा ? ॥१००॥ वह अत्यन्त उत्तम क्षेत्र है। वहाँ पर बड़ के पेड़ में लटकता हुआ जो नरकंकाल तुमने देखा वह मेरा पूर्व शरीर था। वहाँ पर पैर ऊपर करके लटकते हुए मैंने तपस्या से शरीर को सुखाकर प्राण-त्याग किया था ॥१०१ १०२॥ उसी तप के माहात्म्य से मेरे मृत कंकाल से टपकती हुई वर्षा के जल की बूँदें सोने का कमल बन जाती थीं। तुमने जो उस मेरे कंकाल को उस तीर्थ में फेंक दिया यह बहुत उचित किया क्योंकि तुम मेरे पूर्वजन्म के मित्र हो। यह मलयचन्द्र और पद्मदत्तन भी उसी जन्म के मेरे मित्र हैं। इसलिए, हे मित्र ! उसी पूर्व जन्म के तप प्रभाव से मैं अतिशय ज्ञानी और राजा हुआ ॥१०३ १०४॥

१४८ कथासरित्सागर

१४८ कथासरित्सागर तदेतद्दर्शितं तुभ्यं युक्त्या प्रत्यक्षतो मया । भवत्क्षिप्तोऽस्यसद्भाव साभिज्ञानं च वर्णितम् ॥१०७॥ तस्मात्तुभ्यं मया राज्यमदामीति मम त्वया । अहङ्कारो न कर्त्तव्यः स्थाप्यं चेतो न दुःस्थितम् ॥१०८॥ विना हि प्राक्तनं कर्म न दाता कोऽपि कस्यचित् । आगर्भान्जन्त्वुरश्नाति पूर्वकर्मतरो फलम् ॥१०९॥ इत्युक्तः स भिषक् तेन राज्ञा दृष्ट्वा तथैव तत् । असन्तोषं पुनर्नैव तत्सेवामुत्स्रितोऽभ्यगात् ॥११०॥ सोऽपि राजाजरो जातिस्मरस्तं भिषजं ततः । सम्मान्यार्थप्रदानेन यथोचितमुदारधीः ॥१११॥ अन्तःपुरे सुहृद्भिेश्च साकं नयजितां महीम् । भुञ्जानः सुकृतप्राप्तां सुखमास्तापकण्टकाम् ॥११२॥ एवं भवति लोकेऽस्मिन् दैव सर्वस्वं सर्वदा । प्राक्कर्मोपार्जितं जन्तोः सर्वमेव शुभाशुभम् ॥११३॥ तस्मात्त्वमपि न स्वामी मन्ये जन्मान्तराजितः । सत्त्वं येष्वेवमस्माकं प्रसन्नाऽस्त्यन्यथा कथम् ॥११४॥ इत्यपूर्व्वरमणीयविचित्रां कान्तया सह तपन्तकवक्त्रात् । संनिशम्य स कथामुदतिष्ठत् स्नातुमत्र नरवाहनदत्तः ॥११५॥ कृतस्नानो गत्वा निकटमथ वत्सेशन्नृपतेः पितुर्मुञ्चन् मातुर्मुहुरमृतवर्षं नयनयोः । कृताहारस्ताभ्यां सह सदमितो मन्त्रिसहितः सुखैरापागाद्यैर्दिनमगमयेतां च रजनीम् ॥११६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके षष्ठस्तरङ्गः ।

सप्तमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः स रत्नप्रभया समं तद्वासवेश्मनि । स्थितोऽन्येद्युः कथाः कुर्व्वंस्तास्ताः स सचिवैः सह ॥१॥ नरवाहनदत्तोऽथ मन्दिरप्राङ्गणे बहिः । अकस्मात्पुष्टयस्यैष शुश्रावाश्चन्वितध्वनिम् ॥२॥

सप्तम लम्बक १४९

सप्तम लम्बक १४९ यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये नरकंकाल के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी नहीं करना चाहिए ॥१०७-१०८॥ पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१०९॥ उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तरुणचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥११०॥ उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन-मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥ और, स्वयं मित्रा एवं रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥ इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा-'स्वामी ! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपने-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥ इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥ स्नान करके पिता और माता की आँखों में अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मन्त्रियों में विविध बातें करते हुए नरवाहन दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१-२॥

