भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक २२१ पद्मावती के साथ उसकी माता वासवदत्ता ने पुत्र को लिपटाकर आँसू बहाये। चिरकाल से उसे न देखने के कारण हृदय में बनी हुई दुख की गाँठ मानों बह निकली ॥२४५॥ आनन्द से भरी हुई उसकी दोनों पत्नियों—मदनमञ्जुका और रत्नप्रभा—ने उसके प्रेम से ईर्ष्या को छोड़कर उसके चरणों और हृदयों को साथ ही ग्रहण किया ॥२४६॥ तदनन्तर यौगन्धरायण आदि पिता के मन्त्रियों तथा मरुभूति आदि अपने मन्त्रियों को नरवाहनदत्त ने यथायोग्य प्रणाम नमस्कार आदि से सत्कार-सम्मान किया ॥२४७॥ अपने उच्च कुल को अपनी परिस्थिति से अलंकृत करनेवाले पति के साथ समुद्र को पार करके आई हुई अमृत की सहोदरा भगिनी के समान और सैकड़ों युवती स्त्रियों से लक्ष्मी के समान घिरी हुई और नम्र भाव से स्थित उस नववधू कर्पूरिका का वत्सराज आदि ने समुचित अभिनन्दन आदि किया। और, वत्सराज ने उसके साथ आये हुए उसके पिता के प्रतीहार को पुरस्कार आदि से सम्मानित किया। उस प्रतीहार ने भी विमान पर लदे हुए सोना वस्त्र कर्पूर आदि दहेज की सामग्री सम्बन्धी उदयन को समर्पित की ॥२४८-२४९॥ उदयन ने नरवाहनदत्त द्वारा परिचित कराये गये विमान-निर्माता शिल्पी प्राणधर का भी समुचित सत्कार किया ॥२५०॥ तदनन्तर राजा उदयन ने गोमुख का अभिनन्दन करके पूछा कि यह राजकुमारी कैसे प्राप्त हुई और तुम लोग यहाँ से वहाँ कैसे पहुँचे? ॥२५२॥ तदनन्तर गोमुख ने महारानियों और मन्त्रियों के साथ बैठे हुए महाराज उदयन को शिकारवाले वन से भटक जाने और तपस्विनी का दर्शन होने से लेकर राज्यधर के विमान द्वारा द्वीप में पहुँचन विवाह से विमुख कर्पूरिका को अपनी ओर लाने तथा प्राणधर द्वारा निर्मित विमान से पुनः लौट आने आदि का सारा वृत्तान्त सबको क्रमशः सुना दिया ॥२५३-२५५॥ कहाँ शिकार ! कहाँ वह बूढ़ी तपस्विनी ! कहाँ समुद्र के किनारे वह शिल्पी कारीगर राज्यधर ! कहाँ समुद्र पार करना ! समुद्र के पार भी दूसरे विमान-निर्माता का मिलना और फिर उसका पहले स्थान पर आना—यह सब असम्भव और अघटित घटनाएँ हैं। यह सत्य है कि भाग्यवान् व्यक्ति के कल्याण-कार्यों को सफल करने के उपाय दैव स्वयं ही घटित कर देता है ॥२५६॥ इस प्रकार, इस घटना को सुनकर अत्यन्त आनन्द से सिर हिलाते हुए उन सभी ने गोमुख की स्वामी-भक्ति की अत्यन्त प्रशंसा की ॥२५७॥ अपनी विद्या के प्रभाव से अपने पति की नाव में रक्षा करनेवाली पतिपरायणा रत्नप्रभा की भी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥२५८॥