भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

४४ से उपासना करता हूँ।" उससे अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में तू मुझमें संवाद मत कर। वह शब्द का आत्मा है ऐसा जान कर मैं उसकी उपासना करता हूँ। जो इस प्रकार इसकी उपासना करता है वह शब्द का आत्मा होता है" ॥७॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्समवादयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति वा अहमेतमुपास । । ८ । । बालाकि बोला, "आकाश में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। वह पूर्ण और प्रवृत्ति रहित ब्रह्म है ऐसा जानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ।।८।। इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते । । ६ । । इस प्रकार जो उसकी उपासना करता है वह प्रजा और पशुओं से पूर्ण (संपन्न) होता है। वह स्वयं अथवा उसकी प्रजा योग्य काल के पूर्व मरण को प्राप्त नहीं होती" ।।६।। स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्त मेवाहमूपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्समवादयिष्ठा इन्द्रो ।।१० ।। बालाकि ने कहा, "वायु में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता हूँ" उससे अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। वह वैकुण्ठ (महा पराक्रमी) इन्द्र है तथा पराजय न होने वाली सेना है।।१०।। वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते जिष्णुर्ह वा पराजिष्णुरन्यतस्त्य जायी भवति ।।११।।