किमेवमिति कस्मिंश्चित्पृच्छत्यागत्य चेटिका। अब्रुवन् कञ्चुकी क्रन्दत्येष धर्मगिरि प्रभो॥३॥ इहागत्य हि मूर्खेण मित्रेण कथितोऽधुना। तीर्थयात्रागतोऽमुष्य भ्राता देशान्तरे मृतः ॥४॥ तेन राजकुलस्थोऽस्मीत्यस्मरञ्छोकमोहितः । साक्रन्दं सन्नगृह नीत सम्प्रत्यथ बहिर्जनैः ॥५॥ तच्छ्रुत्वा युवराजेऽस्मिञ्जातवेपु सानुकम्पया। राज्ञी रत्नप्रभा तत्र विषण्णेव जगाद सा॥६॥ प्रियबन्धुवियोगोत्थमहो दुःखं दुरुत्सहम्। कष्टं किं न कृतो धात्रा जनोऽयमजरामरः ॥७॥ इति राज्ञीवचः श्रुत्वा मरुभूतिरुवाच ताम्। मर्त्येष्वेतत्कुतो देवि तथाहीमां कथां शृणु ॥८॥

नागार्जुनकथा

चिरायुर्नाम्नि नगरे चिरायुर्नाम भूपतिः। पूर्वे चिरपुरेवासीन्निकेतनं सर्वसम्पदाम् ॥९॥ तस्य नागार्जुनो नाम बोधिसत्त्वांशसम्भवः। वयारुर्वानशीलपश्च मन्त्री विज्ञानवानभूत् ॥१०॥ यः सर्वौषधियुक्तिज्ञश्चक्रे सिद्धरसायनः। आत्मानं तं च राजानं विजरं चिरजीवितम् ॥११॥ कदाचिन्मन्त्रिणस्तस्य बालः पञ्चत्वमाययौ। नागार्जुनस्य पुत्रेषु सर्वेषु दयितः सुतः ॥१२॥ स तेन दृष्टसन्तापो मर्त्यानां मृत्युशान्तये। अमृतं सन्दधे द्रव्यैस्तपोदानप्रभावतः ॥१३॥ द्रोपौषधस्य त्वेकस्य कालयोगं स मन्वते। यावत्प्रतीक्षते तावदिन्द्रेण तदबुध्यत ॥१४॥ इन्द्रः समामन्त्र्य सुरैरश्विनावैवमादिशत्। गत्वा नागार्जुनं ब्रूतमिदं मद्वचनाद् भुवि ॥१५॥ कोऽयं कर्तुमिहारब्धो मन्त्रिणाप्यनमस्त्वया। किं स्वं प्रजापतिं जेतुमुद्यतो बत साम्प्रतम् ॥१६॥

सप्तम लम्बक १५१

सप्तम लम्बक १५१ 'यह क्या है ?—इस प्रकार आकर खिड़की से सेविकाओं से पूछने पर वे बोलीं— 'महाराज ! यह धर्मगिरि नामक कंचुकी चिल्ला रहा है। उसे किसी मूर्ख मित्र ने यहाँ आकर कह दिया कि तुम्हारा भाई तीर्थयात्रा के लिए गया था। वह किसी देश में मर गया ॥३-४॥ यह सुनते ही 'मैं राजभवन में हूँ'—इस बात का ध्यान न रखकर शोक से विह्वल वह चिल्लाने लगा। अब उसे कुछ लोग उसके घर पर ले गये ॥५॥ यह सुनकर युवराज उसके दुःख से दुःखी हुए और रानी रत्नप्रभा भी खिन्न-सी होकर बोली—'प्रिय भाई के मरने का दुःख सचमुच असह्य होता है। सच है विधाता ने उस व्यक्ति को अजर और अमर क्यों नहीं बना दिया? ॥६-७॥ रानी के इस प्रकार वचन सुनकर मरुभूति बोला—'महारानी ! मनुष्यों में अजर और अमर होना कैसे सम्भव है। इस प्रसङ्ग में यह कथा सुनो—॥८॥ नागार्जुन की कथा चिरायु नाम के नगर में चिरायु नाम का राजा था। वह चिरायु समस्त सम्पत्तियों का घर था ॥९॥ उस राजा का मन्त्री नागार्जुन बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न परम दयालु दानी और विज्ञानवेत्ता था ॥१०॥ अनेक ओषधियों की शक्तियों को जाननेवाला रसायनों के निर्माण में सिद्धहस्त उस मन्त्री ने अपने विज्ञान-बल से अपने को तथा राजा को वृद्धावस्था-रहित और चिरजीवी बना दिया था ॥११॥ किसी समय मन्त्री नागार्जुन के पुत्रों में सबसे प्यारा पुत्र बालवय होकर मर गया ॥१२॥ नागार्जुन को उसका ऐसा सन्ताप हुआ कि उसने मनुष्य की मृत्यु को सदा के लिए समाप्त करने के लिए (उन्हें अमर बनाने के लिए) अपने तप और ज्ञान के प्रभाव से अमृतमय ओषधियों से अमृत बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया ॥१३॥ अन्य सभी ओषधियों का उसने संग्रह कर लिया। केवल एक ओषधि मिलाना बाकी बच रहा था। नागार्जुन जब उस ओषधि की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि तबतक इन्द्र को इस बात का पता लग गया ॥१४॥ इन्द्र ने देवताओं से सम्मति करके देव-वैद्य अश्विनीकुमार को इस प्रकार आदेश दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर मेरी ओर से नागार्जुन से कहो—॥१५॥ कि 'तुमने मन्त्री होकर भी यह कौन-सी अनीति आरम्भी है कि अब तुम प्रजापति (ब्रह्मा) को भी जीतना चाहते हो ? ॥१६॥

