भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक मृगेन्द्र-गामिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-सम्भ्रमावलोक के मन्थान द्वारा शिवजी के मुख-रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और श्रद्धा-पूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर दिव्य पद लाभ करते हैं। प्रथम तरंग मंगलाचरण हिलते हुए कानों की वायु द्वारा उड़े हुए सिन्दूर से आकाश को लाल करते हुए, अतएव मानो असमय में ही सन्ध्या की सृष्टि करते हुए गजानन की जय हो ॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (कथामुख) तदनन्तर, वत्सेश्वर (उदयन) का पुत्र नरवाहनदत्त कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर उन पत्नियों को पाकर आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥२॥ एक बार पिता के दरबार में बैठे हुए उसने (नरवाहनदत्त ने) आकाश से उतरे हुए किसी दिव्य पुरुष को देखा ॥३॥ प्रणाम करते हुए उस पुरुष को पिता के साथ सत्कार करके 'आप कौन हैं? कैसे आये हैं? नरवाहनदत्त के ऐसा प्रश्न करने पर उसने कहा—॥४॥ वज्रप्रभ से वर्णित आत्मवृत्तान्त इस धरातल में हिमालय के शिखर पर वज्रकूट नाम का नगर है, जो वज्र के सार से निर्मित होने के कारण नाम के समान ही गुणवाला भी है॥५॥