भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ४२१ एक बार सूखा पड़ने के कारण तालाब के सूख जाने पर वे दोनों हंस किसी दूसरे तालाब में जाने को तैयार हुए। तब कछुए ने उनसे कहा ॥१६६॥ तुम आप जहाँ जाने को तैयार हो वहाँ मुझे भी ले चलो। यह सुनकर वे दोनों हंस उस मित्र कछुए से बोले-॥१६७ ॥ 'वह तालाब दूर है, जहाँ हमलोग जाने को उद्यत हैं। यदि तुम्हारी इच्छा वहाँ चलने की है, तो हमारी बात मानो ॥१७१॥ हम दोनों से पकड़ी गई लकड़ी को तुम बीच में दाँतों से पकड़कर लटक जाओ। किन्तु, उड़ते समय आकाश में चुप रहना, नहीं तो गिरकर मर जाओगे' ॥१७२॥ उनकी इस बात को स्वीकार कर दाँतों से लकड़ी को दोनों ओर से पकड़े हुए दोनों हंस आकाश में उड़ चले ॥१७३॥ क्रमशः उस तालाब के पास पहुँचने पर, कछुए को ले जाने हुए हंसों को देखकर नगर निवासी लोगों ने शोर मचाना शुरू किया कि देखो 'यह कैसा आश्चर्य है! हंस यह क्या ले जा रहे हैं! इस प्रकार के कोलाहल को चंचल कछुए ने सुना ॥१७४-१७५॥ 'नीचे यह कोलाहल क्या हो रहा है?' चंचलता से दाँतों से लकड़ी को छोड़कर हंसों से पूछा और लकड़ी से छूटने पर नीचे आ गिरा और लोगों ने उसे मार डाला ॥१७६॥ बुद्धिहीन व्यक्ति इसी प्रकार नष्ट होते हैं जैसे लकड़ी से गिरा कछुआ मारा गया। टिट्टिहरी के ऐसा कहने पर टिट्टिहरा उससे बोला-॥१७७॥ तीन मछलियों की कथा प्रिये, यह तो सत्य है, किन्तु तुम भी इस कथा को सुनो। किसी स्थान पर एक नदी के गड्ढे में तीन मत्स्य रहते थे ॥१७८॥ एक का नाम अनागतविधाता, दूसरे का नाम प्रत्युत्पन्नमति और तीसरे का नाम यद्भविव्य था। वे तीनों परस्पर सहवासी और मत्सारी थे ॥१७ ९ ॥ उन तीनों ने उस जलाशय के मार्ग से जाते हुए कुछ धीवरों (मल्लाहों) को यह कहते सुना कि इस जलाशय में मत्स्य हैं ॥१८ ० ॥ मछलीमारों की यह बात सुनकर उनके द्वारा मारे जाने के भय से बुद्धिमान् अनागत विधाता नाम का मत्स्य नदी के प्रवाह से छुपकर दूसरे स्थान पर चला गया ॥१८१॥