१५२ कथासरित्सागर

१५२ कथासरित्सागर मर्त्या मरणधर्माणस्तन य किल निर्मिताः । साधयित्वामृतं यत्तानमरांकर्तुमिच्छसि ॥१७॥ एवं कृते विपर्ययो हि न स्याद् देवमनुष्ययोः । यष्टव्यायाजकाभावाद् भज्यते च जगत्स्थितिः ॥१८॥ तदस्मद्वचनादेतत्संहरामृतसाधनम् । अन्यथा कुपिता देवाः शापं दास्यन्ति ते ध्रुवम् ॥१९॥ यच्छोकादेष यत्नस्त स स्वर्गे त्वत्सुतः स्थितः । इति सन्दिश्य शक्रस्तौ प्रजिघायाश्विनावुभौ ॥२०॥ तौ चागत्य गृहीतार्थो तदागमनतोषिणम् । ऊचतुः शक्रसन्देशं तस्मै नागार्जुनाय तम् ॥२१॥ पुत्रं जगदतुश्चास्य दिवि देवैः समं स्थितम् । ततो नागार्जुनः सोऽत्र विषण्णः सन्नचिन्तयत् ॥२२॥ न करोमीन्द्रवाक्यं चेद्देवास्तत्तावदासताम् । इमावेव न किं शापमश्विनौ मे प्रयच्छतः ॥२३॥ तदेतदास्ताममृतं न सिद्धो मे मनोरथः । पुत्रश्च मे प्राक्सुकृतैरौर्ध्व्यां स गतो गतिम् ॥२४॥ इत्यालोच्याश्विनौ देवौ सोऽथ नागार्जुनोऽब्रवीत् । अनुष्ठिता मयेन्द्राज्ञा संहराम्यमृतक्रियाम् ॥२५॥ पञ्चाहेनामृते सिद्धे कृतैवैषाजरामरा । मयाऽभविष्यत्पृथिवी युवां चैत्रागमिष्यतम् ॥२६॥ इत्युक्त्वा तत्समक्षं तत्तद्द्रव्यान्निक्षखान सः । धरण्याममृतं सिद्धप्रायं नागार्जुनस्तदा ॥२७॥ ततोऽश्विनौ तमापृच्छय गत्वा शक्राय तद्दिवि । आचख्यतुः कृतं कार्यं ननन्दाथ च देवराट् ॥२८॥ तावच्चात्र चिरायुः स राजा नागार्जुनप्रभुः । पुत्रं जीवहरं नाम यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥२९॥ अभिषिक्तं च तं माता प्रणामाथमुपागतम् । राज्ञी धनपरा नाम दृष्ट्वा दृष्ट्वावाब्रवीत्सुतम् ॥३०॥ यौवराज्यमिदं प्राप्य पुत्र हृष्यसि किं मुधा । राज्यप्राप्त्यै क्रमो ह्येष नृपसां च न विद्यते ॥३१॥

