कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७१९ तब वे अत्यन्त चकित राजकर्मचारी बोले कि 'प्रात:काल ही चलकर उस वृक्ष का साक्ष्य (गवाही) लेंगे। तब उन्होंने दुष्टबुद्धि और धर्मबुद्धि दोनों को जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये ॥२२३-२२४॥ दुष्टबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता से सब सच्चा-झूठा समाचार सुनाया और कहा कि 'तुम उस वृक्ष के अन्दर बैठकर मेरा साक्षी (गवाह) बनो ॥२२५॥ 'अच्छा' इस प्रकार कहे हुए अपने पिता को ले जाकर दुष्टबुद्धि ने उस वृक्ष के खोखले में रात को ही उसे बैठा दिया और अपने घर चला आया ॥२२६॥ प्रातःकाल न्यायाधीश के साथ वे दोनों भाई उस वृक्ष के पास पूछने लगे कि 'यहाँ से उन दीनारों को कौन ले गया?' ॥२२७॥ 'उन दीनारों को धर्मबुद्धि ले गया'—ऐसा उस वृक्ष के कोटर में बैठे हुए उसके पिता ने स्पष्ट कहा। न्यायाधिकारी इस बात को असम्भव जानकर समझ गये कि दुष्टबुद्धि ने अवश्य ही इसके भीतर किसी को छिपा रखा है ॥२८२२ ॥ ऐसा सोचकर उन्होंने उस वृक्ष के कोटर में धुआं किया जिससे तीव्र होने पर उससे निकलता हुआ दुष्टबुद्धि का पिता पृथ्वी पर गिरकर मर गया ॥२२९॥ यह देखकर न्यायाधिकारियों ने दुष्टबुद्धि से आधे दीनार धर्मबुद्धि को दिलाकर और उसका हाथ तथा जीभ काटकर नगर से निकाल दिया। साथ ही उस धर्मबुद्धि का उन्होंने सम्मान किया ॥ २३० ॥ इस प्रकार अन्याय की बुद्धि से किया हुआ काम अशुभ और अकल्याण देनेवाला होता है। इसलिए किसी भी काम को न्यायबुद्धि से करना चाहिए। जैसा कि समुद्र ने मन्दरे से दिया ॥ २३१॥ शौर और बच्चे की कथा यह सुनकर वे नदी पर गए और वहां से खोह के भीतर घुसकर देख रहे थे कि उनके आगे बाघ का एक बच्चा था। उस बालक को वह कुरीति वाला ॥२३२॥ उस बहली के कथनानुसार बाघ ने अपने दो दिलों में से एक मांस के टुकड़े तक अपनी का मुख छिपा दिया। २३३॥ ऐसा करके दिल से छिन्नकर बच्चे का मुख कलेजाने बदलकर बाघ के दिल तक चला गया और उसने जानकर अपने खोह के बच्चे के अन्य अंगों को भी खा डाला ॥२३४॥