भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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मध्यम लम्बक ४४३ सूर्यप्रभ ने कामचूड़ामणि से कहा- अब अन्य स्त्रियों का स्थान हृदय के बाहर रहेगा किन्तु हृदय के भीतर तो केवल तुम्हारा ही स्थान है। इस प्रकार की बातें करते हुए सूर्यप्रभ ने उसे प्रसन्न किया ॥१५९॥ तदनन्तर प्रिया के आलिंगन से सुख देनेवाली उसकी नींद और रात्रि दोनों साथ ही समाप्त हुईं ॥१६०॥ प्रातःकाल उठकर सूर्यप्रभ ने आकर एक साथ बैठी हुई पहले की स्त्रियों से मिलकर वार्तालाप आदि से उन्हें प्रसन्न किया ॥१६१॥ वे रानियाँ व्यंग्योक्तियों चुटकियों तथा हास्यपूर्ण वचनों से नववधू के प्रति अनुरक्त सूर्यप्रभ को जब विविध प्रकार से बना रही थीं, इतने में ही द्वारपाल द्वारा आकर और प्रणाम करके सूर्यप्रभ सूचित किया गया और सुषेण नाम के विद्याधर ने सफल हुए सूर्यप्रभ से कहा- 'महाराज त्रिकूटनाथ आदि सभी विद्याधर-राजाओं ने मुझे आपके समीप भेजा है। वे लोग आपसे निवेदन करते हैं-॥१६२-१६४॥ 'कि आज से तीसरे दिन ऋषभ पर्वत पर आपका अभिषेक शुभ है। इसकी सबको सूचना दीजिए और उसके लिए तैयारी कीजिए' ॥१६५॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने दूत से कहा-'जाओ त्रिकूटदेवों को मेरी ओर से कहो कि इस उत्सव का आयोजन आप लोग ही करें। और, लोगों को भी आप ही सूचित करें। हम स्वयं तैयार होकर बैठे हैं॥१६६-१६७॥ यथावकाश हम भी सबको सूचित करेंगे ही। इस प्रकार, प्रतिसन्देश लेकर दूत सुषेण चला गया ॥१६८॥ सूर्यप्रभ ने भी प्रभास आदि एक-एक मित्र को देवताओं को याज्ञवल्क्य मुनि को राजाओं को विद्याधरों को और असुरों को पृथक्-पृथक् सूचना देकर अपने अभिषेक-महोत्सव में निमन्त्रित कराया ॥१६९-७०॥ और, स्वयं अकेला शिव और पार्वती को निमन्त्रण देने के लिए कैलास पर्वत पर गया ॥१७१॥ सूर्यप्रभ ने देव ऋषि सिद्ध आदि से सेवित उस कैलाश पर्वत पर जाते हुए दूसरे शंकर के समान स्वच्छ और शुभ कैलासपति को देखा ॥१७२॥ आधे से अधिक चढ़ने पर उसने पर्वत के शिखर पर जाना कठिन समझा और सामने ही एक ओर विद्रुम मणि से बने हुए द्वार को देखा ॥१७३॥