सप्तम लम्बक १५३

सप्तम लम्बक १५३ उसने मरण-धर्मवाले मानवों की सृष्टि की थी। अब तुम अमृत बनाकर उन्हें अमर (देवता) बनाना चाहते हो ? ॥१७॥ ऐसा करने पर देवता और मानव में क्या अन्तर रह जायगा। यज्ञ करनेवाले और यज्ञ में भाग लेनेवालों के अभाव में संसार की स्थिति (मर्यादा) भंग हो जायगी ॥१८॥ इसलिए, हमारे कहने से इस अमृत-साधना को बन्द करो। नहीं तो क्रुद्ध देवता तुम्हें अवश्य ही शाप देंगे ॥१९॥ जिस पुत्र के शोक के कारण तुम यह प्रयत्न करते हो वह तुम्हारा पुत्र तो यहाँ स्वर्ग में है। इन्द्र के ऐसा कहने पर वे दोनों ही उनके आगमन से प्रसन्न नागार्जुन के पास आये और उसे इन्द्र का सन्देश सुनाया ॥२०-२१॥ और यह भी कहा कि तुम्हारा पुत्र स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्दपूर्वक रह रहा है। तब नागार्जुन खिन्न होकर सोचने लगा—॥२२॥ यदि मैं इन्द्र की बात न मानूं, तो देवताओं के शाप की बात तो दूर रहे क्या ये अश्विनी कुमार ही मुझे शाप नहीं दे सकते हैं ? ॥२३॥ इसलिए, अमृत-निर्माण की योजना जाने दी जाय। मेरा पुत्र तो अपने पूर्व पुण्यों के प्रभाव से अशोचनीय गति को प्राप्त हो गया है ॥२४॥ ऐसा सोचकर नागार्जुन अश्विनीकुमारों से बोला— मैंने इन्द्रकी आज्ञा शिरोधार्य की। अब अमृत बनाने की क्रिया समाप्त करता हूँ। यदि आप दोनों न आते तो पाँच दिनों में ही अमृत-निर्माण होने पर सारी पृथ्वी अजर-अमर हो जाती' ॥२५ २६॥ ऐसा कहकर नागार्जुन ने उनके सामने ही अधपच तैयार हुए अमृत को पृथ्वी में गाड़ दिया ॥२७॥ तब प्रसन्न होकर अश्विनीदेव ने नागार्जुन से पूछकर और स्वर्ग में जाकर इन्द्र को सारा वृत्तान्त सुनाया और देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हुआ ॥२८॥ इधर नागार्जुन के स्वामी राजा चिरायु ने अपने जीवहर नामक पुत्र को युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया। अभिषेक किये हुए प्रसन्नचित्त और प्रणाम करने के लिए आये हुए पुत्र को प्रसन्न देखकर उसकी माता धनपरा बोली—॥२९-३०॥ 'बेटा ! इस यौवराज्य को प्राप्तकर क्या झूठे ही प्रसन्न हो रहे हो। यह राज्य का क्रम तो तपस्या से भी नहीं चल सकता ॥३१॥ २

१५४ कथासरित्सागर

१५४ कथासरित्सागर युवराजा हि बहवो गता पुत्रा पितुस्तव । न राज्यं केनचित्प्राप्तं प्राप्तं सर्वैर्विडम्बनम् ॥३२॥ नागार्जुनेन दत्तं हि तद्राज्ञेऽन्नं रसायनम् । वयो वर्षशतं येन प्राप्तमस्येदमष्टमम् ॥३३॥ को जानाति कियन्त्यन्यान्यपि प्राप्स्यन्ति च क्रमात् । युवराजाञ्श्वपस्यास्य कुर्वतोऽप्यायुषः सुतान् ॥३४॥ एतच्छ्रुत्वा विषण्णं तं पुत्रं सा पुनरब्रवीत् । यदि राज्येन ते कृत्यं तदुपायमिमं कुरु ॥३५॥ एष नागार्जुनो मन्त्री प्रत्यहं विहिताह्निकः । आहारसमये दाता करोत्युद्घोषणाभिमाम् ॥३६॥ कोऽर्थी प्रार्थयतां कः किं तस्मै किं दीयतामिति । स्वशिरो मे प्रयच्छेति तत्काल ब्रूहि गच्छ तम् ॥३७॥ सत्यवाचि ततस्तस्मिञ्छिद्रमूर्ध्नि मृते नृपः । तच्छोकाल्पचेतां यायाद्वनं चैष समाश्रयेत् ॥३८॥ ततः प्राप्स्यसि राज्यं त्वमुपायोऽन्योऽत्र नास्ति ते । इति मातुर्वचः श्रुत्वा राजपुत्रस्तुतोष सः ॥३९॥ तथेति तद्विधातुं च चकारैव स निश्चयम् । कष्टो हि बान्धवस्नेहं राज्यलोभोऽतिवर्तते ॥४०॥ अथ राजसुतोऽन्येद्युः स्वैरं जीवहरो ययौ । तस्य भोजनवेलायां गृहं नागार्जुनस्य सः ॥४१॥ कः किं याचत इत्यादि तदा सत्रं च मन्त्रिणम् । वदन्तं तं प्रविश्यैव स मूर्धानमयाचत ॥४२॥ आश्चर्यं वत्स शिरसा किं करोषि ममामुना । मांसास्थिकेशसङ्घातो हि क्वोपयुज्यत एष ते ॥४३॥ तथाप्यर्थस्तवानेन यदि च्छित्त्वा गृहाण तत् । इत्युक्त्वोपानयत्तस्मै स च मन्त्री शिराधराम् ॥४४॥ रसायनदृढायां च तस्यां प्रहरतश्चिरम् । राजसूनोर्ययुः खड्गा बहवस्तस्य खण्डशः ॥४५॥ यावद् बलबलैवायान्तं राजानं तं [चिरायुषम् । वारयन्तं शिरोदानात्सोऽथ नागार्जुनोऽब्रवीत् ॥४६॥

