कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश लम्बक ८५ उसने एक बार तिलों को भूनकर खाया और उन्हें स्वादिष्ट जानकर उन भुने हुए तिलों को ही वैसा ही मीठा तेल पैदा करने की दृष्टि से खेतों में बो दिया। भुने हुए उन तिलों के न उगने से अपने माल को नष्ट करनेवाले उस किसान की सभी लोग हँसी करने लगे ॥८॥ पानी में आग फेंकनेवाले की कथा तिलखादिक की कथा सुनी। अब पानी में आग फेंकनेवाले की कथा सुनो ॥९॥ एक मूर्ख मनुष्य था। उसने प्रातःकाल देवता की पूजा करने की इच्छा से सोचा कि कल मुझे स्नान धूप आदि के लिए जल और अग्नि की आवश्यकता पड़ेगी। अतः, उन्हें एक साथ ही रख देता हूँ जिससे प्रातः उठते ही दोनों एक ही स्थान में मिल जायें ॥१०-११॥ ऐसा सोचकर वह पानी के घड़े में आग डालकर सो गया। प्रातःकाल जब उसने उठकर देखा तो आग समाप्त हो गई थी और पानी भी मैला होकर नष्ट हो गया था ॥१२॥ कोयले से पानी के काले हो जाने के कारण उससे मुँह धोने पर उसका मुँह भी वैसा ही (काला) हो गया। उसे देखकर सभी लोग मुस्कराते भये ॥१३॥ नासिकारोपण की कथा अग्निहुम्भ की कथा तुमने सुनी अब नासिकारोपण की कथा सुनो। कहीं कोई जड़बुद्धि पुरुष रहता था ॥१४॥ उसने अपनी स्त्री को चिपटी नाकवाली और गुरु को उठी हुई लम्बी नाकवाला देखकर सोये हुए गुरु की नाक काटकर स्त्री के नाक में लगा देने की सोची। तदनन्तर, उसने स्त्री की नाक काटकर उसके स्थान पर गुरु की नाक काटकर रोप दी। किन्तु, गुरु की नाक उस पर जमी नहीं। इस प्रकार उसने गुरु और स्त्री दोनों को नकटा कर दिया। फलस्वरूप जनता से तिरस्कार और हँसी उसने प्राप्त की ॥१५-१६॥ मूर्ख षडुरिये की कथा अब एक पशुपारक (बड़ुरिये) की कथा सुनो। एक जगह में महामूर्ख किन्तु धनी एक बड़ुरिया रहता था। अनेक धूर्त मित्रता करके उससे मिल गये ॥१७-१८॥ और, वे उससे बोले कि हमलोगों ने नगरनिवासी धनी की एक कन्या तुम्हारे लिए माँगी है, उसके पिता ने उसे देना स्वीकार भी कर लिया है ॥१९॥