कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८११ ब्रह्मचारी पुत्र की कथा अपने-अपने पिताओं का व्याख्यान करते हुए मित्रों के बीच एक मूर्ख अपने पिता की प्रशंसा करते हुए बोला—'मेरे पिता बालब्रह्मचारी हैं। यह सुनकर उसके मित्र बोले—'तब तू किससे उत्पन्न हुआ? मैं उनका मानसपुत्र हूँ'—ऐसा कहते हुए उस मूर्खराज ने सबको खूब हँसाया॥२४८—२५०॥ मूर्ख व्यक्ति इस प्रकार बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। राजन् तुमने ब्रह्मचारी के पुत्र को सुना अब एक ज्योतिषी को भी सुनो॥२५१॥ मूर्ख ज्योतिषी की कथा एक अज्ञ ज्योतिषी था। जीविका के अभाव में वह अपनी स्त्री और पुत्र को साथ लेकर चल पड़ा। दूसरे देश में जाकर बनावटी विषाद दिखाकर वह अपने धन और यश की डींग हाँकने लगा॥२५२-२५३॥ एक बार बहुत लोगों के सामने आते सड़क की गोद में गिराकर वह रोने लगा। लोगों के पूछने पर उस पापी ने कहा—॥ २५४॥ 'मैं भूत, वर्तमान और भविष्य ये तीनों काल जानता हूँ। मेरा यह पुत्र आज से सातवें दिन मर जायगा। इसलिए रोता हूँ ॥२५५॥ ऐसा कहकर और लोगों को आश्चर्य में डालकर, सातवाँ दिन आने पर उसने प्रात: काल ही सोते हुए अपने पुत्र को गला घोंटकर मार डाला॥२५६॥ इस प्रकार बालक के मरने पर ज्योतिषी को त्रिकालदर्शी मानकर विस्मित जनता ने धन से उसकी पूजा की और वह इस प्रकार धन कमाकर अपने घर आ गया॥ ५७॥ इस प्रकार धन के लोभ से झूठी पण्डिताई का प्रचार करने के उत्साह में व्यक्ति अपने पुत्र तक की हत्या कर डालते हैं। अत: बुद्धिमान् पुरुष को उनसे स्नेह न करना चाहिए॥ ५८॥ धोबी गधे की कथा महाराज एक और गधे की कथा सुनो। एक पुरुष गधे और ... का धनी था। किसी पुरुष ने घर के भीतर न आने तक व्यग्रचित्त व संशय से किसी के पूछने हुए उसके गुणों की प्रशंसा की। तब वह बोला—यह ठीक है किन्तु उसमें दो दोष हैं क्योंकि वह बड़ा आलसी और पापी है। बाहर खड़े हुए उस गधे ने यह सुनकर और लज्जावश अपना अपमान समझकर क्रोधावेश में उस पुरुष का स्तन उसके ही काटने में बोलकर आक्षेप करते हुए कहा—अरे अनभिज्ञ मेरा क्या अपराध है और किस वजह कलंक दिया ? ॥२ ५९॥