सप्तम लम्बक १५५

सप्तम लम्बक १५५

बेटा ! तुम्हारे पिता के अनेक पुत्र युवराज होकर चले गये। किसी ने भी राज्य नहीं पाया। सब ने केवल वृद्धता ही पाई ॥३२॥

नागार्जुनने इस राजा को ऐसा रसायन दिया है कि उस अपनी अवस्था का यह आठवाँ सैकड़ा चल रहा है। अभी जाने कितने ही युवराजों का अपने से अल्पायु करते हुए इस राजा की उम्र के कितने सैकड़े व्यतीत होंगे ॥३३॥

यह सुन दुःखित पुत्र को देखकर माता फिर बोली— यदि तुम्हें राज्य करना है तो एक उपाय यह करो। यह दाता मन्त्री नागार्जुन प्रतिदिन प्रातः स्नान सन्ध्या पूजन आदि से निवृत्त होकर भोजन के समय यह घोषणा करता है कि कौन याचक क्या-क्या चाहता है ? किसे क्या दिया जाय ? तुम उस समय उससे जाकर कहो कि तुम अपना शिर मुझे दो। वह सत्यवक्ता के शिर कटकर मर जाने पर उस के शोकसे राजा भी मर जायगा या जंगल में चला जायगा । तब तुम राज्य प्राप्त कर सकोगे और दूसरा कोई उपाय नहीं है। माता का यह सुझाव सुनकर युवराज सन्तुष्ट हुआ ॥३४—३९॥

'ऐसा ही करूँगा'—इस प्रकार कहकर उसने यही निश्चय किया। तुच्छ है कि राज्य का लोभ अपने आत्मीय बन्धु-बान्धवों के स्नेह का अतिक्रमण कर जाता है ॥४०॥

तदनन्तर दूसरे दिन राजकुमार जीवहर भोजन के समय नागार्जुन के घर गया ॥४१॥

'कौन क्या चाहता है ?' मन्त्री के इस प्रकार कहते ही राजकुमार ने उसका शिर माँगा ॥४२॥

वत्स ! आश्चर्य है कि मेरे इस शिर से तुम क्या करोगे ? यह तो मांस हड्डी और बालों का ढेर है। इसका तुम्हारे लिए क्या उपयोग है ? तो भी यदि तुम्हें इससे प्रयोजन है तो इसे ले लो। ऐसा कहकर मन्त्री ने उसके आगे अपनी गर्दन झुका दी ॥४३-४४॥

रसायन से सुदृढ़ (मजबूत) उसके गले पर प्रहार करते हुए युवराज की कितनी ही तल- वार टुकड़े-टुकड़े हो गई। तबतक इस समाचार को सुनकर आये हुए और चिन्ताकुल हो सिर से वस्त्र छूटे हुए राजा विस्मय से नागार्जुन से कहा—॥४५-४६॥

