कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश लम्बक ७११ इस प्रकार कहकर सुन्दरी ने ईश्वरवर्मा के पैर पकड़ लिये। तब जयदत्त आदि ने ईश्वरवर्मा से कहा—दे दो जाने दो ॥१६१॥ ईश्वरवर्मा ने इस प्रकार (सुन्दरी का सर्वस्व लेकर) उसे लेना स्वीकार कर लिया और उस दिन को प्रसन्न सुन्दरी के साथ आनन्द में बिता दिया ॥१६२॥ प्रातःकाल ही मांगती हुई सुन्दरी को दो हजार दीनार नियमे हुए बन्दर ने दे दिये ॥१६३॥ और उसके मूल्य में सुन्दरी के घर का सर्वस्व लेकर वह व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप को चला गया ॥१६४॥ बन्दर को पाकर प्रसन्न सुन्दरी को वह मात्र दो दिना तक मांगने पर दीनार देता रहा ॥१६५॥ तीसरे दिन प्रेमपूर्वक बार-बार मांगने पर भी जब उसने कुछ नहीं दिया तब सुन्दरी ने उसे मुक्कों से मारा ॥१६६॥ मुक्कों से मारे गए बन्दर ने क्रोध से उछलकर मारती हुई सुन्दरी और उसकी माता का मुख दाँतों और नखों से नोंच डाला ॥१६७॥ तब मुँह से बहते हुए रक्तवाली मकरन्दीका ने डंडा से उस बन्दर को ऐसा मारा कि वह मर गया ॥१६८॥ आप को क्षत और अपने मङ्कर को आहत देखकर वह सुन्दरी माता के साथ मरने के लिए तैयार हो गई ॥१६९॥ "मकरन्दिका ने धूर्त से जाल लगाकर जिसका धन हरण कर लिया था उस बुद्धिमान् ने बांन के द्वारा उसका सर्वस्व हरण कर लिया ॥१७०॥ बन्दरी ने दूसरे के लिए जाल बिछाया किन्तु अपने लिए आज का शूल लगाया उसका समाचार जाननेवाले सभी लोग ऐसा कहकर हँसने लगे ॥१७१॥ तब शहर के सामन्तवर गुणधारी सुन्दरी को भी कषाय ग्रहण के लिए उद्योग देखकर उसके कुलस्त्रियों से वार्ता सर्वप्रार्थ किया गया ॥१७२॥ वह ईश्वरवर्मा स्वर्णद्वीप से अधिक धन कमाकर शीघ्र ही लौटकर अपने पिता के पास चित्रकूट नगर में पहुँचा ॥१७३॥ अनन्त धन कमाकर लौट हुए पुत्र ईश्वरवर्मा को देखकर उसके पिता रत्नवर्मा ने सर्वविद्या बहुरी का पुरस्कार अर्थ देकर बड़ा उत्सव मनाया ॥१७४॥ वह ईश्वरवर्मा भी उस वेश्या के उस स्त्री के कपट को देखकर उससे विरक्त होकर और विवाह करके अपने घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥१७५॥