कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७६५ इसी प्रकार, शिवजी से स्वप्न में पृथक्-पृथक आदिष्ट वे सभी राजा सुमन की सभा में आये ॥१७३॥ उस सभा में आये हुए सोमप्रभ को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके मकरन्दिका फिर उसी दिव्य विद्याधरी के रूप में आ गई और उसने सोमप्रभा के गले से मिलकर आलिङ्गन किया ॥१७४॥ वह सोमप्रभ भी शिवजी की कृपा से उस विद्याधर राजकुमारी मकरन्दिका को पाकर मूर्त्तिमती दिव्य भाग्यलक्ष्मी के समान उसका आलिङ्गन करके सफल हुआ ॥१७५॥ वह राजा सुमनस् भी जो पूर्वजन्म में रश्मिमान् नामक मुनिपुत्र था मनोरथप्रभा को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके आकाश से गिरे हुए अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करके फिर मुनिपुत्र रश्मिमान् बन गया। और, उस अपनी प्रियतमा मनोरथप्रभा को चिरकालीन उत्सुकता के पश्चात् प्राप्त करके उसके साथ अपने आश्रम को गया वह राजा सोमप्रभ भी अपनी प्रियतमा मकरन्दिका को लेकर अपने नगर को गया ॥१७६-१७७॥ इसी प्रकार वह शुक (मुञ्जा) भी अपने शरीर को छोड़कर अपने तपोबल से प्राप्त अपने स्थान (विद्याधरपुर) को गया। इस प्रकार, बहुत दूरी का अन्तर रहने पर भी विधि से विहित प्रणियों का समागम होता ही है ॥१७८॥ इस प्रकार, शक्तिप्रभा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त गोमुख मन्त्री से सुनाई गई आश्चर्यमयी और रुचिकर कथा को सुनकर प्रसन्न हुआ ॥१७९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशोलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग मन्त्रियों में श्रेष्ठ गोमुख ने इस प्रकार दो विद्याधरियाँ (मकरन्दिका और मनोरम प्रभा) की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से कहा ॥१॥ स्वामी इहलोक और परलोक—दोनों लोकों—का हित चाहनेवाले कुछ ही ऐसे विद्वान् व्यक्ति होते हैं जो साधारण होकर भी काम-क्रोध-लोभ आदि की उत्तरोत्तर साधना करते हैं ॥२॥ राजा सुन्दर के सेवक की कथा इस प्रसंग में एक कथा सुनो—राजा सुन्दर का अमित पराक्रमी शूरवर्मा नाम का एक सेवक था ॥३॥ वह किसी समय अपने गाँव से लौटकर सहसा आने पर न पूछा, तो उसने अपनी स्त्री को अपने एक मित्र के साथ एकान्त में स्वच्छन्दता-पूर्वक विहार करते देखा ॥४॥