१५६ | कथासरित्सागर

१५६ | कथासरित्सागर

जातिस्मरोऽहं नृपते नवतिं च नवाधिकाम्। जन्मानि स्वशिरो दत्तं मया जन्मनि जन्मनि ॥४७॥ इदं शततमं जन्म शिरोदानाय मे प्रभो। तन्मा स्म वोध किञ्चित्त्वं विमुखोऽर्थी न याति मे ॥४८॥ तदिदानीं ददाम्यस्मै त्वत्पुत्राय निजं शिरः। त्वन्मुखालोकनायैव विलम्बो हि कृतो मया ॥४९॥ इत्युक्त्वाश्लिष्य तं भूपं मूर्धनामाघ्राय कोपतः। प्रक्षिप्तद्राजपुत्रस्य कृपाणं तेन तस्य सः ॥५०॥ तत्कृपाणप्रहारञ्च सोऽथ शस्य नृपात्मजः। नागार्जुनस्य चिच्छेद शिरो मालादिवाम्बुजम् ॥५१॥ अथोत्थिते महाक्रन्दे प्राणत्यागोन्मुखे नृपे। इत्युच्चचार गगनादशरीराश्च भारती ॥५२॥ अकार्यं मा कृथा राजंश्चान्धो ह्येष ते सुतः। नागार्जुनोऽपुनर्जन्मा गतो बुद्धसमां गतिम् ॥५३॥ एतच्छ्रुत्वा स विरतश्चिरायुर्मेरणाद्भूपः। दत्तवान् शुचा त्यक्तराज्यो वनमथिश्रियत् ॥५४॥ तत्र कालेन तपसा स प्राप परमां गतिम्। तत्पुत्रोऽप्यचिरत्स्तौ साम्राज्यं जीवहरोऽत्र सः ॥५५॥ प्राप्तराज्यश्च मचिराद्राष्ट्रमेव विधाय सः। हतो नागार्जुनसुतैः स्मरद्भिरुस्तद्वधं पितुः ॥५६॥ तच्छोकाच्च तन्मातुस्तस्या हृदयमस्फुटत्। वनार्यजुष्टेन पथा प्रवृत्तानां शिवं कुतः ॥५७॥ राज्ये च राज्ञामन्यस्यां जातस्तस्य चिरायुषः। बातायुर्नाम पुत्रस्तैर्मन्त्रिमुख्यैर्न्यवेश्यत ॥५८॥ एव नागार्जुनारब्धं मर्त्यानां मृत्युनाशनम्। न सोढुं दैवतैर्यत्सोऽपि मृत्युवशं गतः ॥५९॥ तस्माद्विधातुविहितोऽयमनित्य एव दुर्व्वारदुःखबहुलो मनु जीवलोकः। दाढ्यं न कर्तुमपि यत्नशतैस्तवत्र कनापि किञ्चिदपि मेच्छति यद्विधाता ॥६०॥

[Page Header: सप्तम लम्बक | १५७]

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हे राजन् ! मैं पूर्वजन्म का स्मरण करने वाला हूँ। मैंने निन्यानब्बे बार प्रत्येक जन्म में अपना सिर दान किया है। यह सौवां मेरा जन्म भी सिर देने के लिए ही हुआ है। इसलिए, तुम कुछ न बोलो। मेरे याचक को विमुख न होना चाहिए ॥४७-४८॥ तो अब मैं तुम्हारे पुत्र को अपना सिर देता हूँ। केवल तुम्हारा मुंह देखने के लिए ही मैंने इतना विलम्ब किया है ॥४९॥ ऐसा कहकर राजा से आलिङ्गन कर और औषधालय से एक चूर्ण मँगाकर राजकुमार की तलवार पर उसने लेप कर दिया ॥५०॥ तब उस तलवार के प्रहार से मन्त्री की गर्दन इस प्रकार कट गई जैसे नाल से कमल कटकर अलग हो जाता है ॥५१॥ तदनन्तर रोने और चिल्लाने का बड़ा कोलाहल उठने पर और राजा के प्राण-त्याग के लिए उद्यत होने पर आकाश से अशरीरी वाणी हुई—॥५२॥ 'राजन् ! आत्महत्या का यह अकार्य न करो। यह तुम्हारा मित्र नागार्जुन शोचनीय नहीं है। उसका जन्म अब न होगा। वह बुद्ध के समान गति को प्राप्त हो गया' ॥५३॥ यह सुनकर राजा चिरायु मार्ग से विमुख हुआ और शोक में सब कुछ दान देकर और राज्य का त्याग करके वन में चला गया ॥५४॥ वन में रहता हुआ वह कुछ समय बाद तप से परमगति को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र जीवहर राज्य पर बैठा ॥५५॥ उसके राज्य प्राप्त करने पर पिता के वध से असन्तुष्ट नागार्जुन के पुत्रों ने राष्ट्र-विप्लव कराकर शीघ्र ही उसका नाश करा दिया ॥५६॥ उसके शोक से उसकी माता धनपरा का हृदय फट गया और वह भी मर गई। सच है अनार्य (अनुचित) पथ से चलनेवालों का कल्याण कैसे हो सकता है ? ॥५७॥ तब राजा के मुख्यमन्त्रियों ने दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न शतायु नामक पुत्र को राजगद्दी पर बैठाकर राज-कार्य का संचालन किया ॥५८॥ इस प्रकार नागार्जुन के द्वारा मनुष्यों की मृत्यु को दूर करनेवाले प्रयत्न को देवताओं ने सहन नहीं किया और वह नागार्जुन भी मर गया ॥५९॥ इस प्रकार, अनिवार्य दुःखों से भरा हुआ यह संसार अनित्य है। इसमें जो कुछ विधाता को इच्छित नहीं है, उसे सैकड़ों यत्नों से भी नहीं किया जा सकता ॥६०॥

