कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक — ४०५ बाणों के घावों से गिरते हुए रक्त की धारा से रंजित राजा का हाथी शत्रुमादन गेरू व सरजोंवाले अंजन पर्वत का अनुकरण कर रहा था ॥१६९॥ विजयी होकर राजा के लौटने पर उसकी समस्त सेना आकर वहाँ एकत्र हुई और मरने से बची हुई भीलों की सेना के सिपाही इधर-उधर भाग गये ॥१७०॥ तदनन्तर, युद्ध समाप्त करके लौटे हुए राजा पृथ्वीरूप के पराक्रम की प्रशंसा रूपधर के दूत ने की। विजयी राजा ने थकित सेना की विश्रान्ति के लिए, उसी वनभूमि में एक तालाब के किनारे अपना शिविर लगा दिया ॥१७१-१७२॥ इस प्रकार, क्रमशः यात्रा करता हुआ राजा समुद्र-तट पर पद्मपुर नगर में जा पहुँचा ॥१७३॥ पद्मपुर के राजा उदारचरित द्वारा समुचित सत्कार किये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक रात उसी नगर में विश्राम किया ॥१७४॥ और प्रातःकाल उसी राजा द्वारा मंगाये गये जहाजों और नावों पर सवार होकर आठ दिनों में समुद्र के मार्ग से मुक्तिपुर द्वीप में बरात के साथ राजा पृथ्वीरूप जा पहुँचा ॥१७५॥ उसके आगमन की सूचना पाकर प्रमप्रदित राजा रूपधर बरात की अगवानी के लिए आया और वे दोनों राजा परस्पर गले मिले ॥१७६॥ तब राजा रूपधर के साथ राजा पृथ्वीरूप उस द्वीप की राजधानी में जाकर उसके अनुरूप स्वागत-सत्कार करती हुई नागरिक स्त्रियों के मानो वह नेत्रों द्वारा पिया जा रहा था। राजभवन में पहुँचने पर राजा रूपधर और रानी हेमलता ने अपनी कन्या के अनुरूप जामाता को देखकर अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया ॥१७७-१७८॥ तदनन्तर, राजा रूपधर ने अपनी सम्पत्ति के अनुसार समुचित आतिथ्य-सत्कार द्वारा ससैन्य राजा पृथ्वीरूप को वहीं ठहराया ॥१७९॥ दूसरे दिन, वेदी में बैठकर, शुभ लग्न में राजा पृथ्वीरूप ने विधिवत् गो उपांगिया रूपलता का पाणिग्रहण किया ॥१८० ॥ परस्पर सौन्दर्य-साम्य देखने के कौतूहल से उन दोनों की ओर जाती आँखों का मान यह कहने के लिए उनके पास तक चली गई थी कि जैसा ही सुनने लगा था वैसा ही हमने देखा ॥१८१॥ राजा रूपधर ने लाख हवन के प्रचुर अवभृथ पर इतने रत्न उस वर-वधू को दिए कि लोगों ने उसे सचमुच रत्नाकर समझा ॥१८२ ॥ कन्या का विवाह सम्पन्न होने पर उस राजा रूपधर ने चित्रकार कुमारदत्त वैश्य जितुंघा तथा अन्यान्य सम्मानित व्यक्तियों का धन आदि से यथोचित सत्कार किया ॥१८३॥