१५८ कथासरित्सागर

१५८ कथासरित्सागर इत्याख्याय कथां किल विरत मरुभूतिके सम सचिवः । नरवाहनदत्तो निजमुत्थाय चकार दिवसकसम्म्यम् ॥६१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके सप्तमस्तरङ्गः। अष्टमस्तरङ्गः कर्पूरिकाकथा ततोऽह्नि परे प्राप्त सोक्ता रत्नप्रभां प्रियाम्। शीघ्र प्रत्यागमिष्यामीत्याश्वास्याखेटकाय सः ॥१॥ वत्सशेन समं पित्रा वयस्यैश्चाटवीं ययौ। नरवाहनदत्तास्तैर्गजैश्च परिवारितः ॥२॥ सत्र मिन्नैभकुम्भानां नखोदग्रपरिच्युतैः। सिंहानां हतसुप्तानामुक्तबीजव मौक्तिकैः ॥३॥ व्याघ्राणां भल्लशूनानां दंष्ट्राभिः साङ्कुरेव च। सपल्लवेव क्षतजैर्हरिणानां परिप्लुतैः ॥४॥ निमग्नकङ्कपत्रैस्तु क्रोडे स्तबकितेव च। शरीरे शरभाणां च पतिते फलितेव च ॥५॥ बभूव तस्य निपतद्द्बनधम्बशिलीमुखा। प्रीतये मृगयालीलाकृता शोभितकानना ॥६॥ शनैः श्रान्तः स विश्रम्य प्रविवेश वनान्तरम्। हयारूढः सहैकेन गोमुखेनाश्वसादिना ॥७॥ तत्रारेभे च गुलिकाक्रीडां कामपि तत्क्षणम्। तावच्च तापसी कापि पथा तेन किलाययौ ॥८॥ तस्यास्तस्य कराद् भ्रष्टा गुलिका मूर्ध्नि चापतत्। ततो विहस्य किञ्चित्सा तापसी तमभाषत ॥९॥ एवमेव मदोदग्रः चेतद्य तद्यद्यवाप्स्यसि। धातु कर्पूरिकां भार्यां तत्तै कीदृग्भविष्यति ॥१०॥ एतच्छ्रुत्वावसह्यैव तुरगाच्चरणानतः। नरवाहनदत्तस्तां तापसीं निजगाद सः ॥११॥

सप्तम लम्बक १५९

सप्तम लम्बक १५९ इस प्रकार, कथा कहकर मरुभूति के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उठकर दैनिक कार्यों में लग गया ॥६१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का सप्तम तरंग समाप्त

अष्टम तरंग कर्पूरिका की कथा किसी एक दिन नरवाहनदत्त अपनी उत्कण्ठिता प्यारी रत्नप्रभा को 'शीघ्र ही आऊँगा'— ऐसा आश्वासन देकर, पिता बलराज तथा अन्य मित्रों के साथ हाथी-घोड़ों की सेना लेकर शिकार खेलने के लिए जंगलों में गया ॥१—२॥ वह मृगया-क्रीड़ा-रूप लता नरवाहनदत्त के लिए प्रसन्नता का कारण बन गई। वह मृगया-भूमि बड़े-बड़े हाथियों के कुम्भस्थलों को फाड़नेवाले मारे हुए सिंहों के नखों से गिरे हुए मोतियों से ऐसी मालूम हो रही थी मानो उसमें बीज बोय गये हैं। भालों से मारे गये बाघों के बिखरे हुए दाढ़ों से अंकुरित हुई के समान मालूम होती थी। मारे हुए हरिणों के शरीर से निकलकर फैले हुए रक्त से मानो लाल पल्लवों से युक्त मालूम हो रही थी। बाणों से बींध गये सूअर के मुखों व भालों मुच्छों से भरीहुई और शरभों १ के गिरे हुए शरीरों से मानों फलवाली मालूम हो रही थी। उस भूमिमें भयंकर सनसनाहट के साथ बाण छूट रहे थे। तभी वह जंगली मृगया-भूमि (शिकारगाह) विचित्र शोभा धारण कर रही थी ॥३—६॥ कुछ देर बाद थककर विश्राम करके नरवाहनदत्त घोड़े पर सवार एकमात्र गोमुख के साथ दूसरे जंगल में प्रवेश कर गया ॥७॥ वहाँ जाकर उसने गोफन से गोली फेंकने का खेल प्रारम्भ किया। इतने में ही उस मार्ग में कोई तपस्विनी आ गयी। नरवाहनदत्त के हाथ से छूटी हुई एक गोली उस तपस्विनी के सिर में जा लगी। तब वह तपस्विनी कुछ रोष करके बोली—॥८-९॥ 'अभी मुझमें ऐसी मस्ती है तो जब कर्पूरिका को पत्नी बना लोग तब न जाने कितना अधिक मद बढ़ जाएगा' ॥१०॥ यह सुनकर और घोड़े से उतरकर नरवाहनदत्त तपस्विनी के पैरों पर गिरकर बोला—॥११॥ १ यह पशु (मृग विशेष) आठ पैर वाला होता है। आजकल यह नहीं मिलता।—अनु

१६ कथासरित्सागर

१६ कथासरित्सागर त्वं न दृष्टा मया देवाद् गुटिका चात्र मे गता। प्रसीद तद्भगवति क्षमस्व स्खलितं मम ॥१२॥ तच्छ्रुत्वा नास्ति मे पुत्र कोप इत्यभिधाय च। तापसी सा जितक्रोधा तमाशीर्भिरसान्त्वयत् ॥१३॥ ततश्च वशिनीं मत्वा प्रबुद्धो सत्यतापसीम्। नरवाहनदत्तस्तां पप्रच्छ विनयेन सः ॥१४॥ कैषा कर्पूरिका नाम भगवत्युदिता त्वया। एतदादिश तुष्टासि मयि चेत्कौतुकं हि मे ॥१५॥ इत्युक्तवन्तं प्रणतं तापसी तं जगाद सा। अस्ति पारेऽम्बुधि परं नाम्ना कर्पूरसम्भवम् ॥१६॥ अन्वर्थसंज्ञस्तत्र राजास्ति कर्पूरक इति श्रुतः। तस्य कर्पूरिका नाम सुतास्ति वरकन्यका ॥१७॥ एकां विलोक्य कमलां निर्मथ्यापहृतां सुरैः। या द्वितीयेव निक्षिप्य तत्र गोपायिताम्बुना ॥१८॥ पुरुषद्वेषिणी सा च विवाहे नाभिवाञ्छति। त्वमुपेत्य यदि परं भविष्यति त्वद्वशिनी ॥१९॥ तत्तत्र गच्छ पुत्र त्वं तां च प्राप्स्यसि सुन्दरीम्। गच्छतश्चात्र वोऽटव्यां महाक्लेशो भविष्यति ॥२० ॥ मोहस्तत्र न कार्यस्ते सर्वं स्वन्तं हि भावि सत्। इत्युक्त्वैव समुत्पत्य तापसी सा तिरोदधे ॥२१॥ नरवाहनदत्तोऽथ तद्वाणीमदनाज्ञया। आकृष्टः स समाहूय स्म गोमुखं पार्श्ववर्तिनम् ॥२२॥ एहि कर्पूरिकार्थं पुरं कर्पूरसम्भवम्। गच्छावस्तामदृष्ट्वा हि न क्षणं स्थातुमुत्सहे ॥२३॥ तच्छ्रुत्वा गोमुखोऽब्रवीत् न्वार्य साहसेन त। क्व त्वं क्वास्य पुरं तत् क्व क्व सोढ्या वन्यवाघव मा ॥२४॥ नाम्नि श्रुते विनेष्यारी त्यक्तदिव्याङ्गनाजनः। निरभिप्रायसन्दिग्धामभिधावसि मानुषीम् ॥२५॥ एवं स गोमुखेनोक्तो वत्सराजसुतस्तदा। अब्रवीन् मिष्ठतागम्या न तस्या वचनं मृषा ॥२६॥